लोकसभा चुनाव के अंतिम चरण का प्रचार आज शाम बंद हो जाएगा। 1 जून को मतदान और 4 जून को परिणाम आ जाएंगे। सबकी निगाहें अंतिम चरण के मतदान के पश्चात आने वाले एग्जिट पोल पर लगी हुई हैं जो नतीजों की झलक देते हैं। इनकी प्रामाणिकता को लेकर बहस होती रही है क्योंकि अनेक प्रतिष्ठित एजेंसियों द्वारा किये गए एग्जिट पोल गलत भी साबित हो चुके हैं। बावजूद उसके चुनाव पूर्व सर्वेक्षण की तरह से ही एग्जिट पोल भी चुनाव प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा बन चुका है। टीवी चैनलों के अलावा विभिन्न राजनीतिक दल भी प्रत्येक चरण के बाद एग्जिट पोल करवाते हैं ताकि अगले चरण हेतु रणनीति में जरूरी बदलाव कर सकें। इस बार सात चरणों में हुए चुनाव पर भी सवाल उठे हैं। 19 अप्रैल को शुरू हुए मतदान की प्रक्रिया 1 जून तक चलना थका देने वाला रहा। दो - तीन चरणों के बाद मुद्दों का दोहराव होने से मतदाता भी ऊबने लगा और नेताओं के पास भी कहने को कुछ नहीं बचा तो निरर्थक बातें कही जाने लगीं। तेज गर्मी के कारण मतदान का प्रतिशत कम रहने से राजनीतिक पार्टियों के अलावा चुनाव विश्लेषक भी हैरान रहे। चुनाव आयोग द्वारा मतदान बढ़ाने किये गए तमाम प्रयास बेअसर साबित हुए। इससे किसे लाभ हुआ किसे नुकसान ये तो परिणाम बतायेंगे लेकिन इतने महंगे और ताबड़तोड़ प्रचार के बाद मतदाताओं का बड़ा वर्ग अपने अधिकार का उपयोग करने के प्रति अनिच्छुक क्यों रहा यह अध्ययन और शोध का विषय है क्योंकि जीवंत लोकतंत्र में मतदाता की हिस्सेदारी प्रभावशाली होना जरूरी है। यदि गर्मी ही कम मतदान का असली कारण है तब चुनाव के लिए ऐसा समय चुना जाना चाहिए जो मतदान बढ़ाने में सहायक हो। इससे भी बड़ी बात ये है कि अधिकतम चार चरणों में मतदान की प्रक्रिया संपन्न कारवाई जाए। इस चुनाव में मतदाता का मन जानने की कोशिश करने वाले परेशान हो उठे क्योंकि राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करने वाले चुनाव पर स्थानीय मुद्दे हावी होते दिखे। इस चुनाव की खास बात रही राजनीतिक दलों द्वारा चुनाव को जाति केन्द्रित बना देना। धर्म का उपयोग भी जमकर हुआ किंतु जाति उस पर भारी पड़ती दिखी। प्रत्याशी की योग्यता और छवि भी उसके आगे कमतर प्रतीत हुई। उदाहरण के लिए सुशिक्षित और शरीफ उम्मीदवार की जाति के मतदाता किसी अल्प शिक्षित या खराब छवि वाले उम्मीदवार के मुकाबले कम हैं तो उसकी जीत खतरे में मानी जाती है। इस मामले में सभी दल एक ही थैली के चट्टे - बट्टे कहे जा सकते हैं। छोटे - छोटे जातीय समूहों के नेताओं के सामने राष्ट्रीय पार्टियां जिस तरह झुकती हैं वह जाति के वर्चस्व का खुला प्रमाण है। इसका दुष्परिणाम सामाजिक विघटन के रूप में देखने मिल रहा है। जातिगत विद्वेष पहले से ज्यादा होना देश के लिए बड़ा खतरा है। लेकिन राजनीति चलाने वालों को चूंकि चुनाव से आगे सोचने की फुरसत नहीं है इसलिए जाति के नाम पर ज़हर फैलाने की होड़ मची हुई है। वोटों के नये - नये ठेकेदार पैदा होते जा रहे हैं। यहाँ तक कि पढ़े - लिखे तबके में भी जाति का असर स्पष्ट रूप से दिखता है। इस प्रवृत्ति को राजनीतिक पार्टियों और उनका नेतृत्व करने वालों की विफलता कहा जाना गलत न होगा। इस चुनाव में मतदाताओं को लुभाने के लिए मुफ्त उपहारों का जिस तरह बखान हुआ वह चुनाव की बजाय किसी उत्पाद की मार्केटिंग प्रतीत हुई। बिना सोचे समझे किये जा रहे कतिपय वायदों से देश हित किस तरह प्रभावित होगा इसकी चिंता नहीं किया जाना खतरनाक लक्षण है। चुनाव जीतने के लिए मतदाताओं को लुभाना स्वाभाविक प्रक्रिया है किंतु उसकी आड़ में देश और समाज को आग के हवाले करने का प्रयास असहनीय है। दुख की बात ये है कि राजनीतिक स्वार्थों की खातिर राष्ट्रीय हितों की उपेक्षा की जा रही है। इस चुनाव में किसकी जीत होगी ये उतना महत्वपूर्ण नहीं जितना यह कि देश का हित किसके हाथों में सुरक्षित रहेगा? इस बात की जरूरत हर समझदार व्यक्ति महसूस कर रहा है कि एक देश एक चुनाव की व्यवस्था वापस लौटनी चाहिए जिसके अभाव में निर्णय प्रक्रिया और विकास कार्य बुरी तरह प्रभावित होते हैं। बीते दो महीनों से केंद्र और राज्यों की सरकारों के अनेक जरूरी काम आचार संहिता की वजह से रूके पड़े हैं। ये सब देखते हुए चुनाव के बाद इस बात पर राष्ट्रीय स्तर पर विमर्श होना चाहिए कि चुनाव प्रक्रिया और राजनीतिक बहस का स्तर किस तरह सुधारा जाए?
- रवीन्द्र वाजपेयी
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