Thursday, 23 May 2024

वामपंथियों के पतन से कोई सबक नहीं लिया ममता ने



लोकसभा चुनाव के अंतिम दौर में कोलकाता उच्च न्यायालय के ताजा फैसले से प. बंगाल  में जबरदस्त हड़कम्प मच गया।  शेष दो चरणों में राज्य की 19 सीटों पर मतदान होना है। इस बीच  उच्च न्यायालय ने 2010 के बाद राज्य में जारी तकरीबन 5 लाख  ओबीसी प्रमाण पत्र रद्द कर दिये। हालांकि उन लोगों को इस फैसले से अप्रभावित रखा जो  उनके तहत नौकरी पा चुके हैं। इसी तरह भर्ती प्रक्रिया में शामिल लोग भी फैसले से मुक्त रखे गए हैं। ये प्रमाणपत्र 2011 में ममता बैनर्जी के सत्ता में आने के उपरांत जारी किये गए थे।  इस निर्णय के बाद प. बंगाल में कोई ओबीसी नहीं रह गया है तथा 1993 के तत्संबंधी अधिनियम के अंतर्गत नई सूची बनेगी । इसीलिए ममता ने  उच्च न्यायालय के फैसले से असहमति जताते हुए उसे मानने से इंकार कर दिया। राज्य सरकार इस निर्णय को रुकवाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटायेगी। उसने यदि  स्थगन आदेश पारित नहीं किया तब मुख्यमंत्री की मुश्किलें और बढ़ जायेंगी। ये कहना भी गलत न होगा कि लोकसभा की जिन सीटों पर मतदान होना है वहाँ तृणमूल काँग्रेस को नुकसान होने की आशंका बढ़ गई है। इसीलिए मुख्यमंत्री ने बिना समय गंवाए सर्वोच्च न्यायालय जाने की घोषणा कर दी। उल्लेखनीय है हाल ही में कोलकाता उच्च न्यायालय ने 25 हजार शिक्षकों की नियुक्ति रद्द करते हुए उनको दिये वेतन की वसूली किये जाने का फैसला भी सुनाया था जिस पर सर्वोच्च न्यायालय स्थगन आदेश जारी कर चुका है। वह निर्णय  भी चुनाव प्रक्रिया प्रारंभ होने के बाद आने से ममता सरकार की छवि को धक्का लगा। उससे वह उबर भी नहीं पाई थी कि ओबीसी प्रमाण पत्र रद्द करने का फैसला आ गया। चूँकि  लाखों लोगों का हित जुड़ा हुआ है इसलिए सर्वोच्च न्यायालय अंतरिम स्थगनादेश जारी कर देगा इसकी संभावना काफी है किंतु उच्च न्यायालय ने  निर्णय का  जो कारण बताया वह ममता सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाने के लिए पर्याप्त है। प. बंगाल में ओबीसी प्रमाणपत्र जारी करने का अधिनियम 1993 से लागू है। उसी का संज्ञान लेते हुए वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि  पिछड़ा वर्ग आयोग की सलाह लिए बिना जारी किये गए लाखों ओबीसी प्रमाणपत्र असंवैधानिक हैं। कानूनी पहलू से हटकर देखें तो उच्च  न्यायालय के इस फैसले का जबरदस्त राजनीतिक असर होना तय है। यदि सर्वोच्च न्यायालय  भी प्रक्रिया के उल्लंघन की बात से सहमत हुआ तब वह स्थगन देने से इंकार भी कर सकता है। इस फैसले के बाद सोशल मीडिया पर ओबीसी प्रमाणपत्र हासिल करने वालों की अनेक सूचियाँ प्रसारित हो रही हैं जिनमें ज्यादातर नाम मुसलमानों के हैं। हालांकि इनके अधिकृत होने की पुष्टि नहीं की जा सकी किंतु  वास्तव में ऐसा ही है तब भले ही लोकसभा चुनाव में ममता अपने को बचा ले जाएं किंतु भविष्य में ये बड़ा मुद्दा बने बिना नहीं रहेगा। 2026 का विधानसभा चुनाव आते तक भाजपा इस मामले को गर्म रखते हुए सुश्री बैनर्जी के मुस्लिम प्रेम को उछालकर ध्रुवीकरण के अपने अभियान को तेज कर देगी। भले ही ओबीसी प्रमाणपत्र जारी करने में मुसलमानों  को विशेष रूप से उपकृत करने की बात पूरी तरह सत्य न भी हो किंतु नियमों और प्रक्रियाओं का पालन न करने की बदनामी जिस तरह से ममता सरकार के साथ जुड़ती जा रही है उससे  गैर लाभान्वित वर्ग उनके प्रति  नाराजगी और बढ़ती जाएगी। वैसे भी बीते काफी समय से जिस प्रकार उच्च न्यायालय उनकी सरकार के विरुद्ध फैसले सुना रहा है उससे उनकी  सरकार  भी वामपंथी मोर्चा की तरह ही प्रशासनिक गुंडागर्दी  के लिए कुख्यात होती जा रही है। ममता अपने स्वभाव अनुसार केंद्र सरकार के साथ ही न्यायपालिका पर भी गुस्सा उतारती रहती हैं  ।  एक जमाने में  खुद को सर्व शक्तिमान  और अपराजेय मान बैठे वाम मोर्चे में भी ऐसी ही अकड़ थी। उसका घमंड तोड़ने का कारनामा सुश्री बैनर्जी के नाम ही लिखा हुआ है। आश्चर्य है उन्होंने वाम मोर्चे के पतन से कोई सबक नहीं लिया। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

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