Saturday, 11 May 2024

जेल में रहकर सरकार चलाओ : लोकतंत्र और संविधान बचाओ !


दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को सर्वोच्च न्यायालय ने आखिरकार अंतरिम जमानत दे दी किंतु उन्हें 2 जून को पुनः जेल जाना पड़ेगा। 51 दिन पहले ईडी द्वारा दिल्ली सरकार की शराब नीति में हुए भ्रष्टाचार के आरोप में उन्हें  गिरफ्तार किया गया था। उसके फ़ौरन बाद ही उन्होंने अदालतों  के दरवाजे खटखटाने शुरू कर दिये किंतु निराशा  हाथ लग रही थी। उनके अधिवक्ता ने ये तर्क भी रखा कि लोकसभा चुनाव के ऐलान के बाद  गिरफ्तारी  प्रचार से रोकने की गई। सर्वोच्च न्यायालय ने दो - तीन दिन पहले से ही ये कहना शुरू कर दिया था कि वे चुने हुए मुख्यमंत्री हैं,  प्रचार उनका मौलिक अधिकार है, हम उन्हें अंतरिम जमानत दे सकते हैं। लेकिन वे मुख्यमंत्री कार्यालय नहीं जा सकेंगे तथा बिना उप राज्यपाल की अनुमति के किसी फाईल पर हस्ताक्षर की अनुमति भी उन्हें नहीं होगी। प्रकरण से संबंधित गवाहों  से मिलना भी प्रतिबंधित रहेगा।  जिस खंडपीठ द्वारा  अंतरिम जमानत दी गई उसने ये टिप्पणी भी कि श्री केजरीवाल आदतन अपराधी नहीं हैं। उनकी रिहाई को लेकर पक्ष - विपक्ष से प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। कुछ को इसमें न्याय की जीत नजर आ रही है वहीं एक वर्ग  न्यायाधीशों की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर रहा है। रोचक बात ये है कि श्री केजरीवाल ने जमानत मांगी ही नहीं थी, बल्कि गिरफ्तारी के समय और वैधानिकता पर आपत्ति जताई थी किंतु अदालत ने बजाय गिरफ्तारी के कानूनी पहलुओं पर फैसला करने के उनको  जेल से बाहर आकर चुनाव प्रचार करने की छूट दे दी। दूसरी तरफ  झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन महज इसलिए जेल से बाहर नहीं आ पा रहे क्योंकि वे गिरफ्तार होने के पूर्व ही कुर्सी छोड़ चुके थे । जबकि श्री केजरीवाल ने त्यागपत्र न देकर जेल में रहते हुए सरकार चलाने की हेकड़ी दिखाई । अंततः उनका मुख्यमंत्री होना ही अंतरिम जमानत का आधार बन गया। तेलंगाना के पूर्व मुख्यमंत्री के. सी राव की बेटी के. कविता भी शराब नीति घोटाले में गिरफ्तार होकर जेल में है। वे भी आंध्र प्रदेश में अपनी पार्टी बी. आर.एस की विधायक हैं और पूर्व लोकसभा सदस्य भी। उनकी जमानत अर्जी भी  अदालत में अस्वीकार होती रही हैं, ऐसे में यदि चुनाव प्रचार ही अंतरिम जमानत का आधार है तब श्री सोरेन और सुश्री कविता को उससे वंचित रखना न्याय के समक्ष समानता के सिद्धांत का उल्लंघन है।  न्यायपालिका का हमारे देश में बेहद सम्मान है किंतु श्री केजरीवाल को बिना मांगे ही  अंतरिम जमानत दिये जाने से इस अवधारणा को बल मिला है कि वह आम और खास में अंतर करती है। ये सवाल भी उठ खड़ा हुआ है कि क्या ये फैसला उन तमाम लोगों के जेल से बाहर आने का रास्ता नहीं खोल देगा जो राजनीतिक नेता हैं और अपनी पार्टी के लिए चुनाव में प्रचार करते हैं। स्मरणीय है बिहार और उ.प्र के अनेक माफिया सरगना जेल में रहते हुए चुनाव जीत गए किंतु उनको अपना चुनाव प्रचार करने की अनुमति अदालत से नहीं मिली। और न ही सदन में बैठने का अवसर दिया गया। हाल ही में दिवंगत उ.प्र के बाहुबली मुख्तार अंसारी 15 साल जेल में रहे और वहीं रहते तीन विधानसभा चुनाव जीते। बिहार के शहाबुद्दीन भी ऐसा ही कारनामा कर चुके हैं। देश में अनेक राजनेता विभिन्न कारणों से जेल में बंद रहे हैं। उनकी जमानत अर्जियाँ मंजूर भी हुईं और खारिज भी किंतु श्री केजरीवाल जैसी बिना मांगे जमानत शायद ही किसी की दी गई हो। अनेक विधि विशेषज्ञ कह रहे हैं इस फैसले की सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ में समीक्षा की जानी चाहिए क्योंकि राजनीति के क्षेत्र  में ऐसे लोगों की  संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है जिनका जेल आना - जाना बना रहता है। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव बीमारी की आड़ में जमानत पर बाहर आकर जिस प्रकार से राजनीति करते हैं उससे कानून और दंड प्रक्रिया दोनों का मजाक उड़ता है।  न्यायपालिका की निष्पक्षता और विवेक का सम्मान करना सभी का कर्तव्य है किंतु श्री केजरीवाल को मिली  जमानत पर जो आलोचनात्मक टिप्पणियां आ रही हैं या तो उनको अदालत की अवमानना मानकर  कारवाई की जाए और यदि ऐसा करना जरूरी न हो तब मुख्य न्यायाधीश श्री डी. वाय. चंद्रचूड़ को स्वतः संज्ञान लेकर संदर्भित फैसले की समीक्षा करनी चाहिये वरना जेल में रहते हुए सरकार चलाने की सुविधा राजनीति को अपराधियों की शरण स्थली बना देगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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