Tuesday, 7 May 2024

भ्रष्टाचार न्यूनतम साझा कार्यक्रम का रूप ले चुका है


केंद्र सरकार पर समूचा विपक्ष आरोप लगाता है कि वह ईडी नामक संस्था के जरिये अपने राजनीतिक विरोधियों को डराती है। अनेक विपक्षी नेताओं के  भाजपा में शामिल होने के पीछे भी ईडी का हाथ बताया जाता है। हालांकि उसकी गिरफ्त में आए लोगों में राज नेताओं की संख्या 5 प्रतिशत ही है। वैसे ये मानने में कुछ भी गलत नहीं है कि मोदी सरकार के कार्यकाल में ईडी और सीबीआई के शिकंजे में फंसने वाले राजनेताओं में ज्यादातर विपक्षी हैं और ये भी कि उनमें से ही कुछ चर्चित चेहरे भाजपा में आकर फिलहाल अभय दान पा गए। ये भी सच है कि ईडी के छापों में कुछ विपक्षी नेताओं के ठिकानों से करोड़ों रु. नगद जप्त हुए। लेकिन ऐसे अवसरों पर ईडी पर आरोप लगाने वाले मुँह में दही जमाकर बैठ जाते हैं। प. बंगाल के एक मंत्री और उनकी महिला मित्र के यहाँ मिली नोटों की गड्डियों को गिनने में ही कई दिन लगे थे । गत दिवस ऐसी ही खबर आई झारखण्ड से जहाँ ग्रामीण विकास मंत्री आलमगीर आलम के निजी सहायक संजीव लाल के नौकर जहांगीर आलम और मुन्ना सिंह सहित कुछ और ठिकानों पर मारे गए छापों में 35 करोड़ रु. से ज्यादा की नगदी बरामद की गई। आज भी छापे मारे गए जिनमें बड़ी राशि जप्त की गई है। इस बारे में जानकारी मिली है कि ईडी ने फरवरी महीने में राज्य के ग्रामीण विकास विभाग के मुख्य अभियंता वीरेंद्र के. राम को गिरफ्तार किया था। साथ ही इस विभाग में चल रही आर्थिक अनियमिताओं की जाँच हेतु राज्य सरकार को गोपनीय पत्र लिखा जिसकी खबर  भ्रष्ट लोगों तक पहुंचा दी गई। इसका प्रमाण तब मिला जब छापेमारी के दौरान जप्त नोटों के बंडलों में ईडी के उक्त पत्र की प्रति भी मिली। झारखण्ड वह राज्य है जो अपने गठन के समय से ही भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरा रहा। उसके एक  पूर्व मुख्यमंत्री मधु कौड़ा  घोटाले में जेल जा चुके हैं वहीं दूसरे हेमंत सोरेन अभी जेल में हैं। राज्यसभा चुनाव में झारखण्ड के विधायक किस तरह बिकते रहे यह सर्वविदित है। जिन लोगों से गत दिवस छापेमारी में करोड़ों की गड्डियाँ बरामद हुईं वे सभी प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से  उक्त मंत्री से जुड़े हुए हैं। उनके निजी सहायक के नौकर के यहाँ से करोड़ों रु. प्राप्त होना बिना कुछ कहे ही सब कुछ जाहिर कर देता है। छापे के 24 घंटों  तक बाद तक किसी विपक्षी नेता द्वारा कोई बयान नहीं दिया जाना चौंकाने वाला है। उधर मंत्री जी को सरकार से हटाये जाने का भी कोई संकेत नहीं मिला है। भले ही नोटों के बंडल उनके बंगले से नहीं मिले किंतु उनके निजी सहायक के नौकर के फ्लैट पर जमा अकूत दौलत का स्रोत क्या होगा यह साधारण व्यक्ति भी बता देगा। ऐसे में विपक्ष से अपेक्षा है वह इस कांड पर अपना रुख स्पष्ट करे। लेकिन वह मंत्री आलमगीर आलम का इसलिए बचाव करेगा कि वे मुस्लिम हैं और उनको मंत्री पद से हटाये जाने से उस  वर्ग के मतदाता नाराज हो जायेंगे। ये दोहरा रवैया ही भारतीय राजनीति की पहिचान बन गया है। जिसमें अपने या अपनों के दोष नजरंदाज किये जाते हैं।  कर्नाटक के यौन शोषण कांड पर काँग्रेस भाजपा को मुँह खोलने ललकार रही है वहीं कल से भाजपा को मौका मिल गया है विपक्ष को कटघरे में खड़ा करने का। कुल मिलाकर समूची राजनीतिक व्यवस्था आकंठ भ्रष्टाचार में डूबी हुई है। इलेक्टोरल बाँड के मामले में सभी भाजपा पर चढाई कर रहे थे लेकिन ज्योंही तृणमूल काँग्रेस और द्रमुक को भी लाॅटरी किंग से अरबों रु. के बाँड मिलना स्पष्ट हुआ  वैसे ही मामला ठंडा पड़ गया। यही वजह है कि भ्रष्टाचार मुद्दा होकर भी मुद्दा नहीं बन पाता। समय - समय पर  नये - नये कांड उजागर होते रहते हैं। ग्राम पंचायत से लेकर केंद्रीय सचिवालय तक यदि कुछ एक समान है तो वह भ्रष्टाचार ही है। संस्थागत स्वरूप ग्रहण करने के बाद वह संस्कृति बन गया है। ये कहने में भी संकोच नहीं होता कि राजनीति का मुख्य आकर्षण भ्रष्टाचार के जरिये धन बटोरना हो गया है। गाँधी, लोहिया, दीनदयाल और आंबेडकर के चेलों के बीच सैद्धांतिक मतभेद कितने भी हों लेकिन भ्रष्टाचार एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम का रूप ले चुका है। जो पकड़ा जाता है वह शर्मसार होने के बजाय दूसरों का भ्रष्टाचार उजागर करते हुए ये साबित करने में जुट जाता है कि राजनीति नामक स्नानागार में सब वस्त्रहीन हैं। बीते 77 वर्ष में सत्ता बदलती रही लेकिन भ्रष्टाचार को मिटाने के सारे दावे   मिट्टी में मिल गए। स्वर्गीय काका हाथरसी आधी सदी पहले लिख गए थे कि रिश्वत लेते पकड़ जा, तो रिश्वत दे के छूट। दुर्भाग्य से भ्रष्टाचार की गाजर घास अब न्यायपालिका के प्रांगण तक फैल चुकी है। सब कुछ रुपयों से खरीदा जा सकता है की , अवधारणा स्थापित हो जाने  से गलत काम करने वाले निर्भय होते जा रहे हैं। ईडी द्वारा झारखण्ड सरकार को भेजे गोपनीय पत्र की प्रतिलिपि संदर्भित छापों में मिलना नेता और नौकरशाहों के अपवित्र गठजोड़ का ताजा प्रमाण है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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