ब्रिटेन की एक अदालत में एस्ट्राजेनेका कंपनी द्वारा उत्पादित कोविशील्ड नामक वैक्सीन के साइड इफेक्ट के बारे में जानकारी दिये जाने के बाद भारत में विवाद छिड़ गया है। लोकसभा चुनाव के चलते विपक्ष इसे मुद्दा बनाते हुए सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साध रहा है। ये बात जमकर प्रचारित की जा रही है कि कोरोना काल में कोविशील्ड वैक्सीन लगवाने वाले अनेक मरीजों की हृदयाघात से मृत्यु हो गई। इसी तरह बहुत लोगों के खून में थक्के जमने की शिकायत भी सामने आई है। विपक्ष का सीधा आरोप है कि भाजपा ने चंदे के लालच में देशवसियों को घटिया वैक्सीन लगवा दी। ये बात तो सही है कि कोरोना के बाद हृदयाघात से होने वाली मौतें बढ़ी हैं। कुछ और दुष्प्रभाव भी देखने मिले। यद्यपि ये प्रमाणित नहीं किया जा सका कि सभी का कारण कोविशील्ड वैक्सीन ही है क्योंकि उस दौरान लोगों ने और भी दवाओं का सेवन किया था। कोरोना ग्रसित जो मरीज अस्पताल में भर्ती हुए उनको रेमिडीसिविर नामक इंजेक्शन लगे जिनकी जमकर कालाबाजारी भी हुई। भारत वैक्सीन उत्पादन के क्षेत्र में अग्रणी है। दुनिया के अनेक देश पहले से ही यहाँ अपनी वैक्सीन बनवाते रहे हैं। कोरोना काल में भारत में उत्पादित वैक्सीन की मांग पूरे विश्व में थी। ऐसे में अनेक देशों को हमारे यहाँ से उसकी आपूर्ति की गई। कुछ को तो कूटनीतिक पहल के तहत मुफ्त में वैक्सीन भेजी गई। उस समय आम आदमी पार्टी द्वारा दिल्ली में पोस्टर लगाकर श्री मोदी पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने देशवासियों की जान खतरे में डालते हुए विदेशों को कोरोना वैक्सीन भेजने का अपराध किया। आज वही पार्टी और उसके साथ पूरा विपक्ष कोविशील्ड के साइड इफेक्ट को लेकर प्रधानमंत्री को कठघरे में खड़ा करने पर आमादा है। जबकि जो बात एस्ट्राजेनेका कंपनी ने ब्रिटेन की अदालत में स्वीकार की उसके अनुसार कोविशील्ड का दुष्प्रभाव हजारों में किसी एक व्यक्ति पर हुआ होगा। जैसे ही विवाद प्रारंभ हुआ वैसे ही देश के विख्यात चिकित्सक तथा स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े विशेषज्ञ उक्त वैक्सीन को लेकर उडाई जा रही अफवाहों का खंडन करने आगे आये और इस भ्रांति का निराकरण किया कि कोविशील्ड लगवाने वाले सभी को हृदय सम्बन्धी परेशानी हुई या भविष्य में होगी। ऐसा लगता है मुद्दा विहीन होते जा रहे चुनाव में विपक्ष को सरकार को घेरने में अपेक्षित सफलता नहीं मिल रही इसलिए उसने ब्रिटेन की अदालत में दी गई जानकारी के आधार पर भाजपा और प्रधानमंत्री पर हमले शुरू कर दिये। जबकि वास्तविकता ये है कि भारत के वैक्सीन प्रबंधन की पूरी दुनिया में प्रशंसा हुई। 140 करोड़ की आबादी वाले देश में जहाँ चिकित्सा सेवाओं की स्थिति बेहद दयनीय मानी जाती है, वहाँ कोरोना की विभीषिका के बीच इतना सफल अभियान चलाना आसान नहीं था। लेकिन उस असंभव कार्य को केंद्र सरकार के कुशल निर्देशन में जिस प्रकार सफल बनाया गया उसके कारण असंख्य जानें बचाई जा सकीं। यद्यपि ये स्वीकार करने में कुछ भी अनुचित नहीं है कि एक दौर ऐसा आया जब ये लगा कि कोरोना के आगे पूरी व्यवस्था चरमरा गई है । बहुत सी मौतें ऑक्सीजन और वेंटीलेटर मशीन के अभाव में हुईं। अस्पतालों में जगह न होने से भी अनेक जानें गईं परंतु तमाम अव्यवस्थाओं के बीच भी जितना हुआ वह उम्मीदों से कहीं ज्यादा था । वरना इटली, ब्रिटेन, स्पेन, फ्रांस और अमेरिका जैसे विकसित देशों में हालात पूरी तरह अनियंत्रित हो चले थे। ये देखते हुए सतही जानकारी के आधार पर कोविशील्ड लगवाने वालों को भयाक्रांत करना बेहद गैर जिम्मेदाराना आचरण है। हमारे देश में चुनाव के दौरान राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का विकृत स्वरूप देखने मिलता है किंतु कोरोना को लेकर पहले भी जिस तरह की राजनीति देखने मिली और इस समय हो रही है वह बेहद आपत्तिजनक है। वैक्सीन लगे हुए दो साल से ज्यादा बीत चुके हैं। चिकित्सा विशेषज्ञ खुलकर कह रहे हैं कि उसका यदि कोई दुष्प्रभाव होता तो वह भी छह माह के भीतर सामने आ जाता। और फिर दुनिया भर में कोविशील्ड उपयोग में लाई गई। बेहतर हो इस बारे में निराधार और मिथ्या प्रचार बंद हो क्योंकि ऐसी बातों का भी लोगों पर विपरीत मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी पड़ता है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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