Wednesday, 1 May 2024

पर्यावरण चुनाव के मुख्य मुद्दों में क्यों नहीं


लोकसभा चुनाव के दो चरणों में  मतदान का प्रतिशत पिछले चुनाव की तुलना में कम होने के जो कारण बताये गए उनमें एक  गर्मी भी है। उत्तर भारत के कुछ राज्यों में तापमान 40 डिग्री से ऊपर चले जाने की वजह से दोपहर बाद मतदाताओं ने घर में रहना बेहतर समझा। हालांकि इसके पीछे और भी कारण हैं किंतु तेज गर्मी से मतदान का प्रभावित होना स्वाभविक है। इसी बीच मौसम विभाग ने ये खुशखबरी दी कि इस वर्ष मानसून अच्छा रहेगा  किंतु उसी के साथ ये बताकर डरा भी दिया कि  गर्मी भी जमकर पड़ेगी और जल्द ही अनेक स्थानों पर तापमान 47 डिग्री के स्तर तक पहुँच जायेगा। हालांकि पर्यावरण को जो क्षति पहुंची है उसकी वजह से साल दर साल अधिकतम तापमान बढ़ता जा रहा है किंतु इस वर्ष लोकसभा चुनाव के शेष पाँच चरण चूंकि भीषण गर्मी में संचालित होंगे इसलिए इस आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता कि मतदान में और भी कमी आ सकती है। चुनाव आयोग और राजनीतिक दल अपने - अपने स्तर पर मतदान बढ़ाने के लिए प्रयासरत हैं। उन्हें कितनी सफलता मिलेगी ये तो मतदान के बाद ही स्पष्ट  हो सकेगा किंतु इससे अलग हटकर जो चिंता है उस पर भी ध्यान देना बेहद जरूरी है क्योंकि प्रति वर्ष गर्मियों में अधिकतम तापमान का आंकड़ा जिस प्रकार ऊपर जाने लगा है वह खतरनाक है। भारत की जो भौगोलिक स्थिति और ऋतु चक्र है उसमें ग्रीष्म काल का भी अपना महत्व है। रबी फसल कटने के बाद किसान वर्षा ऋतु की प्रतीक्षा करते हैं।  लेकिन आबादी के विस्फोट, बेलगाम शहरीकरण और विकास कार्यों की बलि चढ़ गए वृक्षों के कारण पर्यावरण संतुलन इस हद तक गड़बड़ा गया है कि गर्मियों में तो तापमान सीमा तोड़ने पर आमादा होता ही है किंतु अब तो सर्दियों की शुरुआत में भी गर्मी का एहसास होने लगा है। ऋतुचक्र में  ये बदलाव अचानक नहीं आया। विकास की अंधी  वासना ने ये स्थिति उत्पन्न की जिसके लिए प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप में हम सभी उत्तरदायी हैं। पाठक ये सोच सकते हैं कि चुनाव जैसे सामयिक विषय को छोड़ बढ़ते तापमान पर चर्चा की प्रासंगिकता क्या है किंतु इसका सीधा -  सीधा स्पष्टीकरण ये है कि यदि  तापमान में वृद्धि देश के भविष्य का फैसला करने के मार्ग में बाधा बन रही है तब उस पर चर्चा और चिंता दोनों होना चाहिए। सत्ता और विपक्ष दोनों इन दिनों आश्वासन की टोकरी लिए घूम रहे हैं। कोई नगदी का भरोसा दिलवा रहा है तो कोई नौकरी का। लेकिन शायद ही कोई दल है जिसने पर्यावरण सुधार को अपना प्रमुख लक्ष्य घोषित किया हो। जो विशेषज्ञ घोषणापत्र बनाते हैं उन्होंने कुछ पन्नों में उसके लिए उपाय करने की प्रतिबद्धता दर्शायी होगी किंतु नेताओं के चुनावी भाषणों में एक दूसरे पर कटाक्ष किये जाने के अलावा सौगातों और खैरातों का तो खूब जिक्र होता है लेकिन किसी से भी ये सुनने नहीं मिलता कि सत्ता में आने पर वह और उसकी पार्टी हर नागरिक को शुद्ध हवा और पानी उपलब्ध करवाएगी। सभी पार्टियाँ मुफ्त इलाज का वायदा तो कर रही हैं किंतु  ज्यादातर बीमारियों की जड़ कहे जाने वाले प्रदूषण को जड़ से समाप्त करने का पक्का वायदा करने की हिम्मत किसी नेता ने अब तक नहीं दिखाई। पहाड़ों पर बढ़ता तापमान, सिकुड़ते ग्लेशियर,  भूस्खलन के हादसों में वृद्धि, नदियों में बढ़ता प्रदूषण, जंगलों की आग, बढ़ते शहरी क्षेत्र के कारण वन्य पशुओं का रिहायशी बस्तियों में  आवागमन, भूजल  स्तर में तेजी से गिरावट, सूखते तालाब और कुए भावी पीढ़ी के लिए    अकल्पनीय मुसीबतों का आधार उत्पन्न कर रहे हैं। ऐसा नहीं है कि सरकारी  और सामाजिक स्तर पर इस बारे में विमर्श न हो रहा हो किंतु पर्यावरण संरक्षण के लिए हायतौबा मचाने वाले संगठन  और शख्सियतें चुनाव के समय क्यों शांत हैं ये बड़ा सवाल है। उक्त मुद्दों पर समाज और राजनीतिक दलों  की उदासीनता निश्चित रूप से चिंता का कारण है। चुनाव तो पाँच साल में एक बार आते हैं किंतु गर्मी हर साल बढ़ती जा रही है। आश्चर्य की बात ये है कि अभी तक किसी ने भी पर्यावरण के मुद्दे पर न कोई बहस की और न किसी ने इस पर मतदाताओं की राय जानने हेतु सर्वेक्षण किया। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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