Tuesday, 21 May 2024

नेता कितने भी ऊर्जावान हों किंतु मतदाता थका नजर आ रहा


पाँच चरण का मतदान संपन्न होने के बाद अब दोनों  खेमे जीत - हार के परस्पर विरोधी दावे कर रहे हैं। लेकिन  इस चुनाव की सबसे बड़ी बात ये है कि राजनीतिक नेता कितनी भी ऊर्जा दिखाएं लेकिन मतदाता थका - थका सा दिखता है। चुनाव आयोग के तमाम प्रयासों के बावजूद  पिछले दो चुनावों की तुलना में कम मतदान चौंकाने वाला है। एनडीए के मुकाबले बने इंडिया नामक गठबंधन ने ज्यादातर सीटों पर सीधे मुकाबले की स्थिति पैदा कर दी। ऐसे में मतों का ध्रुवीकरण होने का आकलन सभी कर रहे थे। सामान्यतः ऐसे हालात में मतदान का आंकड़ा बढ़ता है और मतदाता खुद होकर उत्साह पूर्वक मतदान केंद्र पर कतारबद्ध होते हैं। हालांकि पहले भी विधानसभा चुनावों की तुलना में लोकसभा के लिए मत प्रतिशत कम ही होता रहा है। लेकिन जब भी सत्ताधारी दल के विरुद्ध विपक्षी एकजुटता हुई तब मतदाता में अपेक्षाकृत अधिक उत्साह परिलक्षित होता दिखा। इस चुनाव में जिस तरह की स्वस्फूर्त चेतना अपेक्षित थी उसका अभाव निश्चित तौर पर नजर आया। मतदाताओं का ये रवैया किसके पक्ष या विरोध में है ये अनुमान लगाने में बड़े - बड़े चुनाव विशेषज्ञ कठिनाई अनुभव कर रहे हैं। यद्यपि नेताओं की रैलियों और रोड शो आदि में तो बड़ी सँख्या में लोगों की मौजूदगी देखी गई किंतु मतदान का प्रतिशत देखकर ऐसा लगा जैसे नेताओं की बातों से लोग प्रभावित नहीं हुए। ये भी गौरतलब है कि बड़े नेताओं को सुनने अथवा देखने के लिए आने वाली जनता में ज्यादातर उसकी पार्टी से जुड़ा तबका होता है। यह लोकतंत्र के लिहाज से शुभ संकेत नहीं है। एक जमाना था जब न सिर्फ राष्ट्रीय बल्कि प्रादेशिक स्तर के नेताओं के भाषण सुनने के लिए विरोधी विचारधारा वाले श्रोता भी आते थे। आज के बड़े  नेता भी बमुश्किल 20 - 25 मिनिट में अपना भाषण देकर आगे बढ़ जाते हैं। आजकल श्रोताओं के बैठने के लिए कुर्सियां लगाई जाती हैं। धूप और बरसात से बचाव हेतु आधुनिक शामियाने तान दिये जाते हैं। सभा स्थल तक आने - जाने के लिए वाहन सुविधा के अलावा चाय - नाश्ते की व्यवस्था भी रखी जाती है। इन सबके कारण भीड़ तो आ जाती है किंतु उसमें प्रतिबद्ध लोग ज्यादा होते हैं। यही कारण है कि मतदाताओं का वह वर्ग जो सबके विचार सुनकर अपना मन बनाता था वह मतदान केंद्र तक जाने से बचता है। और यही वह मतदाता है जो चुनाव को जीवंत बनाता है। नुक्कड़ सभाओं का तो चलन ही लुप्त होता जा रहा है। नेताओं की सभाएं वैचारिक खुराक देने की बजाय किसी मार्केटिंग पेशेवर की तरह नये - नये ऑफर देने का जरिया बन गई हैं। ये प्रवृत्ति कमोबेश समूचे राजनीतिक परिदृश्य पर हावी हो चुकी है। इसका दुष्प्रभाव मतदान के दिन देखने मिल रहा है। पिछले चुनाव की तुलना में कम मतदान , मतदाताओं की उदासीनता से ज्यादा राजनीतिक पार्टियों और  नेताओं के प्रति बढ़ती वितृष्णा का संकेत है। ऐसा नहीं है कि प्रचार में कमी या कंजूसी की गई हो। चुनाव को लेकर टीवी, समाचार पत्र, सोशल मीडिया, यू ट्यूब आदि  पर जितनी चर्चा होती है वह समाज में विचारोत्तेजना उत्पन्न करने के लिए पर्याप्त है। कभी - कभी तो लगता है वह जरूरत से ज्यादा हो रही है। बावजूद इसके कुछ राज्यों को अपवाद स्वरूप छोड़ दें तो मतदान का प्रतिशत या तो कम हुआ या स्थिर हो चला है। सत्ता पक्ष को लगता है कि उसकी नीतियों और कार्यक्रमों से संतुष्ट मतदाता बिना शोर शराबा किये मतदान कर रहा है। वहीं विपक्ष इसे अपने पक्ष में अंडर करेंट  मानकर आत्ममुग्ध है। उनमें से कौन सही है ये तो 4 जून की दोपहर तक स्पष्ट हो सकेगा किंतु ये कहने में  कुछ भी गलत नहीं है कि मतदाताओं में समर्थन या विरोध को व्यक्त करने का उत्साह नहीं है। जिस लहर  की चर्चा चुनाव के समय होती है वह यदि नजर नहीं आ रही तो इसके लिए मतदाताओं की बजाय राजनीतिक पार्टियां और नेता दोषी हैं। अभी मतदान के दो चरण शेष हैं किंतु अभी से चुनाव उबाऊ लगने लगा है। मुद्दों को लेकर भी अस्पष्टता है। लोकसभा चुनाव राष्ट्रीय विषयों पर होना चाहिए किंतु उसे स्थानीय रूप देने का प्रयास दोनों ओर से हुआ है। इस कारण लोकसभा चुनाव की गंभीरता भी जाती रही है। नतीजा जो भी हो लेकिन राजनीतिक  दलों के लिये ये बड़ा विचारणीय मुद्दा है कि वे उस जनता के मन में अपने लिए वैसा विश्वास और श्रद्धा जाग्रत करने में क्यों विफल हैं जिसके हितचिंतक बनने का दावा करते वे थकते नहीं हैं। 

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 रवीन्द्र वाजपेयी

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