वर्ष 2016 में हैदराबाद वि.वि के छात्र रोहित वेमुला ने आत्महत्या कर ली। उसके बाद पूरे देश में उसे लेकर आंदोलन होने लगे। निशाना बने भाजपा नेता बंडारू दत्तात्रय ( वर्तमान में राज्यपाल हरियाणा), केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी और उनके अलावा कुछ भाजपा विधायक, एक कुलपति और अभाविप के अनेक नेताओं पर रोहित को दलित होने के कारण प्रताड़ित करने का आरोप लगाया गया। भाजपा को दलित विरोधी कहकर लान्छित किया जाने लगा। जेएनयू, उस्मानिया, जादवपुर , जामिया मिलिया और अलीगढ़ जैसे वामपंथी प्रभाव वाले विश्व विद्यालयों में जमकर धरना - प्रदर्शन हुए। लेकिन फिर ये प्रकरण राजनीतिक रस्साकशी में फंसकर रह गया। राहुल गाँधी से लेकर लगभग सभी विपक्षी नेताओं ने रोहित की माँ के पास जाकर सियासी फसल काटने की कोशिश की। उसे दलित अस्मिता का प्रतीक मानकर शहीद का दर्जा देने का कर्मकांड भी जमकर हुआ। अनेक संस्थाओं और राजनीतिक दलों ने रोहित की माँ को आर्थिक सहायता भी प्रदान की। एक युवा द्वारा आत्महत्या किया जाना अत्यन्त दुखद होता है। उसकी माँ के प्रति हमदर्दी भी पूरी तरह जायज थी। लेकिन रोहित के दलित होने की वजह से मामले ने ज्यादा तूल पकड़ा। लम्बा समय व्यतीत होने के कारण लोग उस घटना को तकरीबन भूल ही चुके थे। अचानक अखबारों में प्रकाशित इस खबर ने ध्यान खींचा कि हैदराबाद पुलिस ने रोहित की आत्महत्या की जाँच बन्द करते हुए क्लोजर रिपोर्ट अदालत में पेश कर दी। रिपोर्ट में रोहित को प्रताड़ित करते हुए आत्महत्या हेतु प्रेरित करने की बात को गलत ठहरा दिया गया। सबसे अधिक चौंकाने वाली बात ये है कि क्लोजर रिपोर्ट में इस बात का खुलासा किया गया है कि रोहित दलित नहीं था। और आत्महत्या के पीछे उसका वह डर था कि कहीं उसकी जाति संबंधी पहिचान उजागर न हो जाए। उक्त रिपोर्ट के सार्वजनिक होते ही राजनीतिक आरोप - प्रत्यारोप शुरू हो गए। भाजपा ने काँग्रेस और राहुल गाँधी को घेरते हुए कहा कि उन्होंने संसद में रोहित की आत्महत्या को लेकर जो गलत बयानी की उसके लिए उनको माफी मांगनी चाहिए। जो जानकारी मिली उसके मुताबिक रोहित को दलित जाति प्रमाण पत्र उसकी माँ ने दिलवाया था। जब उसे ये लगा कि उसमें हुआ फर्जीवाड़ा बाहर आ जायेगा तब पोल खुलने के भय से उसने आत्महत्या जैसा कदम उठा लिया। हालांकि उसकी माँ ने क्लोजर रिपोर्ट पर एतराज जताया तो पुलिस द्वारा अदालत में जांच जारी रखने की याचिका लगाने की बात कही। लेकिन जो क्लोजर रिपोर्ट पेश की जा चुकी है उसे पूरी तरह खारिज करना पुलिस के लिए मुश्किल होगा। घटना के आठ वर्ष बाद तक आत्महत्या के लिए मजबूर करने की बात गलत साबित करते हुए रोहित के दलित न होने का खुलासा यदि किसी भाजपा शासित राज्य की पुलिस द्वारा किया गया होता तब कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल अभी तक वहाँ की सरकार को दलित विरोधी बताकर आसमान सिर पर उठा लेते। लेकिन तेलंगाना में इसके पहले के. चंद्रशेखर राव की सरकार थी और बीते छह माह से काँग्रेस सत्तासीन है। ऐसे में पुलिस जाँच में रोहित द्वारा दलित न होने का खुलासा होने के भय से अपनी जान देने का कदम उठाये जाने की पुष्टि से दलित उत्पीड़न का आरोप भी सिरे से खारिज हो जाता है। काँग्रेस के लिए पुलिस द्वारा अदालत में पेश की गई क्लोजर रिपोर्ट गले की हड्डी बन गई है क्योंकि अपनी ही राज्य सरकार की पुलिस की रिपोर्ट को नकारना उसके लिए शर्मनाक स्थिति पैदा कर देगा। दूसरी तरफ यदि रोहित की माँ की माँग पर जाँच जारी रखने से राज्य सरकार इंकार करती है तो उस पर दलित विरोधी होने की तोहमत लगेगी। इसी डर से जाँच आगे बढ़ाये जाने की अर्जी लगाए जाने का निर्णय लिया गया। लेकिन क्लोजर रिपोर्ट जिस आधार पर पेश की गई उसको खारिज करना अब पुलिस के लिए भी असम्भव होगा। लोकसभा चुनाव के चलते काँग्रेस सरकार के राज में पुलिस द्वारा जाँच रिपोर्ट बंद करना बड़े राजनीतिक विवाद का कारण बन सकता है। काँग्रेस के साथ ही वामपंथी प्रचार तंत्र के लिए भी यह रिपोर्ट बड़ा धक्का है। देखना ये है कि रोहित की मौत पर दहाड़ें मारने वाले उसके फर्जी जाति प्रमाण पत्र पर क्या बोलते हैं?
- रवीन्द्र वाजपेयी
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