लोकसभा चुनाव अंतिम चरण में आ चुका है। राजनीतिक सरगर्मी चरम पर है। 1 जून को मतदान के बाद शाम को एग्जिट पोल के नतीजे प्रसारित होने के साथ ही परिणामों का हल्का संकेत भी मिल जायेगा। हालांकि स्थिति 4 जून को ही स्पष्ट होगी। राजनीतिक गरमागरमी तो समाचार माध्यमों में छाई हुई है किंतु आसमान से बरसती आग केवल सूचना बनकर रह गई है। समाचार माध्यम देश भर में बढ़ रहे तापमान के जो आंकड़े प्रसारित करते हैं वे भयावह भविष्य की चेतावनी हैं। लेकिन शायद ही किसी नेता ने इसे चुनाव का मुद्दा बनाया हो। वृक्षारोपण करते हुए नेताओं और पर्यावरण प्रेमियों के चित्र एक फैशन बन गई है। इसके तहत जितने पौधे देश भर में प्रतिदिन रोपित होते हैं उसका हिसाब लगाएं तो प्रतिवर्ष उनकी संख्या करोड़ों में होगी। लेकिन वास्तविकता ये है कि आधे से अधिक पौधे रखरखाव के अभाव में दम तोड़ देते हैं। चुनाव प्रचार में आये प्रत्याशी और उनके समर्थकों को नाली, सड़क, पुलिया, बिजली और पानी की कमी पर जनता के गुस्से का सामना करना पड़ता है। कुछ इलाकों के लोग मतदान का बहिष्कार भी करते हैं। लेकिन किसी भी निर्वाचन क्षेत्र के लोगों को इस बात पर नाराजगी जताते नहीं देखा सुना गया कि सरकार साल दर साल बढ़ती गर्मी से राहत देने कुछ नहीं करती। समाजसेवा करने वाले प्याऊ भले लगा दें किंतु धूप से बचाव के लिए सिर छुपाने का स्थान उपलब्ध कराने के बारे में कोई नहीं सोचता। शहरों में विकास के नाम पर सैकड़ों वर्ष पुराने वृक्ष काट डाले गए। यही हाल नये बन रहे राजमार्गों का है जिन पर दूर - दूर तक ऐसा कोई स्थान नजर नहीं आता जहाँ वृक्ष की छाँव मिल सके। कहने का आशय ये है कि बढ़ती गर्मी के कारणों की चर्चा तो खूब होती है परंतु उन्हें दूर करने के प्रति जो प्रयास होना चाहिए उनका अभाव होने से हालात हर साल पहले से खराब होते जा रहे हैं। एक जमाना था जब 40 डिग्री तापमान की खबर लोगों को डरा देती थी किंतु इन दिनों देश के बड़े इलाके में तापमान 45 डिग्री के इर्द गिर्द बना हुआ है। कुछ में तो पारा 47 - 48 डिग्री को छू रहा है। वहीं सट्टे के लिए विख्यात राजस्थान का फलोदी कस्बा 50 डिग्री का दंश भोग रहा है। अपनी वन संपदा के लिए प्रसिद्ध म.प्र के बड़े क्षेत्र में गर्म हवा के थपेड़े रेगिस्तान जैसा अनुभव करा रही हैं। उत्तर भारत का मैदानी भूभाग भी लू का प्रकोप झेल रहा है। भारतीय ऋतु चक्र के अनुसार अप्रैल, मई और जून का महीना ग्रीष्म काल माना जाता है। उत्तर भारत में तो मानसून आते तक आधी जुलाई बीत जाती है। लेकिन तापमान जिस तरह ऊपर जा रहा है उसे ऋतु से जोड़कर उपेक्षित नहीं किया जा सकता। इस बारे में जिस प्रकार की उपेक्षा और लापरवाही बरती गई उसके कारण स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। आधुनिक जीवन शैली भी इसके लिए उत्तरदायी है। सुविधाओं की अंधी दौड़ में पर्यावरण के साथ किया जा रहा अत्याचार भी बढ़ते तापमान का कारण है। एक समय था जब ए.सी रईसों की चीज माना जाता था किंतु अब वह मध्यवर्गीय परिवारों में भी सामान्य हो चला है। किसी बहुमंजिला इमारत पर बाहर से नजर डालें तो उसमें लगे सेकड़ों ए.सी अंदर बैठने वालों को भले ही शीतलता प्रदान करते हों किंतु वे बाहरी वातावरण को उतना ही गर्म कर देते हैं। आजकल ए.सी वाहनों की खफत भी बढ़ती जा रही है । उनकी वजह से भी तापमान में अतिरिक्त वृद्धि हो रही है। ये देखते हुए ये जरूरी लगता है कि आम जनता इस दिशा में न सिर्फ जागरूक हो अपितु मुखर भी। उसे बिजली, पानी, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के साथ ही पर्यावरण की लगातार बिगड़ रही स्थिति पर भी अपनी चिंता व्यक्त करनी चाहिए। केवल सरकार और चंद पर्यावरण प्रेमियों के भरोसे सब छोड़कर बैठ जाने का ही परिणाम है जो हर साल रिकार्ड तोड़ रही गर्मी राजनीतिक विमर्श और चुनावी घोषणा पत्रों का हिस्सा नहीं बन सकी। मौजूदा लोकसभा चुनाव में मतदान का प्रतिशत कम रहने के लिए भीषण गर्मी को भी एक कारण माना जा रहा है। इसके चलते भविष्य में चुनाव ऐसे समय कराये जाने की चर्चा भी चल पड़ी है जब तापमान कम हो। लेकिन कोई भी तापमान की उड़ान को रोकने के उपायों की बात नहीं कर रहा। इस चुनाव में सभी राजनीतिक दलों ने विभिन्न विषयों पर अपनी नीति और कार्य योजना मतदाताओं के समक्ष रखी किंतु किसी ने भी ये वायदा नहीं किया कि सत्ता में आने के बाद अगले पाँच वर्षों में देश को गर्म होने से बचाने के लिए सरकार क्या कदम उठायेगी ? जब तक जनता इसे लेकर दबाव नहीं बनाती तब तक ए.सी में बैठे नेताओं को होश नहीं आयेगा।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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