लोकसभा चुनाव में विपक्ष ने संविधान को एक बड़ा मुद्दा बनाया हुआ है। भाजपा द्वारा 400 पार के नारे को लेकर सभी विपक्षी दल ये प्रचार करने में जुटे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इतना बड़ा बहुमत हासिल करने के बाद आरक्षण समाप्त करने जैसा कदम उठाएंगे जिसके लिए संविधान बदलना होगा। इस मुहिम का मकसद दलित समुदाय को अपनी ओर खींचना है जो धीरे - धीरे भाजपा के साथ आने लगा था। उ.प्र में भाजपा की चुनावी सफलता का श्रेय जिस सोशल इंजीनियरिंग को दिया जाता है उसकी वजह से गैर यादव मतदाताओं ने भी सपा का साथ छोड़कर भाजपा को समर्थन दिया। हालांकि आरक्षण को लेकर रा.स्व.संघ और भाजपा को घेरने का विपक्षी पैंतरा नया नहीं है। 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव के समय संघ प्रमुख डाॅ. मोहन भागवत के एक बयान को लालू प्रसाद यादव ने मुद्दा बना लिया जिसमें उन्होंने आरक्षण की समीक्षा की बात कही थी । हालांकि संघ की ओर से आरक्षण को बनाए रखने का आश्वासन दोहराते हुए कहा गया कि जब तक उसकी जरूरत है आरक्षण जारी रहना चाहिए। उस चुनाव में भाजपा को हुए नुकसान के लिए डाॅ. भागवत के संदर्भित बयान को जिम्मेदार माना गया। लेकिन बाद के अनेक चुनावों में दलित और पिछड़ी जातियों का भरपूर समर्थन भाजपा की झोली में आया। इसी का परिणाम है कि इन वर्गों के सर्वाधिक सांसद भाजपा के हैं। प्रधानमंत्री स्वयं पिछड़ी जाति से हैं जबकि उनकी सरकार बनने के बाद रामनाथ कोविंद और द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति बनाया गया जो क्रमशः अनु. जाति और अनु. जनजाति वर्ग से हैं। वर्तमान उपराष्ट्रपति भी पिछड़ी जाति से आते हैं। केंद्रीय मंत्रीमण्डल में भी जातिगत संतुलन है। म.प्र जैसे भाजपा के गढ़ में 2003 से अब तक भाजपा के जो चार मुख्यमंत्री हुए वे सभी पिछड़ी जातियों के रहे। ऐसे में ये कहना कि मोदी सरकार वापस आने पर संविधान बदलकर आरक्षण खत्म कर देगी बेहद शरारत पूर्ण है। राहुल गाँधी सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तय की गई 50 प्रतिशत आरक्षण की सीमा को समाप्त करने का वायदा कर रहे हैं। तमिलनाडु जैसे राज्यों में ऐसा हो भी चुका है। आर्थिक दृष्टि से कमजोर सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण दिया जा रहा है। मुस्लिमों को आरक्षण का मुद्दा भी गर्म है जिसका भाजपा विरोध कर रही है। ऐसे में आरक्षण की सीमा को बढ़ाकर नया बखेड़ा खड़ा करना चुनावी लाभ दे सकता है किंतु कालांतर में ये गले की फांस बने बिना नहीं रहेगा। आज सर्वत्र बेरोजगारी की चर्चा हो रही है जिसका सीधा - सीधा तात्पर्य सरकारी नौकरी न मिलना है। हर पार्टी सत्ता में आने के लिए नौकरियों का आश्वासन देती है किंतु सरकार में आने के बाद उनके लिए वैसा करना संभव नहीं हो पाता। 2004 में कांग्रेस ने रोजगार देने के नाम पर चुनाव जीता किंतु मनरेगा से ज्यादा वह कुछ न कर सकी। यदि 10 साल के डाॅ. मनमोहन सिंह के राज में भरपूर सरकारी नौकरियां बांटी जातीं तब 2014 में काँग्रेस की इतनी दुर्गति न होती। राहुल को ये भी याद रखना चाहिए कि मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद भी उ.प्र और बिहार में सपा और राजद के साथ सभी पिछड़ी जातियाँ लंबे समय तक गोलबंद नहीं रह सकीं। बसपा भी सवर्णों को गालियाँ देने के बाद ब्राह्मणों को आरक्षण देने का समर्थन करने लगी। आज काँग्रेस को जातिगत जनगणना जैसे मुद्दे याद आ रहे हैं। लेकिन लालू प्रसाद यादव जैसे मंडलवादी के साथ सरकार चलाते समय उन्हें आरक्षण की सीमा 50 फीसदी से बढ़ाये जाने की याद क्यों नहीं आई? अब जबकि उनकी पार्टी क्षेत्रीय दलों के रहमो करम पर निर्भर हो गई तब उन्हें ये सब सूझ रहा है जो, निरा अवसरवाद है। सरकारी नौकरियों का बढ़ना अब सपने देखने जैसा है। रोजगार के अवसर बढ़ाये जाने की कार्ययोजना जरूर कोई हो तो उसे वे जनता के सामने रखें। सरकार के लिए वेतन भत्ते ही असहनीय होते जा रहे हैं। मुफ्त योजनाओं की वजह से भी खजाना खाली हो रहा है। बेहतर हो वायदे वही किये जाएं जो पूरे हो सकें। मोदी सरकार अपनी तमाम उपलब्धियों के बाद भी अधूरे रह गए वायदों के कारण कुछ मुद्दों पर रक्षात्मक होने मजबूर है। विपक्ष को इससे सबक लेना चाहिए। इसी तरह संविधान बदल दिया जाएगा और ये चुनाव आख़िरी होगा जैसी बातें उछालने से भी कुछ हासिल नहीं होने वाला। श्री गाँधी 2019 में भी ऐसे ही बड़बोलेपन का नुकसान उठा चुके हैं। भाजपा के 400 पार दावे का तो वे खूब मजाक उड़ाते हैं लेकिन काँग्रेस को कितनी सीटें मिलेंगी ये बताने का साहस वे आज तक नहीं जुटा सके जबकि मतदान के चार चरण पूरे हो चुके हैं।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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