लोकसभा चुनाव के तीसरे चरण का मतदान मंगलवार 7 मई को होगा। विभिन्न राज्यों की 94 सीटों के मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। पिछले दो चरणों में 2019 की तुलना में मतदान का प्रतिशत कम रहने से राजनीतिक पार्टियां हतप्रभ हैं। चुनाव आयोग भी चिंतित है। हर सीट पर मत प्रतिशत को लेकर अलग - अलग कारण बताये गए। गर्मी, शादियाँ , फसल की कटाई आदि कम मतदान की वजह बताई गई जिसने उम्मीदवारों के अलावा राजनीतिक दलों और चुनाव सर्वेक्षण करने वालों के माथे पर भी चिंता की लकीरें खींच दी हैं। भले ही एनडीए और इंडिया गठबंधन ये आत्मविश्वास जता रहे हों कि मत प्रतिशत में गिरावट उनके पक्ष में है लेकिन सच्चाई ये है कि सत्ता में बैठे दल के साथ ही जो जहाँ विपक्ष में है उसकी भी नींद उड़ी हुई है । कम मतदान को अमूमन यथास्थिति बनाये रखने वाला माना जाता रहा है जबकि अधिक मतदान को सत्ता परिवर्तन का संकेत । लेकिन हाल के कुछ वर्षों में उक्त अवधारणा बदली है। मसलन कम मतदान में भी कई सरकारें बदल गई जबकि ज्यादा मतदान सत्ताधारी पार्टी के पक्ष में गया। भारत इस समय संघीय गणराज्य का जीवंत उदाहरण है। केंद्र में बैठी सरकार की विरोधी विचारधारा वाले दलों की सरकारें अनेक राज्यों में होने से चुनाव के परिणाम अनुमानों के विपरीत भी जाने लगे हैं। अनेक विख्यात चुनाव विश्लेषकों को तो बाद में माफी भी मांगना पड़ गई। कुछ टीवी चैनल भी अपने गलत अनुमानों के कारण शर्मसार हुए। ये देखते हुए कम मतदान को लेकर कोई भी निष्कर्ष निकालना मुश्किल हो गया है। कल होने वाले मतदान मेंं भी यदि प्रतिशत 2019 से कम रहता है तब ये कहा जा सकेगा कि मतदाता की उदासीनता को उत्साह में परिवर्तित करने में राजनेता विफल साबित हो रहे हैं। हालांकि जीत हार तो होगी ही। वैसे भी परिणाम आने के बाद विजयी और पराजित प्रत्याशी को प्राप्त मतों का अंतर चुनावी विश्लेषकों के बुद्धिविलास या माथापच्ची तक सिमटकर रह जाता है। एक वोट से जीतने वाला सांसद या विधायक बन जाता है जबकि हारने वाले के हाथ खाली रहते हैं । फर्क ये जरूर पड़ता है कि कम अंतर से पराजित व्यक्ति के मन में भविष्य को लेकर उम्मीदें कायम रहती हैं जबकि लाखों से हारे प्रत्याशी का हौसला पस्त हो जाता है। और उसकी पार्टी भी उसे संभावना शून्य मानकर किनारे कर देती है। यही वजह है कि हर प्रत्याशी ज्यादा से ज्यादा मत अर्जित करने का प्रयास करता है। उल्लेखनीय बात ये है कि देश की सरकार चुनने के लिए हो रहे इस चुनाव में भी स्थानीय मुद्दे जोर मार रहे हैं। दरअसल मतदाताओं का एक वर्ग ऐसा है जो लोकसभा और विधानसभा चुनाव में फर्क नहीं कर पाता। विभिन्न चैनलों के संवाददाता देश भर में घूम कर मतदाताओं से बात कर रहे हैं । उसके जो वीडियो सामने आये उनसे ये स्पष्ट हो जाता है कि मत देने वाले को केंद्र और राज्य के चुनाव का अंतर ही नहीं पता। ये सब देखते हुए अब इस बात की जरूरत महसूस् की जाने लगी है की टुकड़ों में बंट चुके चुनाव को एकजुट किया जावे । स्मरणीय है गत वर्ष के अंतिम महीनों में जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए थे वहाँ के अनेक मतदाता कुछ महीनों के भीतर हो रहे इस चुनाव में राज्य सरकार के कामकाज को मुद्दा बना रहे हैं। विपक्ष भी बजाय राष्ट्रीय के स्थानीय सवाल उठाकर अपना रास्ता साफ करना चाहता है। प. बंगाल, तमिलनाडु कर्नाटक और केरल जैसे राज्यों में जहाँ विपक्ष की मजबूत राज्य सरकारें हैं वहाँ का चुनावी परिदृश्य पूरी तरह अलग है। इसी तरह उड़ीसा और आंध्र में विधानसभा चुनाव भी लोकसभा के साथ होने से वहाँ पूरी तरह से राज्य सरकार का कामकाज कसौटी पर है। इसीलिए चाहे नरेंद्र मोदी हों या राहुल गाँधी, जो भी केंद्रीय नेता वहाँ जाता है , राष्ट्रीय मुद्दों की बजाय राज्य सरकार को कटघरे में खड़ा करने की रणनीति अपनाता है। ऐसा ही मंजर भाजपा शासित राज्यों में है जहाँ विपक्ष वहाँ के मुख्यमंत्रियों को निशाना बना रहा है। मुद्दों के इसी घालमेल ने मतदाताओं को उदासीन भी बना दिया है। राजनीतिक मतभेदों की स्थिति में केंद्र और राज्य दोनों एक दूसरे को दोषी बताकर जनता की निगाहों में पाक - साफ बने रहना चाहते हैं। जिससे मतदाताओं में भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो गई है। और यह भी एक कारण है मतदान का प्रतिशत कम होने का। यदि कल तीसरे चरण में भी मतदाताओं ने पहले दो चरणों जैसी सुस्ती या उदासीनता दिखाई तब ये राजनेताओं और राजनीतिक दलों के लिए विचारणीय होगा क्योंकि इससे साबित हो जायेगा कि आम जनता का बड़ा वर्ग इस बात से निराश हो चला है कि सत्ता तो बदलती है किंतु व्यवस्था में बड़ा बदलाव नहीं होता। और ये भी कि चाहे सत्ता हो या विपक्ष दोनों जितना कहते हैं उतना करते नहीं ।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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