एक प्रत्याशी किसी मंंदिर में गया और आरती की थाली में कुछ रुपये डाल दिये। विरोधी पक्ष ने उसका वीडियो निर्वाचन अधिकारी को भेजा जिसने उसे नोटिस देकर जवाब मांग लिया। ऐसा ही एक उम्मीदवार द्वारा भिखारी को पैसे देने पर हुआ। चुनावों के दौरान प्रत्याशी द्वारा मतदाताओं को पैसा या कोई वस्तु देना आचार संहिता का उल्लंघन माना जाता है। हालांकि शायद ही इस वजह से किसी का चुनाव रद्द हुआ होगा। इसके ठीक उलट किसी प्रत्याशी या राजनीतिक पार्टी द्वारा मतदाताओं को धनराशि या कोई वस्तु देने का वायदा चुनाव घोषणा पत्र में किया जाता है तो आपतिजनक नहीं माना जाता। मतदाता को ग्राहक समझकर लुभाने का चलन तमिलनाडु से शुरू हुआ जहाँ टीवी, मिक्सी और मंगलसूत्र जैसे वायदे कर चुनावी मुकाबला जीता जाने लगा। धीरे - धीरे ये फार्मूला अन्य राजनीतिक दल भी अपनाने लगे। बात बढ़ते - बढ़ते नगद राशि देने तक आ पहुंची। साइकिल, लैपटाॅप, टेबलेट जैसी चीजें भी आम हो चली हैं। आटो वालों को मुफ्त ईंधन, महिलाओं को मुफ्त रसोई गैस सिलेंडर जैसे वायदे भी सुनाई देते हैं। राष्ट्रीय या प्रमुख क्षेत्रीय दल यदि ऐसा करें तो बात समझ में भी आती है किंतु जो पार्टियां दो - चार उम्मीदवारों तक सीमित हैं वे भी जब आसमां को जमीन पर उतारने का वायदा करती हैं तब हँसी आती है। रेवड़ियां बाँटकर सत्ता का सुख लूटने की इस संस्कृति को लेकर राजनीतिक दलों का रवैया विरोधाभासी है। मसलन मोदी सरकार गरीबों को पाँच किलो खाद्यान्न देती है तो काँग्रेस उसका मजाक उड़ाती है। लेकिन उसने इस चुनाव में 10 किलो का वायदा कर डाला। विभिन्न राज्यों में महिलाओं और वृद्धों को आर्थिक सहायता के तौर पर प्रतिमाह निश्चित राशि दी जाती है। कांग्रेस हर महिला को सालाना 1 लाख देने का वायदा बढ़ चढ़कर कर रही है। अन्य पार्टियां भी पीछे नहीं हैं। इन वायदों को पूरा करने के लिए सरकारी खजाने पर पड़ने वाले असर की चिंता किसी को नहीं है। शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए सरकार यदि सहायता दे तो उसका स्वागत होना चाहिए। इसी तरह निराश्रित वृद्धों और दिव्यांगों को सहायता भी मानवीयता की दृष्टि से उचित है। छात्र - छात्राओं को फीस, पुस्तकें, गणवेश, साइकिल आदि देने का भी औचित्य है। लेकिन इनसे जो वर्ग लाभान्वित हो रहा है वह तो खुश है किंतु बाकी को लग रहा है कि राजनीतिक पार्टियां वोटों का थोक सौदा करने के लिए उनके कंधों पर करों का भार बढ़ा रही है। इसीलिए असंतोष बढ़ रहा है। गत वर्ष कर्नाटक विधानसभा के चुनाव में काँग्रेस द्वारा घोषणापत्र में किये गए कुछ वायदों को गारंटी का नाम दिया गया जिसका लाभ भी उसे मिला। उसके बाद फिर भाजपा में मोदी की गारंटी चल पड़ी। मतदाता निश्चित रूप से इनके प्रति आकर्षित होते हैं। महिलाओं को मुफ्त बस यात्रा, 100 यूनिट तक निःशुल्क बिजली और पानी जैसे वायदे अब आम हो चले हैं। लेकिन गत दिवस सर्वोच्च न्यायालय ने कर्नाटक के चुनाव में दी गई गारंटियों के विरुद्ध प्रस्तुत याचिका ये कहते हुए खारिज कर दी कि जनकल्याण की योजनाओं के वायदे कदाचरण की श्रेणी में नहीं आते। इस फैसले के बाद अब आगामी चुनावों में मुफ्त उपहारों का दायरा बढ़ता जायेगा। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद अनेक ऐसी ही योजनाएं चलाकर लोकप्रिय बने हुए हैं किंतु वे भी इनके दूरगामी नुकसानों के प्रति आगाह कर चुके हैं। चूंकि सर्वोच्च न्यायालय ने ही चुनावी वायदों में नगद राशि या ऐसे ही अन्य वायदों को अनुचित मानने से मना कर दिया है इसलिए चुनाव जीतने के लिए राजनीतिक बिरादरी मुफ्तखोरी को बढ़ावा देने में नहीं हिचकिचायेगी। ये देखते हुए जरूरी हो गया है कि चुनाव घोषणापत्र में किये गए वायदों को पूरा करने की कानूनी बाध्यता तय की जाए। राजनीतिक दलों को ये बताना अनिवार्य किया जाए कि इन खैरातों के लिए आर्थिक संसाधन कहाँ से आएंगे? जितनी भी मुफ्त योजनाएं चलाई जा रही हैं वे सरकारी खजाने को खाली करने का कारण बन रही हैं। परिणाम स्वरूप सरकार पर कर्ज का भार बढ़ता जा रहा है जिसका दुष्परिणाम अंततः जनता को भोगना पड़ता है। इसलिए इस पर रोक लगानी जरूरी है। सर्वोच्च न्यायालय को चाहिए वह घोषणापत्र को शपथ पत्र मानकर उसमें किये गए वायदों को पूरा करने को अनिवार्य बनाये। वरना गरीबी हटाने के वायदों के बावजूद गरीबी बढ़ती जाएगी।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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