Friday, 3 May 2024

अंध समर्थन और विरोध दोनों पत्रकारिता के सिद्धांतों के प्रतिकूल


आज विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस है | संरासंघ द्वारा 1993 में  इसकी शुरुआत की गयी थी | द्वितीय विश्वयुद्ध  युद्ध के बाद उपनिवेशवाद की सांसें उखड़ने लगीं और गुलाम बनाकर रखे गए  देश स्वाधीन होने लगे।  उनमें से अधिकतर  ने प्रजातंत्र  को अपनाया | यद्यपि  बाद में  कुछ  तानाशाही में तब्दील हो गए। वहीं कुछ ने साम्यवादी शैली स्वीकार की जिसमें अभिव्यक्ति की आजादी को कोई स्थान नहीं था। लेकिन भारत सहित तमाम ऐसे देश हैं जिनमें  समाचार माध्यमों को पूर्ण स्वतंत्रता दी गई | इसकी वजह ये  थी  कि स्वाधीनता संग्राम  के बड़े  नेता  पत्रकारिता से जुड़े रहे |  महात्मा गांधी और पं. नेहरु  ने भी अख़बार शुरू किये | बापू तो अपने पत्र में स्वयं लिखते भी थे | स्वाधीनता  के बाद  कांग्रेस के अनेक नेता  मतभिन्नता के कारण उससे बाहर आ गए और समाचार पत्र के माध्यम से  अपने विचारों से  जनता को अवगत करवाने लगे।  डा. राममनोहर लोहिया , जयप्रकाश नारायण , अटल बिहारी वाजपेयी , दीनदयाल उपाध्याय , चंद्रशेखर , जैसे नेताओं ने या तो अखबार चलाये  या विभिन्न पत्र - पत्रिकाओं में  लेखन कर अभिव्यक्ति की आजादी को  सुदृढ़  करने में योगदान दिया | विभिन्न राजनीतिक दलों ने भी अपने मुखपत्र निकाले जिनके माध्यम से  वे अपनी नीतियों का प्रचार करते रहे | दूसरी तरफ बड़े औद्योगिक घराने भी समाचार पत्र और पत्रिकाओं के प्रकाशन में कूद पड़े । यद्यपि  उनका मकसद  व्यापारिक रहा परंतु आजादी के बाद के कुछ  दशकों तक उनमें कार्यरत सम्पादकों को लेखन की पर्याप्त आज़ादी थी। लेकिन लाल बहादुर शास्त्री की असामयिक मृत्यु के बाद इंदिरा गांधी के सत्ता में आने पर जब  प्रतिबद्ध न्यायपालिका की चर्चा शुरू हुई उसी समय से समाचार माध्यमों पर नियन्त्रण करने की सोच ने जन्म लिया । और फिर  किसी न किसी बहाने सरकार की आलोचना करने वाले समाचार पत्रों के शासकीय विज्ञापन रोककर उनका मुँह बन्द करने का प्रयास किया जाने लगा । आपातकाल में तो सेंसरशिप लगाकर श्रीमती गांधी ने प्रेस की स्वतंत्रता का गला ही घोंट डाला।  सैकड़ों समाचार पत्रों में
ताले जड़ दिये गए । उस कृत्य ने उनकी छवि को आम जनता की निगाह में गिरा दिया जिसका दंड उन्हें चुनाव में हार के रूप में  झेलना पड़ा | वैसे तो दोबारा किसी ने वह गुस्ताखी नहीं की  किन्तु हुक्मरानों को एक बात समझ में आ गई कि पत्रकारिता में आ चुके रीढ़विहीन लोगों को झुकाया जा सकता है | आपातकाल  में  भी कुछ अखबार  और पत्रकार शर्मनाक  स्तर तक चले गए  जिनके लिए लालकृष्ण आडवाणी ने कटाक्ष किया था कि श्रीमती गांधी ने तो कोहनी के बल चलने कहा  किन्तु आप तो रेंगने लगे | आपातकाल के बाद  पत्रकारिता में नई पीढ़ी के जो  नौजवान आये उन पर जयप्रकाश जी के आन्दोलन का प्रभाव  था | वह वर्ग कांग्रेस और रास्वसंघ दोनों का विरोधी था | ये कहना गलत नहीं होगा कि इन नये पत्रकारों में ज्यादातर का जुड़ाव परोक्ष तौर पर वामपंथी रूमानियत से था |  राजीव गाँधी के दौर में देश  कम्प्यूटर और मोबाइल क्रांति से परिचित  हुआ जिससे पूरा परिदृश्य बदल गया | टेलीविजन पर सरकारी एकाधिकार हटने से निजी चैनलों की बाढ़ आ गयी | इंटरनेट के पदार्पण  ने तो समाचार जगत की शक्ल  और रंग - ढंग  ही बदल डाले | इसके चलते बीते तीन दशक में  प्रेस शब्द अपना असर खोता जा रहा है | ऊपर से सोशल मीडिया ने पत्रकारिता का जैसा सामान्यीकरण किया वह हैरत पैदा करने वाला  है ।परिणाम स्वरूप प्रेस की स्वतंत्रता उपेक्षित होने लगी। व्हाटस एप ने इस पेशे की गम्भीरता ही तार - तार कर डाली । हमारे देश में पत्रकारिता  पर सरकार की भक्ति का आरोप लगता है | दरअसल  पत्रकार भी   समर्थक और  विरोधी दो खेमों में बंट गए हैं। पहले के लिए मोदी भगवान हैं तो दूसरे के लिए शैतान से भी बदतर | यू ट्यूब चैनलों  से हो रही पत्रकरिता का और ही रंग है | उस आधार ये कहना गलत न होगा कि प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर रोना – धोना बेकार है क्योंकि जब कोई पत्रकार एकपक्षीय हो जाए तब वह पत्रकार नहीं प्रवक्ता हो जाता है | सरकार का अंध समर्थन और अँधा विरोध दोनों पत्रकारिता के सिद्धांतों के विरुद्ध हैं | आज भारत में समाचार माध्यमों की आजादी का रोना रोने वालों में वे लोग भी शामिल हैं  जो सेंसरशिप लगाने वालों की तरफदारी करते थे |  विदेशी पूंजी और पुरस्कारों के लालच में पत्रकारों के  एक वर्ग का राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध काम करना अच्छा संकेत नहीं है | लोकतंत्र और स्वतंत्र पत्रकारिता  सभ्य समाज की पहिचान हैं  | उस दृष्टि से आज  प्रेस की स्वतंत्रता के साथ ही उसके कर्तव्यों की चर्चा का भी अवसर है | कोई भी  स्वतंत्रता बिना दायित्वबोध के कारगर नहीं होती ,ये बात  समझनी होगी | पैकेज की चाहत में अपनी इज्जत का सौदा करने वाले स्वतंत्रता की बात करने का हक खो बैठे हैं | 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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