Tuesday, 11 June 2024

जैसी सोच वैसी अवधारणा



लोकसभा के चुनाव में सोशल मीडिया ने बड़ी भूमिका निभाई है। अब जब सरकार बन गई, विभाग बंट गये इसके बाद भी यह वर्ग सक्रिय है। जिसने चुनाव में संविधान और आरक्षण खत्म करने जैसी अवधारणा फैलाई थी। आज सरकार बनने के बाद और विभागों का बंटवारा हो जाने के बाद भी भ्रम पैदा करने की स्थिति जारी है। यह चुनावी युद्ध जीतने का एक कौशल हो चला है। एक वरिष्ठ वकील ने कहा था कि सरकार चाहे कोई भी बना ले लेकिन उसका संचालन तो कांग्रेस और वाम विचारधारा ही करेगी? वह न्यायालय में बार-बार मामले ले जायेगी और सत्ता में अपना हस्तक्षेप बरकरार रखेगी। बात तो इससे भी आगे हो गई है। वर्तमान में देश की सरकार का संचालन एक सशक्त विचारधारा के हाथें में है। उसको क्या करना है यह पता भी है। वह कर भी रही है। लेकिन समर्थक द्वंद्व में हैं।  कहा जा रहा है कि भाजपा सारे प्रमुख धार्मिक स्थलों वाले चुनाव हार गई। द्वंद्व में फंसे लोग यह विचार नहीं कर पा रहे हैं कि देवभूमि उत्तराखंड में सभी सीटें, भगवान शिव की नगरी काशी और महाकाल की नगरी उज्जैन और कृष्ण जन्मभूमि मथुरा की संसदीय सीट किसके पास है? देश के बहसंख्यक समाज की यही विडंबना रही है कि वह खुद पर भरोसा करने की बजाए अफवाहों पर भरोसा करता है। नरेन्द्र मोदी देश के पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने लगतार तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली है। लेकिन कहा यह जा रहा है कि इससे पहले लगातार तीन बार शपथ लेने का रिकार्ड पंडित नेहरू के नाम है। पंडित नेहरू आजादी के महानायक थे और जनता के पास उस समय कोई खास विकल्प नहीं थे। हिन्दू-मुसलमान की मानसिकता से वोट नहीं दिये जाते थे। मोदी के साथ ऐसा वातावरण नहीं है। मोदी सांस्कृतिक बदलाव के महानायक हैं लेकिन उस संस्कृति को फिर से स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं जिसके जानकार आत्मविश्वास में कमजोर हैं। उन्हें खुद पर भरोसा ही नहीं है। इसलिए चुनाव के परिणाम में सीटों का कम होना मायने नहीं रखता है। यह सच है कि यह मिलीजुली सरकार है। किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला। देश ने राजीव गांधी के बाद मिलीजुली सरकारों का दौर देखा है। राजीव गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस की अगुवाई में नरसिंह राव की सरकार बनी थी। मौत के बाद की सहानुभूति के बाद कांग्रेस को 244 सीटें मिली थीं अब तो भयंकर प्रतिस्पर्धा में 240 सीटें मिली हैं। मतलब मोदी की लोकप्रियता काफी ऊँची है। मिलीजुली सरकारों ने काम का निष्पादन सलीके से नहीं किया क्योंकि उन्हें सरकार को बचाने पर अधिक ध्यान देना था। मोदी 3.0 में ऐसी कोई विवशता नहीं है। यह सरकार के गठन, विभाग बंटवारे और काम की शुरूआत में दिखाई दे रहा है। मोदी को बहुमत की सरकार क्यों नहीं मिली इसको लेकर भी भ्रम फैलाने के प्रयास हो रहे हैं। समर्थक यह मान रहे हैं कि मोदी का अंहकार और मनमाने निर्णयों के कारण उपजी नाराजगी से ऐसा हुआ है। यह उथली सोच है। जो व्यक्ति उपलब्धियों के परिपूर्ण और अपने विजन को क्रियान्वित करने की क्षमता रखता है उसके तेज और आत्मविश्वास को नकारा व्यक्ति अहंकार ही समझता है। जबकि कम सीटें आने का कारण आजादी के बाद भारत को अपना घर समझने वाला वह समुदाय है जिसने पाकिस्तान के रूप में अपना हिस्सा ले लिया था और अब भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत सत्ता पर अधिकार चाह रहा है। बदले में बहुसंख्यक समाज ठीक उसी प्रकार का उदारवादी बना हुआ है और अपने नायक की खामियां खोजने, देखने और विश्वास करने में लगा है जैसा वह पहले भी करके विनाश देख चुका है। यह  अवधारणा विकसित करने वालों के कौशल का परिणाम है। यदि खुली आंखों के साथ विवेक का इस्तेमाल कर लिया जायेगा तो वह सच दिख जायेगा जो राष्ट्रवादी विचार समझाना चाहता है।

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