आज से 18 वीं लोकसभा का सत्र प्रारंभ हो रहा है। इस बार का सदन काफी बदला हुआ है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पार्टी के पास स्पष्ट बहुमत नहीं होने से वे एनडीए में शामिल सहयोगी दलों के समर्थन पर निर्भर रहेंगे। इनमें जनता दल (यू) और तेलुगु देशम पार्टी प्रमुख हैं जिनके मुखिया क्रमशः नीतीश कुमार और चंद्रा बाबू नायडू को लेकर ये आशंका व्यक्त की जा रही है कि वे अधिक धन की मांग के साथ विशेष राज्य का दर्जा मांगेंगे। दोनों को चालाक राजनेता माना जाता है जो राजनीतिक सौदेबाजी में किसी भी तरह का संकोच नहीं करते। इसके अलावा भले ही विपक्ष बिखरा हुआ है किंतु काँग्रेस का मुख्य विपक्षी दल बन जाना और इंडिया गठबंधन के साथ जुड़ी पार्टियों की संख्या 231 तक तक पहुँच जाने से सत्ता पक्ष के सामने कड़ी चुनौती आना अवश्यम्भावी है। इसका संकेत प्रोटेम स्पीकर की नियुक्ति से मिल गया। इस पद का कोई राजनीतिक महत्व नहीं है किंतु काँग्रेस सहित शेष विपक्ष का आरोप है कि केरल से 8 बार के सांसद के. सुरेश को उपेक्षित कर उड़ीसा से 7 वीं बार जीते भर्थहरि मेहताब को नये सदस्यों को शपथ दिलवाने के लिए प्रोटेम स्पीकर बना दिया क्योंकि वे भाजपा के हैं। काँग्रेस श्री सुरेश के दलित होने को मुद्दा बना रही है वहीं सत्ता पक्ष का कहना है कि श्री महताब के चयन का आधार उनका लगातार जीतना है जबकि श्री सुरेश बीच - बीच में हारे भी हैं। विपक्ष ने प्रोटेम स्पीकर के लिए बनाये गए पैनल में शामिल उसके सांसदों द्वारा अपने दायित्व का निर्वहन करने से मना कर ये जता दिया है कि वह छोटी - छोटी बातों पर सत्ता पक्ष से टकराव करने पर आमादा रहेगा। हालांकि इस सत्र का सबसे पहला मुकाबला लोकसभा स्पीकर के चुनाव में होगा। विपक्ष ने तेलुगु देशम को उकसाया है कि वह अपना उम्मीदवार खड़ा करे तो वह उसे समर्थन देगा। हालांकि उसकी ओर से कोई जवाब नहीं मिला। विपक्ष ने ये शर्त भी रखी है कि यदि उपाध्यक्ष पद परंपरानुसार उसे दे दिया जावे तो वह स्पीकर पद के लिए उम्मीदवार नहीं उतारेगा। उक्त दोनों मामलों में सत्ता पक्ष ने चुप्पी साध रखी है। शुरू में खबर उड़ी कि नीतीश और चंद्र बाबू अपनी पार्टी का अध्यक्ष चाहते हैं। लेकिन भाजपा ने संभवतः उनको मना लिया है और आंध्र प्रदेश की राजमहेंद्रवरम सीट से जीतीं प्रदेश भाजपा अध्यक्ष पुरंदेश्वरी स्पीकर की प्रत्याशी बनाई जा सकती हैं जो चंद्र बाबू की सगी साली भी हैं। यदि भाजपा अपने अन्य किसी उम्मीदवार को स्पीकर चुनवाने में कामयाब हो गई तब राज्यसभा की तरह से ही लोकसभा में भी सदन के उपाध्यक्ष का पद किसी सहयोगी दल को दे दिया जाएगा। ऐसे में पहले मुकाबले में हारना विपक्ष के लिए बड़ा झटका होगा । इसलिये वह विभिन्न मुद्दों पर सरकार को घेरने का हरसंभव प्रयास करेगा किंतु इसके लिए इंडिया गठबंधन की एकजुटता जरूरी है जिससे आम आदमी पार्टी तो किनारा कर चुकी है जबकि तृणमूल काँग्रेस पार्टी साथ रहते हुए भी अपना अलग अस्तित्व जताती रहती है। जहाँ तक प्रश्न सत्ता पक्ष का है तो भाजपा को हालांकि अपना कोर एजेंडा लागू करने में परेशानी पैदा होगी किंतु वह बाकी के प्रस्ताव पारित करवाने में अपने सहयोगियों के बल पर सफ़ल हो जाएगी। विपक्ष को चूंकि पूर्वापेक्षा ज्यादा समय सदन में मिलेगा इसलिये उसके लिए यही फ़ाययदेमंद होगा कि सदन चले। यद्यपि सदन को सुचारु रूप से चलाना सत्ता पक्ष की जिम्मेदारी मानी जाती है और इसीलिए संसदीय कार्य मंत्री सभी दलों के नेताओं से समन्वय बनाकर उसे चलाने का प्रयास करते हैं। लेकिन सदन में विपक्ष द्वारा हंगामा किये जाने के कारण सत्ता पक्ष को बिना बहस के प्रस्ताव पारित करने का अवसर मिल जाता है। 17 वीं लोकसभा में अनेक महत्वपूर्ण कानून विपक्ष के बहिर्गमन या निलंबन के कारण बिना बहस के पारित कर दिये गए। इस लोकसभा में विपक्ष को अपने संख्याबल का सही उपयोग करना है तो उसे सदन चलाने में सहयोग देना चाहिए ताकि उसके सांसद ज्यादा से ज्यादा अपना दृष्टिकोण देश के सामने रख सकें। दूसरी बात विपक्ष को केवल विरोध के लिए विरोध करने की गलती से बचकर बुद्धिमत्ता के साथ पेश आना चाहिए। वह उसे मिले बहस के अवसरों का जितना बेहतर उपयोग करे उतनी ही उसकी छवि सुधरेगी। उल्लेखनीय है पिछली दो लोकसभाओं में विपक्ष के प्रभावहीन प्रदर्शन के कारण ही श्री मोदी का विकल्प न होने की अवधारणा जनमानस में घर कर चुकी थी। इसीलिए विपक्ष की एकजुटता के बावजूद भाजपा 240 और एनडीए 293 सीटें लेकर बहुमत में आ गया। काँग्रेस यदि 99 सीटें मिलने पर आत्ममुग्ध है तो यह उसकी भूल है क्योंकि जिन राज्यों में उसका भाजपा से सीधा मुकाबला था उनमें से एक - दो को छोड़कर शेष में वह औंधे मुँह गिरी है। ये देखते हुए राहुल गाँधी को भी चाहिए वे हवा में न उड़ें क्योंकि जनता अभी भी उन्हें और काँग्रेस को देश की जिम्मेदारी नहीं सौंपना चाहती। उनके सामने नेता प्रतिपक्ष बनकर स्वयं को विकल्प के तौर पर उभारने का जो अवसर है उसका लाभ वे किस तरह उठाते हैं उसका एहसास इस पहले सत्र से हो जायेगा।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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