चुनाव परिणाम आने के बाद काँग्रेस इस तरह पेश आ रही थी जैसे उसे स्पष्ट बहुमत मिल गया हो। यद्यपि 99 सीटें जीतकर उसने मुख्य विपक्षी दल की हैसियत प्राप्त कर ली और इस नाते लोकसभा में उसके नेता को लोक लेखा समिति के अलावा अनेक महत्वपूर्ण नियुक्तियों की निर्णय प्रक्रिया में हिस्सेदारी भी मिलेगी। सही अर्थों में तो उसे विपक्ष में बैठने का जनादेश मिला है। जहाँ तक बात सरकार बनाने की है तो एनडीए में शामिल दलों द्वारा नरेंद्र मोदी को नेता चुनने के साथ दो दिनों से व्याप्त अनिश्चितता पर भी विराम लग गया। जैसे संकेत आये हैं उनके अनुसार 8 जून को वे तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ले लेंगे। लेकिन 2014 और 2019 जैसी स्वतंत्रता उनके पास नहीं होगी। एनडीए के घटक दल ज्यादा से ज्यादा मंत्री पद चाहेंगे । सबसे ज्यादा दबाव नीतीश कुमार और चंद्रा बाबू नायडू बनाएंगे क्योंकि सत्ता की राजनीति में वे श्री मोदी के बराबर अनुभव रखते हैं। भाजपा से उनकी वैचारिक मतभिन्नता भी जगजाहिर है। अब सवाल ये है कि पूरी पार्टी और सरकार को अपने इशारे पर चलाने के अभ्यस्त श्री मोदी और अमित शाह क्या पहले जैसे स्वछंद रह सकेंगे क्योंकि नीति निर्धारण के साथ ही महत्वपूर्ण नियुक्तियों में भी नीतीश और श्री नायडू का दखल रहेगा। नतीजे आने के पहले जब नीतीश इलाज के बहाने दिल्ली आने के बाद प्रधानमंत्री से मिले तब खबर उड़ी कि भाजपा उन्हें केंद्र सरकार में शामिल कर बिहार की गद्दी पर अपने किसी नेता को बिठायेगी जहाँ आज तक भाजपा उप मुख्यमंत्री पद से आगे नहीं बढ़ पाई। लेकिन बहुमत से पीछे रह जाने के कारण वह अब सहयोगी दलों पर हावी होने की ताकत गँवा चुकी है। यदि उसका आंकड़ा 260 तक पहुँच जाता तब उसे नीतीश और श्री नायडू जैसे घाघ राजनेताओं का दबाव नहीं झेलना पड़ता। लेकिन जो स्थितियाँ हैं उनमें प्रधानमंत्री को 240 सीटों के बाद भी दो ऐसे क्षेत्रीय छत्रपों का दबाव झेलना पड़ेगा जो राजनीतिक दृष्टि से वजनदार हैं। हालांकि नीतीश की सरकार तो फिर भी भाजपा के समर्थन पर टिकी है किंतु चंद्राबाबू के पास भारी - भरकम बहुमत होने से वे बेहद ताकतवर हैं। वैसे श्री मोदी को 12 वर्ष मुख्यमंत्री और 10 साल तक प्रधानमंत्री रहने के कारण अच्छा खासा अनुभव प्राप्त है। कठिन परिस्थितियों में सूझ बूझ भरे निर्णय लेना उनकी खासियत है किंतु इस तरह का दबाव उनके सामने पहली बार आया है। ऐसे में देखने वाली बात ये होगी कि बदली हुई परिस्थितियों में वे कैसा प्रदर्शन करते हैं ? बीते 10 वर्षों में केंद्र की आर्थिक नीतियों के साथ ही राजनीतिक फैसलों पर श्री मोदी का निर्णय ही सर्वोपरि था। भाजपा संगठन पर भी अपने गृहमंत्री अमित शाह के जरिये उनकी पूरी - पूरी पकड़ थी। ऐसे में अपने मंत्रीमंडल के सदस्य , प्रदेशों के मुख्यमंत्री, राज्यपाल सहित अन्य नियुक्तियों में मोदी - शाह की जोड़ी का निर्णय अंतिम होता था। अब सहयोगी दल भी कुछ नियुक्तियों में अपने लोगों को चाहेंगे। चंद्राबाबू द्वारा लोकसभा अध्यक्ष का पद अपनी पार्टी के लिए मांगे जाने की खबर से श्री मोदी पर पड़ने वाले दबावों की बानगी मिलने लगी है। यद्यपि प्रधानमंत्री बन जाने के बाद वे अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए इंडिया गठबंधन में तोडफोड़ कर सकते हैं। बड़ी बात नहीं उद्धव ठाकरे और अकाली दल के साथ एक बार फिर भाजपा की जुगल बंदी हो जाए। लेकिन तीसरी पारी के शुरुआती 100 दिनों में बड़े और कड़े निर्णय करने के जो संकेत उन्होंने चुनाव के दौरान दिये उनको किस प्रकार लागू कर पाएंगे वह महत्वपूर्ण होगा । आगामी कुछ महीनों में ही अनेक राज्यों के विधानसभा चुनाव होने वाले हैं जहाँ लोकसभा चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा। इन राज्यों में भाजपा के सहयोगी दल ज्यादा सीटें मांगेंगे। इस प्रकार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद श्री मोदी को कुछ नये मोर्चों पर जूझना होगा। लोकसभा में भी विपक्षी खेमा अब काफी सशक्त है जो सरकार की नाक में दम करने से बाज नहीं आयेगा। पिछली लोकसभा में तो विपक्ष की कम संख्या के बावजूद सरकार को सदन चलाना मुश्किल होता था। सियासत के समीकरण जिस तरह से उलट - पलट गए उनमें श्री मोदी को संभल - संभलकर कदम बढ़ाने के साथ ही उस कार्यशैली को भी जारी रखना होगा जिसके लिए वे जाने जाते हैं।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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