Saturday, 15 June 2024

महाराष्ट्र में काँग्रेस को मिली सफलता से उद्धव की चिताएं बढ़ीं


हमारे देश में जिस तरह खेती का काम कहीं न कहीं चलता ही रहता है ठीक वैसे ही चुनाव भी हर मौसम में कहीं न कहीं होते रहते हैं। बीते 4 जून को लोकसभा चुनाव के परिणाम आते ही अगले कुछ महीनों में होने वाले महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव की चर्चा शुरू हो गई। इन दोनों में भाजपा का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा। हरियाणा में तो फिर भी उसने 5 अर्थात आधी सीटें जीत लीं किंतु महाराष्ट्र में पार्टी को जबरदस्त झटका लगा। 2019 में मिली 23 सीटों में से 14 उसने गँवा दीं। शिवसेना (उद्धव) गुट ने भाजपा के बराबर 9 सीटें जीतकर  एकनाथ शिंदे को पीछे छोड़ दिया जिनको असली शिवसेना का दर्जा मिलने के बाद भी महज 7 सीटें हासिल हुईं। शरद पवार के हाथ  से एनसीपी भले निकल गई किंतु वे भी 8 सीटें जीतकर  सम्मानजनक स्थिति में आ गए। लेकिन  उनके भतीजे अजीत पवार मात्र 1 सांसद जितवा सके। यहाँ तक कि उनकी पत्नी तक बारामती में शरद पवार की बेटी से पराजित हो गई। इस प्रकार भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए को 48 सीटों वाले इस सूबे में भारी नुकसान हुआ। लेकिन लाॅटरी खुली काँग्रेस की जिसे 2019 में केवल एक सीट मिली थी किंतु इस चुनाव में उसका आंकड़ा 13 तक जा पहुंचा। जहाँ तक इंडिया गठबंधन की बात है तो  29 सीटें मिलने से आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर  उसका हौसला बढ़ गया है किंतु राजनीति में सब कुछ इतनी आसानी से नहीं होता। और इसीलिए राजनीतिक विश्लेषक अब इस  राज्य में विधानसभा  चुनाव के समीकरणों पर नजरें गड़ाये हुए हैं। सतही तौर पर देखें तो इंडिया गठबंधन काफी आगे है। वहीं एनडीए के अस्तित्व पर खतरा मंडराता दिख रहा है। शिंदे और अजीत के साथ आये कुछ विधायकों की वापसी चर्चा में है। ये भी कि चुनाव के पहले शिंदे सरकार को गिरवा दिया जाएगा जिससे कि भाजपा और उसके साथियों पर दबाव बढ़ाया जा सके। केन्द्रीय मंत्रीमंडल में उपयुक्त प्रतिनिधित्व नहीं मिलने के कारण शिंदे और अजीत नाराज हैं। हालाँकि वे अभी भी भाजपा के साथ हैं। वैसे चुनाव परिणाम आते ही उद्धव और भाजपा के बीच बातचीत की खबरें उड़ने से लगा कि वे वापस एनडीए में आएंगे। शिवसेना के एकीकरण की  अटकलें भी लगने लगीं। दरअसल लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र में एनडीए की पराजय सही मायनों में  भाजपा के लिए बहुत बड़ा धक्का है। मुख्यमंत्री शिंदे की शिवसेना ने  तो 7 सीटें जीतकर अपना प्रभाव साबित कर दिया और अजीत पवार को एक सीट मिलना भी कम नहीं है किंतु 14 सीटें गंवाने वाली भाजपा की स्थिति दयनीय हो गई। हालांकि चुनाव के दौरान ही ये नजर आने लगा था  किंतु वह इतने नीचे चली जायेगी ये अंदाज शायद उसके विरोधियों को भी नहीं था । इतिहास में पहली बार भाजपा के विरुद्ध गोलबंद हुए मुसलमानों ने अपने घोर विरोधी उद्धव ठाकरे के उम्मीदवारों को मत देकर सारे अनुमान ध्वस्त कर दिये। लेकिन काँग्रेस को मिली अप्रत्याशित सफलता के कारण उद्धव की खुशी पर पानी पड़ गया। भाजपा के साथ गठबंधन के दौर में सीटों के बंटवारे में शिवसेना बड़े भाई की भूमिका में रही। स्व. बाल ठाकरे ने  फार्मूला बनाया था कि  जिसके ज्यादा विधायक होंगे उसी पार्टी का मुख्यमंत्री होगा। लेकिन 2014 से पांसा पलटा और भाजपा बड़े भाई की हैसियत में आ गई। उसी के बाद देवेंद्र फड़नवीस मुख्यमंत्री बन गए। लेकिन 2019 में शिवसेना ने कम सीटें आने के बाद भी मुख्यमंत्री की ज़िद पकड़ी जिससे गठबंधन टूट गया और उद्धव ने शरद पवार की सलाह पर काँग्रेस के साथ महाअगाढ़ी का साथ लेकर मुख्यमंत्री बनने की  आकांक्षा पूरी कर डाली। उसके बाद जो हुआ वह बेहद नाटकीय था किंतु लोकसभा चुनाव के बाद जो काँग्रेस महाराष्ट्र में शरद पवार और उद्धव के सामने बौनी नजर आती थी वह गठबंधन की सिरमौर बन बैठी। और यही उद्धव और उनके समर्थकों के लिए चिंता का सबब है। जैसे संकेत मिल रहे हैं उनके मुताबिक काँग्रेस अब श्री ठाकरे को और उपकृत करने के मूड में नहीं है। उसे यह समझ आ चुका है कि पार्टी में विभाजन के बाद उद्धव सौदेबाजी करने की स्थिति में नहीं रह गए हैं। यदि शिंदे गुट भी उनके साथ आ जाए तब भी उनका भाजपा के पास लौटना लगभग असंभव होगा। और अकेले लड़ने का दुष्परिणाम वह 2014 में भोग चुकी थी। ऐसे में उद्धव का इंडिया में बने रहना मजबूरी  है ।  लेकिन  लोकसभा में शानदार प्रदर्शन के आधार पर काँग्रेस गठबंधन की ज्यादा  सीटें मांगेगी जो श्री ठाकरे को शायद ही मंजूर होगा। हालांकि बिगड़ते स्वास्थ्य के चलते वे ज्यादा बोझ उठाने की स्थिति में नहीं हैं किंतु अपने पुत्र आदित्य को राजनीति में स्थापित करना उसी तरह उनके जीवन का लक्ष्य है । जैसी खबरें मुंबई से निकल रही हैं उनके अनुसार काँग्रेस ने उद्धव को ज्यादा भाव नहीं देने का मन बना लिया है। उसने ये समझ लिया है कि भाजपा विरोधी मतदाता अपने मत का सही उपयोग करना सीख गया है। ऐसे में उद्धव यदि इंडिया गठबंधन छोड़ने का दुस्साहस करते हैं तब उन्हें लोकसभा जैसी सफलता भी नहीं मिलने वाली। हालांकि चुनाव में अभी दो - ढाई महीने बाकी हैं किंतु काँग्रेस अभी से अपनी गर्दन ऊँची करते हुए घूम रही है। हालांकि चिंता में शरद पवार भी हैं लेकिन वे राजनीति के कितने बड़े खिलाड़ी हैं ये जगजाहिर है। 


-रवीन्द्र वाजपेयी

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