Tuesday, 18 June 2024

राहुल का रायबरेली से सांसद रहना अखिलेश के लिए खतरे की घंटी

राहुल गाँधी रायबरेली नहीं छोड़ेंगे ये तो तय था। काँग्रेस  6 लोकसभा सीटें मिलने से लंबे समय बाद  इस राज्य में अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकी।  अमेठी भी  जीतने से उसका उत्साह बढ़ा है। पहले कहा गया कि वे श्री गाँधी वायनाड से सांसद रहेंगे और रायबरेली से  प्रियंका वाड्रा को उपचुनाव लड़वाया जाएगा। दरअसल गाँधी परिवार श्रीमती वाड्रा को पहले चुनाव में पराजय की शर्मिंदगी से बचाना चाहता था। इसीलिए उन्हें अमेठी से नहीं उतारा गया जहाँ राहुल पराजय का स्वाद चख चुके थे। जब  तय हो गया कि सोनिया गाँधी चुनाव। से दूर हो रही हैं तब उनकी जगह बेटी को उतारने की चर्चा चली। राहुल के दोबारा  वायनाड से लड़ने पर  ये संभावना और बढ़ी। लेकिन काँग्रेस ने वहाँ मतदान होने तक रायबरेली और अमेठी के प्रत्याशी की घोषणा रोके रखी तब लगा कि श्री गाँधी संभवतः अमेठी से लड़कर स्मृति ईरानी से अपनी हार का बदला लेंगे किंतु नामांकन के आखिरी दिन उन्हें रायबरेली और किशोरीलाल शर्मा नामक गाँधी परिवार के करीबी  को अमेठी से उम्मीदवारी सौंप दी गई। जो कई दशकों से उक्त दोनों सीटों पर परिवार का राजनीतिक प्रबंधन देख रहे  थे। रायबरेली से तो राहुल की जीत लगभग तय थी।किंतु अमेठी में श्री शर्मा को कमजोर मानने की गलती भाजपा ने की और स्मृति ईरानी एक ऐसे शख्स से पराजित हो गईं जिसकी हैसियत गाँधी परिवार के एक मुलाजिम जैसी थी। हार का अंतर डेढ़ लाख से ज्यादा होना साबित कर गया कि यदि श्री गाँधी होते तब  वह और  बड़ा होता। रायबरेली में राहुल अपनी माताजी की पिछली जीत से दोगुना मतों से विजयी हुए। इन दोनों जीतों में गाँधी परिवार के प्रभाव  से अधिक सपा का खुला समर्थन रहा। यद्यपि सपा लोकसभा चुनाव में  अमेठी और रायबरेली से पहले भी अपने  प्रत्याशी नहीं उतारती थी  किंतु इस बार जहाँ अखिलेश ने रायबरेली में राहुल का प्रचार किया वहीं कन्नौज में श्री गाँधी द्वारा अखिलेश के लिए वोट मांगे गए। चुनाव परिणामों में सपा  36 और काँग्रेस 6 पर विजेता रही। वहीं भाजपा 62 से घटकर 33 पर आ गई। उसके सहयोगी 3 सीट जीत पाए। इन नतीजों ने राष्ट्रीय राजनीति को तो प्रभावित किया ही क्योंकि इन्हीं के कारण भाजपा 272 के आंकड़े से काफी पीछे रह गई। लेकिन उ.प्र के सियासी समीकरण भी काफी उलट - पलट गए। मसलन बसपा जो सपा के साथ मिलकर 2019 में 10 सीटें जीत गई थी वह शून्य पर खिसक गई। वहीं  1 सीट पर सिमटी काँग्रेस को  पुनर्जीवन मिल गया। हालांकि इतने बड़े राज्य में महज 6 सांसद होना उसके लिए शर्मनाक है और ये सीटें भी उसे सपा के समर्थन से मिल सकीं। वरना उसे 2022 के विधानसभा  चुनाव जैसे परिणाम झेलना पड़ते जब उसे 403 में से मात्र 2 सीटें ही नसीब हुईं। इस बार सपा ने उसे कुल 17 सीटें लड़ने दी थीं जो राष्ट्रीय पार्टी की हैसियत से बेहद कम होने के बाद भी उसने स्वीकार कीं क्योंकि अपनी दयनीय स्थिति का आभास गाँधी परिवार को था। पिछले  चुनाव में अमेठी के किले का ढह जाना और रायबरेली में जीत का अंतर आधा हो जाने  के बाद 2022 के विधानसभा चुनाव में प्रियंका के लड़की हूँ , लड़ सकती हूँ नारे के साथ धुंआधार प्रचार करने के बावजूद केवल 2 सीटें मिलने से  राज्य में काँग्रेस के अस्तित्व पर ही संकट उत्पन्न हो गया। यदि इस लोकसभा चुनाव में वह अकेले लड़ती तब रायबरेली और अमेठी भी हाथ से निकलना असम्भव नहीं था । राहुल द्वारा रायबरेली सीट से सांसद बने रहने के पीछे पार्टी को उ.प्र में अपने पैरों पर खड़ा करने की सोच है । इसीलिए उन्होंने वायनाड छोड़ दी जहाँ से प्रियंका किस्मत आजमायेंगी। यद्यपि केरल में दो साल बाद विधानसभा चुनाव हैं। इंडिया गठबंधन में होने के बावजूद इस राज्य में काँग्रेस और वामपंथी अलग - अलग हैं। यहाँ तक वायनाड से भी वामपंथियों ने  अपना उम्मीदवार  उतारा।  राहुल वायनाड से सांसद बने रहकर आगामी विधानसभा चुनाव में वाम मोर्चे से सत्ता छीनने का प्रयास करते  किंतु उन्होंने उ.प्र को प्राथमिकता दी जहाँ 80 लोकसभा सीटें हैं। उत्तर भारतीय राज्यों में काँग्रेस को मजबूत करना है तो उ.प्र में उसकी प्रभावशाली मौजूदगी जरूरी है। रायबरेली से सांसद रहकर वे इस उद्देश्य को कितना पूरा कर सकेंगे ये कहना कठिन है किंतु उनका फैसला अखिलेश के लिए खतरे की घंटी है जो राज्य की सत्ता दोबारा हासिल करने का सपना  देखा करते हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में भी अखिलेश और राहुल मिलकर लड़े किंतु निराशा हाथ लगने के बाद अलग हो गए। इस बार गठबंधन के परिणाम तो उत्साहवर्धक रहे किंतु मोदी सरकार की वापसी हो जाने के बाद दोनों दलों के एक दूसरे के विरुद्ध हो जाने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। राहुल जानते हैं सपा को कमजोर किये बिना काँग्रेस का उत्थान असंभव है। दूसरी तरफ श्री यादव भी उ.प्र में अपनी हैसियत खोना नहीं चाहेंगे। ऐसे में  दोनों  में महत्व की लड़ाई होने की संभावना है । राहुल जहाँ राष्ट्रीय नेता  की छवि के कारण हावी होने की कोशिश करेंगे जो सपा प्रमुख को शायद ही गंवारा होगा। ये देखते हुए आने वाले दिन उ.प्र की राजनीति में बेहद उथल - पुथल भरे होंगे।


- रवीन्द्र वाजपेयी

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