कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव में काँग्रेस ने जिन गारंटियों के नाम पर चुनाव जीता उनको पूरा करने में पसीने छूट रहे हैं। म.प्र में लाड़ली बहना योजना ने भाजपा को बहुत बड़ी विजय तो दिला दी किंतु उसकी राशि में क्रमशः वृद्धि करने का साहस प्रदेश सरकार प्रदर्शित नहीं कर पा रही। 12 वीं में अच्छे अंक लाने वाले छात्र / छात्राओं को लैपटॉप देने के लिए भी आर्थिक साधन कम पड़ रहे हैं। राज्यों के साथ ही केंद्र सरकार भी गरीब कल्याण योजनाओं से खजाने पर पड़ने वाले बोझ से परेशान है। रोचक बात ये है कि मुफ्त उपहार रूपी इन योजनाओं को शुरू करना शेर पर सवार होने जैसा है क्योंकि उन्हें बंद करना उसकी पीठ से उतरने के बाद निर्मित हालात जैसा होता है। मोदी सरकार द्वारा किसानों के खाते में 2 हजार रु. की सम्मान निधि तीन किश्तों में जमा होती है। सालाना 6 हजार रु. पाने वाले ज्यादातर किसान ये उलाहना देते नहीं थकते कि इतनी राशि में होता क्या है? लेकिन सरकार इसे बंद कर दे तो पूरी किसान लाॅबी उसके विरुद्ध सड़कों पर उतर आयेगी। यही स्थिति उन समस्त योजनाओं के साथ जुड़ी हुई है जिनके जरिये वोट बटोरने का धंधा चल पड़ा है। ऐसी योजनाएं चुनाव में तात्कालिक लाभ तो दे देती हैं किंतु कालांतर में इनसे भारी नुकसान होता है जिसकी भरपाई हेतु सरकार कर और दर दोनों बढ़ाती है। ताजा उदाहरण कर्नाटक का ही है जहाँ की राज्य सरकार ने लोकसभा चुनाव के नतीजे घोषित होते ही पेट्रोल - डीजल महंगा करने के साथ ही बिजली की दरें भी बढ़ा दीं। भाजपा ने इसे जनविरोधी कदम बताया किंतु लगभग दो दशक से उसके द्वारा शासित म.प्र में पेट्रोल - डीजल के दाम आसमान छू रहे हैं। हिमाचल प्रदेश के चुनाव में काँग्रेस ने ओल्ड पेंशन योजना शुरू करने का वायदा किया। इस राज्य में शासकीय कर्मचारी बड़ी संख्या में होने के कारण उस वायदे ने जादू का काम किया । लेकिन कुछ महीने ही बीते और यह वायदा गले में हड्डी की तरह फंस गया। निकट भविष्य में हरियाणा और महाराष्ट्र में भी विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। लोकसभा चुनाव में इन दोनों में विपक्ष का प्रदर्शन जबरदस्त रहने के कारण उसकी तरफ से तमाम लोक - लुभावन वायदे किये जाने की संभावना है। दूसरी तरफ भाजपा अपनी सरकार बचाने के लिए जवाबी दाँव चलेगी। ऐसे में जीत किसी को भी मिले किंतु लाभार्थी समुदाय को छोड़कर बाकी जनता की पीठ पर नये करों का बोझ बढ़ना तय है। इस खेल से समाज का वह मध्यमवर्ग निराश है जिसे राजनीतिक दल घर की मुर्गी दाल बराबर समझते हैं। लोकसभा चुनाव के बाद उ.प्र में इस वर्ग के बीच किये गए सर्वेक्षण में उनका यह गुस्सा खुलकर सामने आया कि आयकर छूट की सीमा न बढ़ने से उनकी बचत करने की क्षमता घटती जा रही है। उनका यही असंतोष मतदान का प्रतिशत कम होने के तौर पर सामने आया। यहाँ तक कि वाराणसी तक में भाजपा का प्रतिबद्ध मध्यमवर्गीय मतदाता उत्सहविहीन होकर घर बैठा रहा। हालांकि वह नरेंद्र मोदी सरकार की वापसी भी चाहता था। दूसरी तरफ मुस्लिम और यादव मतदाता केंद्र और राज्य की अनेक लोक कल्याणकारी योजनाओं का लाभ लेने के बावजूद भाजपा के विरुद्ध खुलकर मतदान करते नजर आये। हालांकि म.प्र और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में जहाँ भाजपा की जड़ें गहरी हैं उनमें कम मतदान के बावजूद भाजपा को अच्छी सफ़लता मिली किंतु बाकी राज्यों के मध्यमवर्ग में मुफ्त योजनाओं के प्रति गुस्से का असर कम मतदान के रूप में देखने मिला जिसने भाजपा की लुटिया डुबो दी। ऐसा नहीं है कि अन्य पार्टियों के शासन वाले राज्यों में इनका असर नहीं हुआ। मसलन हिमाचल प्रदेश में जहाँ काँग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया वहीं कर्नाटक में वह भाजपा की बढ़त नहीं रोक सकी। चुनाव बाद इस तरह के वायदों पर रोक लगाने की मांग उठने लगी है। चुनाव आयोग से पहल की अपेक्षा की जा रही है। सर्वोच्च न्यायालय से भी स्वतः संज्ञान लेकर इसे रोकने की अपील हो रही है। विशेष रूप से काँग्रेस द्वारा मल्लिकार्जुन खरगे एवं राहुल गाँधी के हस्ताक्षरयुक्त वह गारंटी पत्र चर्चा में है जिसमें महिलाओं को 8500 रु. प्रति माह देने की बात कही गई थी। ये आशंका भी व्यक्त की जा रही है कि उस आधार पर काँग्रेस के नव निर्वाचित सांसदों का चुनाव भी रद्द हो सकता है। बहरहाल समय आ गया है जब चुनाव प्रक्रिया को फुथपाथ बाजार के स्तर से उठाने कड़े निर्णय लिए जाएं। गरीबों का हितचिंतन सर्वोच्च प्राथमिकता है किंतु जब बात सबका साथ सबका विकास की हो रही हो तब समाज के अन्य वर्गों की जरूरतों का भी ध्यान रखना चाहिए वरना उनमें व्याप्त असंतोष बढ़ता ही जाएगा।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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