पूरे लोकसभा चुनाव का प्रचार देखें तो झूठ और भ्रम का सबसे अधिक सहारा लिया गया है। संघ शिक्षा वर्ग में संघ प्रमुख डॉक्टर मोहन राव भागवत ने कई महत्वपूर्ण बातें कही है। उनके बौद्धिक का कुछ-कुछ हिस्सा अपने हिसाब से उपयोग में लाया जा रहा है। कुछ के लिए सुविधाजनक अहंकार शब्द वाला हिस्सा है तो कुछ के लिए विरोधी दल को प्रतिपक्ष मानना चाहिए, यह वाला हिस्सा है। संघ प्रमुख ने झूठ और फरेब के आधार पर चुनाव जीतने को पूरी तरह अनुचित बताते हुए कहा कि जनता के बीच में ऐसा वातावरण निर्मित कर दिया गया कि वह सच को समझ नहीं पाई । ऐसी स्थिति में विजय प्राप्त करना या कुछ सीट बढ़ा लेना अंततोगत्वा राष्ट्र के लिए नुकसानदायक ही सिद्ध होगा। यह नहीं कहा जा सकता कि भ्रमित करने का कार्य केवल विपक्ष के द्वारा ही किया गया है? सत्ता पक्ष को जब यह लगा कि भ्रमित करने का प्रयास तेजी से हो रहा है और उस प्रयास के साथ अल्पसंख्यक समुदाय का वोट बैंक शामिल हो रहा है तब भ्रमित करने वाले बाण सत्ता पक्ष की ओर से भी चलाए गए। इस चुनाव में संविधान को समाप्त करना और आरक्षण को समाप्त करने जैसे जुमले ने जनमानस में एक ऐसा वातावरण पैदा किया जो नरेंद्र मोदी की छवि के तिलिस्म को भेदने में कुछ हद तक तो कामयाब रहा। यह लोकसभा चुनाव अंत तक इसी प्रकार के वातावरण के घटाटोप में चलता रहा और अपेक्षित परिणाम प्रभावित हो गए। जब चुनाव परिणाम आए तब भी सरकार बनाने के दावों - प्रतिदावों में ऐसा ही वातावरण बनाने का प्रयास किया , जिसमें भ्रम अधिक हो और वास्तविकता का कोई सरोकार न हो। टीडीपी और जदयू को लेकर अफवाह फैलाई जा रही थीं उनको मिलाकर भी सरकार बनाने लायक संख्या नहीं हो रही। सरकार बन गई , विभाग बंट गए , अब वही भ्रम पैदा करने का खेल लोकसभा अध्यक्ष के चुनाव को लेकर खेला जाने लगा है। जिस आम आदमी पार्टी की लोकसभा में तीन सांसदों की संख्या है, वह तेदेपा के लोकसभा अध्यक्ष की अफवाह उड़कर सहयोग देने की बात कर रहे हैं। इसको न तो टीडीपी मानने वाली और न ही अन्य राजनीतिक दल। क्योंकि लोकसभा अध्यक्ष के निर्वाचन की प्रक्रिया दो ही कारणों से होती है। पहले यदि जीतने की संभावना दिखाई दे और दूसरा जब राजनीतिक तनातनी हद से ज्यादा ही हो जाए। चुनाव प्रचार में भी ऐसी स्थिति नहीं बनी और न ही सरकार के गठन के समय में। लोकसभा अध्यक्ष के समर्थन देने वाली बात भ्रम पैदा करने के अलावा और कुछ नहीं हो सकती? भ्रम पैदा करने का एक प्रयास शेयर मार्केट के उतार-चढ़ाव को लेकर भी पैदा करने का प्रयास किया गया था। हालांकि आधी - अधूरी जानकारी के कारण यह विषय तूल नहीं पकड़ पाया। सरकार गठन से पहले राहुल गांधी ने पत्रकार वार्ता करके शेयर बाजार के उतार - चढ़ाव में भ्रष्टाचार करने का आरोप लगाते हुए जेपीसी गठन और जांच की मांग की थी। जबकि सबको यह पता है। सत्रहवीं लोकसभा भंग हो चुकी है और 18वीं लोकसभा अस्तित्व में नहीं आई है। न ही संसद सदस्यों ने शपथ ली है। ऐसे में जेपीसी की मांग करना राजनीतिक अपरिपक्वता का उदाहरण है। इसलिए भ्रमित करने का यह एक प्रयास शुरू होने के साथ ही खत्म हो गया। अब जब सरकार ने काम करना प्रारंभ कर दिया है। लोकसभा का सत्र आहूत किया जा चुका है। ऐसी स्थिति में इसी भ्रमित करने के वातावरण को सदन में भी विरोध के रूप में जारी रखने का प्रयास किया जाएगा। हालांकि सदन में संचालन कर्ता तथ्यों पर बात करने के लिए विवश कर सकते हैं। इसलिए वर्तमान में बना हुआ राजनीतिक आडंबर लंबे समय तक चलाने का प्रयास होगा। यह जरूर कहा जा सकता है कि विपक्ष जिस तरह का वातावरण बनाने का प्रयास कर रहा है उस प्रयास पर आम जनता अधिक विश्वास करने वाली नहीं है। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को गठबंधन का लाभ मिला। समाजवादी पार्टी को मुस्लिम समुदाय के साथ एका करने का लाभ मिला। यही लाभ ममता बनर्जी को भी मिला। बाकी विपक्षी दलों के सामने कोई ऐसा लाभ उठाने का वातावरण नहीं बना। जिससे भ्रमित करने का लाभ उठाया जा सके। इसलिए यह कहना उचित होगा कि विपक्ष ने राजनीतिक लाभ जरूर उठाया लेकिन उसका ढोल अब बेसुरी थाप दिखाई/सुनाई दे रहा है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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