लोकसभा चुनाव के परिणाम आने के बाद उठी राजनीतिक अवधारणाओं को समाप्त करते हुए नरेंद्र मोदी ने अपने नाम एक और इतिहास जोड़ लिया। उन्होंने लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेकर भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की बराबरी कर ली। इसके पहले देश के किसी भी प्रधानमंत्री को लगातार तीसरी बार शपथ लेने का अवसर नहीं मिला। पंडित नेहरू ने अपने तीनों कार्यकाल में स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया था जबकि नरेंद्र मोदी को दो कार्यकाल में तो स्पष्ट बहुमत मिला लेकिन तीसरे कार्यकाल में बहुमत से थोड़ा दूर रह गए। इसके बाद भी भाजपा का देशव्यापी विस्तार हुआ है। दक्षिण के जिन राज्यों में पार्टी को सफलता नहीं मिलती थी उनमें तमिलनाडु को छोड़कर अधिकांश राज्यों ने भाजपा को समर्थन दिया है। कर्नाटक, तेलंगाना, ओडीशा ऐसे राज्य हैं जहां अपेक्षा से अधिक सफलता मिली है। वही उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान व हरियाणा ऐसे राज्य हैं जहां समर्थन में थोड़ी से ज्यादा तक गिरावट आई है। इसलिए नरेंद्र मोदी ने बहुमत का आंकड़ा नहीं छुआ। इस चुनाव परिणाम में यह बात भी स्पष्ट रूप से दृष्टिगत होती है कि भाजपा के मुकाबले किसी भी अन्य दल को या समूह को व्यापक समर्थन नहीं मिला। भाजपा, कांग्रेस से 10 करोड़ अधिक वोट प्राप्त करके 141 सीटों के अंतर पर ज्यादा है। इंडी गठबंधन को मिले कुल वोट से भाजपा को सवा दो लाख वोट अधिक मिले हैं। अधिक दालों का गठबंधन इंडी है जबकि भाजपा के नेतृत्व वाले राजग में दहाई वाले दो दल हैं। शेष दलों में अधिक अड़ंगा डालने की सामर्थ्य नहीं है। इसलिए भाजपा नीत गठबंधन राजग को सरकार चलाने के लिए अधिक सतर्कता और परिश्रम की आवश्यकता नहीं होगी। मोदी को गठबंधन संसदीय दल का नेता चुनने के समय तेलुगु देशम पार्टी के चंद्रबाबू नायडू और जनता दल यूनाइटेड के नीतीश कुमार का व्यवहार और भाषण गठबंधन की एकता को प्रदर्शित करते हैं। दोनों ही दलों को अपने राज्य की माली हालत सुधारने के लिए आर्थिक पैकेज की जरूरत है। जिसे देने में केंद्र सरकार को कोई गुरेज नहीं होना चाहिए। इसलिए गठबंधन सरकार के अस्थिर होने की संभावनाएं काम हो जाती है। अभी कुछ अन्य राजनीतिक दलों को राजग में शामिल करके सरकार की स्थिरता को और मुकम्मल करने की योजना पर भी काम करना होगा। इस बात की दृढ़ता इस बात में दिखाई देती है कि मंत्रिमंडल के गठन में जिस प्रकार का दृश्य दिखाई दे रहा है उससे यह परिलक्षित हो रहा है कि मोदी सरकार पहले की तरह ही आत्मविश्वास से लबरेज है। उसे अपने हार्डकोर विषयों को क्रियान्वित करने में भी अधिक परेशानी का सामना नहीं आने वाला है। जिन विषयों में विवाद हो सकता है उनके बारे में भी समर्थक दलों की भाषा नियंत्रित रूप में ही सुनाई दे रही है। इसलिए अभी यह माना जा रहा है कि नरेंद्र मोदी की गठबंधन वाली तीसरी सरकार को आसानी से चलने में कोई परेशानी नहीं होगी। विपक्षी दलों की ओर से जैसा भ्रम चुनाव प्रचार में पैदा किया गया था वैसा ही भ्रम सरकार गठन की प्रक्रिया में किया जा रहा है। पहले मंत्रिमंडल में भागीदारी, फिर विभाग वितरण और अब अध्यक्ष को लेकर भ्रमित करने का प्रयास जारी है। मंत्रिमंडल गठन में किसी प्रकार की परेशानी या असुविधा दिखाई नहीं दी। ऐसा ही वातावरण विभागों के बंटवारे में भी सामने आएगा। विपक्ष की आशा अध्यक्ष के निर्वाचन के समय भी पूरी नहीं होगी। इसलिए मंत्रिमंडल गठन में जब किसी प्रकार का दबाव नहीं दिखाई दिया तब आगे किसी प्रकार का कोई दबाव होगा इसकी संभावनाएं तत्काल नहीं देखना चाहिए। वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस के नेतृत्व वाले इंडी गठबंधन में विरोध के स्वर दिखाई दे रहे हैं। महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे वाली शिवसेना को यह समझ में आ गया है कि महाअघाडी में तीसरे नंबर का राजनीतिक दल लोकसभा में पहले नंबर का कैसे बन गया? गठबंधन का सहारा लेकर कांग्रेस ने अपनी सीटों को दो गुना के करीब कर लिया है। इसलिए क्षेत्रीय दलों को नुकसान भाजपा से कम कांग्रेस से अधिक हुआ है। ऐसे में नरेंद्र मोदी का आत्मविश्वास स्वाभाविक रूप से बढ़ेगा ही। यही आत्मविश्वास सरकार की सफलता का आधार बनेगा। यही आत्मविश्वास मंत्रिमंडल के गठन में दिखाई दिया है।
No comments:
Post a Comment