Wednesday, 19 June 2024

वामपंथी : बंगाल की खाड़ी के बाद अरब सागर में डूबने के कगार पर


आजादी के बाद  पहली लोकसभा में वामपंथी सबसे बड़े विपक्षी दल के तौर पर उभरे ।  बाद में उनकी संख्या ऊपर - नीचे होती रही । कालांतर में प. बंगाल , त्रिपुरा और केरल साम्यवाद के मजबूत गढ़ के तौर बने  किंतु अविभाजित आंध्र  प्रदेश, बिहार, उ.प्र, म.प्र और महाराष्ट्र की कुछ सीटें साम्यवादी सांसद चुनती रहीं जिनमें एस. एम. बैनर्जी,,चतुरानंद मिश्र, चंद्रजीत यादव, होमी दाजी जैसे नाम उल्लेखनीय हैं। प.बंगाल में लगभग चार दशक के शासन के दौरान दर्जनों वामपंथी नेता लोकसभा सदस्य बने। लेकिन मौजूदा हालात में त्रिपुरा और प. बंगाल में वामपंथी शून्य पर हैं। बिहार में एक तो सरकार होते हुए भी केरल में आधा दर्जन सीटें तक साम्यवादियों को नसीब न हो सकीं। नई लोकसभा में हंसिया- हथौड़ा , लाल निशान वालों को पहचानना मुश्किल हो जायेगा। सबसे बड़ी बात प. बंगाल की  उर्वरा भूमि का बंजर  हो जाना है।  जहाँ से कभी दर्जनों वामपंथी  सांसद लोकसभा में आते रहे हों वहाँ से एक भी सांसद में नहीं होगा। विधानसभा में भी लाल निशान  वालों का नामो- निशां मिट गया । राज्य में  वामपंथ को अपराजेय बनाए रखने वाले ज्योति बसु को जब संयुक्त मोर्चा सरकार में प्रधानमंत्री बनने का प्रस्ताव दिया गया तब उनकी पार्टी सीपीएम ने इंकार कर दिया। ज्योति बाबू ने उस फैसले का मान रखा। हालांकि बाद में उसे  हिमालयी भूल का नाम भी दिया। यद्यपि इंद्रजीत गुप्त और चतुरानन मिश्र सरकार में मंत्री बने। इसी तरह 2004 में डॉ. मनमोहन सिंह की अल्पमत सरकार को वामपंथियों ने बाहर से समर्थन देने की नीति तय की किन्तु अपने वरिष्ट  नेता सोमनाथ चटर्जी को लोकसभा अध्यक्ष बनवा दिया। इस मामले में रोचक मोड़ तब आया जब भारत - अमेरिका परमाणु संधि के विरोध में वामपंथियों ने समर्थन वापस लेते हुए सोमनाथ दा से पद छोड़ने कहा तो उन्होंने इंकार कर दिया और पार्टी से निष्कासित हो गए। 2011 में प.बंगाल में ममता बैनर्जी की सरकार  बनने के बाद वाममोर्चा कमजोर होता गया और अंततः काँग्रेस के साथ गठबंधन को मजबूर हुआ। 2014 के बाद केंद्र में नरेंद्र मोदी के सत्तासीन होने के बाद त्रिपुरा नामक  एक और वामपंथी गढ़ में भाजपा काबिज हो गई। साम्यवादियों के पास केवल केरल बचा जहाँ काँग्रेस की अगुआई में एल. डी. एफ उनका प्रसिद्वंदी है। संयोग से प. बंगाल और केरल विधान सभा के चुनाव एक साथ - साथ होते हैं जिनमें वामपंथी प. बंगाल में काँग्रेस के साथ मिलकर ममता बैनर्जी के विरुद्ध खड़े होते हैं वहीं केरल में एक -  दूसरे  पर तलवार  भाँजते हैं। इस लोकसभा चुनाव में भी ये हुआ और वायनाड में राहुल गाँधी के विरुद्ध सीपी आई महासचिव डी. राजा की पत्नी को खड़ा कर दिया गया । वामपंथी 2014 के बाद से भाजपा विरोधी सभी गठबंधनों में शामिल हैं । वर्तमान में इंडिया नामक गठबंधन में भी उनकी हिस्सेदारी है। बावजूद इसके केरल में काँग्रेस ने  लोकसभा की अधिकांश सीटें जीतकर वामपंथियों को जबरदस्त नुकसान पहुंचाया। सच ये है कि भाजपा के अंध विरोध में वामपंथी उस काँग्रेस की गोद में  जा बैठे जो उनका उपयोग तो करती है किन्तु उनके लिए कांटे बिछाने से भी  बाज नहीं आती। जातिवादी नेताओं का समर्थन करने में भी वामपंथी संकोच नहीं करते। इन कारणों से साम्यवाद अपनी विशिष्टता खो बैठा है। नक्सलियों या माओवादियों  के रूप में जो सशस्त्र उग्रवादी सत्तर के दशक से देश में खूनी क्रांति के जरिये साम्यवाद थोपना चाहते थे वे भी अब माफिया गिरोह बन चुके हैं जिनका काम  आतंक फैलाकर पैसे वसूलना  है। खनिज संपन्न आदिवासी इलाके इनका कार्यक्षेत्र हैं। सरकार की सख्ती से हताशा में वे हिंसक वारदात करने से बाज नहीं आते किन्तु उनका सफाया तेजी से हो रहा है। आजादी के बाद से ही  साम्यवादियों ने काँग्रेस को बहला - फुसलाकर  शैक्षणिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक संस्थानों में अपने लोग बिठाये थे किन्तु मोदी सरकार आने के बाद उन सबकी छंटनी होने लगी जिससे कि वामपंथी बुद्धिजीवियों में छटपटाहट बढ़ी और असहिष्णुता जैसे मुद्दे उछालकर  अवार्ड वापसी रूपी नाटक किया गया। शहरी नक्सली नामक एक नया वर्ग भी सामने आया जो छद्म रूप से देश विरोधी हिंसक ताकतों को सहायता और संरक्षण देता है। लेकिन साम्यवाद का जो ग्लैमर 60 - 70 के दशक में हुआ करता था वह कमजोर पड़ा है। जे .एन.यू जैसे कुछ संस्थान भले ही वामपंथ की नर्सरी बने हों किन्तु कन्हैया कुमार का सीपीआई में जाना और फिर काँग्रेस में आ जाना  इस बात का प्रमाण है कि युवाओं को इस विचारधारा की रूमानियत अब लुभाती नहीं है। ऐसे में  बंगाल की खाड़ी के बाद साम्यवाद  अरब सागर (केरल) में भी डूबने के कगार पर है। भाजपा के विरोध में डाॅ. मनमोहन सिंह जैसे पूंजीवाद समर्थक व्यक्ति की सरकार को टेका लगाकर साम्यवादियों ने अपनी वैचारिक पहचान नष्ट कर ली। यही वजह है कि नई लोकसभा में वे दहाई का आंकड़ा छूने को तरस गए। आश्चर्य नहीं होगा यदि  जल्द ही ये नारा सुनने मिले कि हंसिया, हथौड़ा, लाल निशान ढूढ़ रहा है हिंदुस्तान। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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