Tuesday, 4 June 2024

हिंदुओं का बिखराव और मुस्लिमों की एकता मोदी के करिश्मे पर भारी पड़ गई


हालांकि  नरेंद्र मोदी फिर प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं लेकिन 400 पार का उनका नारा हवा हवाई होकर रह गया। भले ही अपने सहयोगियों के साथ भाजपा तीसरी बार केंद्र की सत्ता पर काबिज हो जायेगी किंतु प्रधानमंत्री के करिश्माई व्यक्तित्व के लिए ये परिणाम बड़ा धक्का है। मतगणना के अंतिम दौर तक हो सकता है भाजपा 272 के जादुई आंकड़े को छू ले लेकिन उसका दबदबा पहले जैसा नहीं रहेगा। उसके लिए सबसे बड़ा गच्चा उ.प्र साबित हुआ जहाँ मोदी - योगी की डबल इंजिन सरकार के बल पर वह 70 - 75 सीटें जीतने का ख्वाब देख रही थी। हालांकि पार्टी ने उड़ीसा में नवीन पटनायक के वर्चस्व को तोड़कर पूर्वी भारत में कदम आगे बढ़ाया किंतु प. बंगाल में वह उतना ही नुकसान कर बैठी। वैसे पूरे परिणाम आये बिना अंतिम विश्लेषण करना जल्दबाजी होगी फिर भी  इतना जरूर कहा जा सकता है कि काँग्रेस अपनी उस रणनीति में सफल हो गई जिसके अंतर्गत वह भाजपा को 250 के लगभग रोकना चाहती थी। यदि वाकई भाजपा अपने दम पर बहुमत के आंकड़े को छूने से पीछे रह गई तो 15 - 15 सीटों के साथ नीतीश कुमार की जद (यू) और चंद्रबाबू नायडू की तेलुगु देशम पार्टी  श्री मोदी की उन्मुक्त उड़ान को रोकने का कोई मौका नहीं गँवायेगी। इस चुनाव में भाजपा की लहर को यदि किसी ने रोका तो वे हैं अखिलेश यादव। उनका सहारा लेकर कॉंग्रेस भी उ.प्र में फिर खड़ी हो सकी। उस दृष्टि से तमाम संभावनाओं के बावजूद बिहार में तेजस्वी यादव अपेक्षित असर नहीं दिखा सके और नीतीश कुमार का  राजनीतिक चातुर्य एक बार लालू परिवार  पर भारी पड़ गया।  भाजपा यदि उ.प्र में अपनी संख्या 60 से ऊपर ले जाने में सफल हो सकी तब उसका हाथ एनडीए में ऊंचा बना रहेगा। यद्यपि वह म.प्र , दिल्ली, हिमाचल, उत्तराखंड और गुजरात का किला तो सुरक्षित रख पा रही है और उड़ीसा उसके लिए नई उम्मीद लेकर आया किंतु राजस्थान और हरियाणा में हुए नुकसान के साथ महाराष्ट्र में लगे धक्के से उबरना उसके लिए फिलहाल मुश्किल लग रहा है। नुकसान तो उसे कर्नाटक में भी हो रहा है लेकिन विधानसभा चुनाव में हार के बावजूद भाजपा ने वहाँ काफी कुछ हासिल किया। केरल में अगर वह दो सीटें जीत जाती है तो वह बड़ा उलटफेर होगा। तमिलनाडु में भी उसकी मौजूदगी निश्चित रूप से बढ़ी है। काँग्रेस के लिए आज का दिन खुशियाँ मनाने का है क्योंकि लगभग 100 सीटों के साथ वह लोकसभा में मुख्य विपक्षी दल बनेगी और राहुल गाँधी भी नई ताकत के साथ प्रधानमंत्री के सामने खड़े होंगे। हालांकि एनडीए की सरकार के मुखिया तो श्री मोदी ही रहेंगे किंतु उसमें बड़े भाई की भूमिका में होने के बावजूद भाजपा को सहयोगी दलों की बात न सिर्फ सुनना अपितु मानना भी होगी। पूरी तस्वीर तो शाम तक स्पष्ट हो सकेगी । भाजपा के लिए सोचने वाली बात ये है कि उसके हिंदुत्व को हिन्दू समाज ने ही एकमुश्त समर्थन नहीं दिया जबकि मुस्लिम मतदाताओं ने इस चुनाव में बिना शोर मचाए उसको  हराने के लिए अपने मत को बिखरने से बचा लिया। इसे संयोग ही कहा जायेगा कि 1992 में बाबरी ढांचा गिरने के बाद भाजपा को उ. प्र विधान सभा चुनाव में पराजय मिली और इस बार राम मन्दिर में प्राण प्रतिष्ठा के बाद लोकसभा चुनाव में प्रदेश की जनता ने उसे झटका दे दिया। वैसे इंडिया गठबंधन के लिए भी आने वाले दिन आसान नहीं रहेंगे क्योंकि उसके छोटे  - छोटे घटक सत्ता की चाशनी चखने एनडीए के साथ जा सकते हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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