Thursday, 18 July 2024

सिद्धारमैया भूल गए कि कर्नाटक के लोग भी अन्य राज्यों में कार्यरत हैं


कर्नाटक सरकार द्वारा नौकरियों में स्थानीय लोगों को आरक्षण दिये जाने के फैसले को एक दिन में ही वापस ले लिया गया। चूंकि उक्त निर्णय निजी क्षेत्र पर भी लागू होने वाला था लिहाजा राज्य का व्यवसायिक और औद्योगिक जगत खुलकर विरोध में उतर पड़ा। सिद्धारमैया सरकार इस फैसले के जरिये अपना जनाधार मज़बूत करना चाहती थी। यदि उक्त प्रावधान अमल में आ जाता तो  बेरोजगारों में ये संदेश जाता कि मुख्यमंत्री उनके प्रति बेहद संवेदशनशील  और  लीक से हटकर उनकी मदद हेतु प्रयासरत हैं। लेकिन वे भूल गए कि ऐसा ही निर्णय अन्य कुछ राज्यों द्वारा किये जाने के बावजूद वे उस पर अमल नहीं कर सके। हरियाणा में तो वह अदालत में उड़ गया। वैधानिक पक्ष छोड़ भी दें तो यह पूरी तरह अव्यवहारिक है। भले ही संविधान प्रदत्त संघीय  व्यवस्था के अंतर्गत राज्यों को अपना कामकाज चलाने का अधिकार दिया गया है किन्तु कोई भी राज्य इस तरह से व्यवहार नहीं कर सकता जिससे राष्ट्रीय एकता की भावना को नुकसान हो। उस दृष्टि से देखें तो चाहे हरियाणा  हो या कर्नाटक , स्थानीय लोगों को नौकरियों में आरक्षण हेतु निजी क्षेत्र को  बाध्य करना संघीय ढांचे की व्यवस्था को चोट पहुंचाने के साथ ही व्यवसाय की स्वतन्त्रता पर भी बन्दिश लगाने जैसा है। इस बारे में  सबसे महत्वपूर्ण ये है कि कर्नाटक में अनेक उद्योग ऐसे हैं जो दूसरे राज्यों के लोगों द्वारा स्थापित किये गए। राज्य सरकारों  द्वारा आयोजित निवेशक सम्मेलन के दौरान देश भर के उद्योगपतियों के लिए लाल कालीन बिछाये जाते हैं। उनको अपने राज्य में निवेश हेतु सस्ती जमीन और बिजली - पानी सहित अनेक सुविधाएं और रियायतें देने का लालच दिया जाता है। श्री सिद्धारमैया पूर्व में भी मुख्यमंत्री रहे हैं। इसलिए इतना जरूर जानते होंगे कि शुरुआत में किसी उद्योगपति पर स्थानीय लोगों को रोजगार देने हेतु आरक्षण की शर्त रख दी जाए तो वह बिदक जायेगा। दूसरी बात ये भी है कि यदि स्थानीय स्तर पर सुयोग्य व्यक्ति उपलब्ध होंगे तो कोई भी निवेशक उसे काम पर रखना चाहेगा । मुख्यमंत्री जी ये तो मानेंगे ही कि कर्नाटक के उद्योगों में लाखों श्रमिक उ.प्र, बिहार  और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों से आकर कार्यरत हैं। निर्माण कार्यों में तो इनकी उपस्थिति बड़ी संख्या में देखी जा सकती है। इसके अलावा सूचना तकनीक से जुड़ी जो बड़ी कंपनियां बेंगुलुरु में स्थित हैं उनमें देश भर की प्रतिभाएं कार्यरत हैं। यदि कर्नाटक में इतने सुयोग्य लोग होते तो वे  उनको ही काम पर रखतीं। और फिर श्री सिद्धारमैया  ये कैसे भूल गए कि उनके राज्य के हजारों युवक - युवतियाँ देश के दूसरे हिस्सों में भी कार्यरत हैं। ऐसे में उक्त  निर्णय लागू किया जाता तो उनके साथ उन राज्यों में भेदभाव शुरू हो जाता। स्मरणीय है गत वर्ष तमिलनाडु के वस्त्र उद्योगों में काम करने वाले बिहारी श्रमिकों के साथ मारपीट की घटना के बाद जब वे अपने गृहराज्य लौट गए तब उन उद्योगों का काम ठप्प पड़ गया। अंततः राज्य सरकार द्वारा सुरक्षा के आश्वासन के बाद ही श्रमिकों की वापसी हो सकी। कल जैसे ही कर्नाटक सरकार का उक्त फैसला सामने आया वैसे ही केरल और आंध्र प्रदेश की सरकार ने वहाँ के उद्यमियों को अपने यहाँ आने का न्यौता दे डाला। चौतरफा विरोध के बाद आखिरकार श्री सिद्धारमैया ने उक्त निर्णय वापस ले लिया किंतु इससे उनकी अपरिपक्वता जाहिर हो गई। अनुभवी मुख्यमंत्री होने के नाते उनको इतना तो पता होना चाहिए था कि इस तरह का निर्णय जिन भी राज्यों द्वारा लिया गया वह विफल हो गया। लिहाजा उस गलती को दोहराने से उनको बचना चाहिए था। लेकिन वे सब कुछ जानते हुए भी मक्खी निगलने की हिमाकत कर  बैठे जिससे उनकी जोरदार फजीहत हुई। अच्छा होगा अन्य राज्यों के मुख्यमंत्री इस तरह के मूर्खतापूर्ण निर्णयों से बचकर रहेंगे जिनका फ़ायदा कम नुकसान ज्यादा होता है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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