सद का बजट सत्र आज से प्रारंभ हो गया। कल वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण इस वित्तीय वर्ष का पूर्ण बजट पेश करेंगी। यद्यपि लगभग एक तिहाई साल तो बीत ही चुका है। फिर भी देश के उद्योगपति, व्यवसायी, नौकरपेशा इसका बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं क्योंकि इस पर न सिर्फ सरकार अपितु समाज के सभी वर्गों का आर्थिक नियोजन निर्भर होगा। देश के पास विदेशी मुद्रा का भंडार रिकॉर्ड मात्रा में है। इसके कारण आवश्यक वस्तुओं का आयात करने में कोई बाधा नहीं है। रक्षा सामग्री और कच्चे तेल के आयात में कोई कमी नहीं आने का कारण विदेशी मुद्रा की पर्याप्त मात्रा होना भी है। दुनिया की पांचवी अर्थव्यवस्था बन जाने के कारण भारत की स्थिति वैश्विक स्तर पर सम्मानजनक बनी है किंतु हाल ही में संपन्न लोकसभा चुनाव में बेरोजगारी और मंहगाई ने मतदाताओं के बड़े हिस्से को प्रभावित किया जिससे सत्तारूढ़ भाजपा को काफी नुकसान हुआ और वह स्पष्ट बहुमत से वंचित रह गई। इसका परिणाम यह हुआ कि 2014 और 2919 के चुनावों में बुरी तरह हारने वाला विपक्ष इस बार काफी बड़ी संख्या में नजर आ रहा है। लोकसभा के पहले सत्र में ही उसकी आक्रामकता से ये एहसास होने लगा कि अगले पाँच वर्ष संसद में शांति की उम्मीद करना व्यर्थ है। विशेष रूप से नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने जिस तरह सरकार पर हमला किया उसकी वजह से सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तालमेल होने की गुंजाइश की भ्रूण हत्या हो गई। श्री गाँधी द्वारा हिंदुओं को हिंसक कहे जाने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक खड़े हो गए। उसके बाद जब तक प्रधानमंत्री राष्ट्रपति के अभिभाषण पर उत्तर देते रहे थे तब तक समूचा विपक्ष शोर - शराबा करता रहा। इससे दोनों पक्षों के बीच सामंजस्य की उम्मीद पूरी तरह डूब गई। इसका प्रमाण गत दिवस हुई सर्वदलीय बैठक से मिला जिसमें कांग्रेस ने लोकसभा के उपाध्यक्ष का पद मांगने के साथ ही मणिपुर आदि पर चर्चा की मांग कर डाली। इसके साथ ही उ.प्र के मुज़फ़्फ़रनगर जिले में काँवड़ यात्रा मार्ग पर स्थित खाद्य सामग्री की दुकानों और हाथ ठेले वालों के लिए अपना नाम लिखने का जो आदेश प्रसारित हुआ उसके विरोध में भी आवाज उठी। इसके बाद ही राजनीतिक विश्लेषकों ने निष्कर्ष निकाला कि इस सत्र में भी वही सब देखने मिलेगा जिसकी बानगी उद्घाटन सत्र में मिल चुकी है । हालांकि प्रधानमंत्री द्वारा चुनाव के दौरान ही पहले 100 दिन के लिए जिस कार्य योजना का संकेत दिया था उसकी कोई झलक अब तक तो नहीं महसूस हुई क्योंकि किसी बड़े और कड़े निर्णय लेने की कोई पहल उनकी तरफ से नहीं दिखाई दी। इसका कारण सदन का बदला हुआ रूप ही है। वैसे सरकार के लिए विपक्ष जितनी समस्या है उतनी ही उसके वे सहयोगी हैं जिनके साथ भाजपा के काफी वैचारिक मतभेद हैं। वित्त मंत्री के बजट पर भी इसका असर रहेगा क्योंकि बिहार और आंध्र प्रदेश दोनों ने सर्वदलीय बैठक में भी उन्हें विशेष राज्य का दर्जा दिये जाने की मांग उठा दी ।ऐसे में अब सरकार के लिए विपक्ष को शांत करने के साथ जनता की नाराजगी दूर करने का सबसे आसान और प्रभावशाली तरीका बजट ही है। यदि इसके जरिये वह आम जनता को टैक्सों के बोझ के साथ ही मंहगाई से तत्काल राहत दिलवाने का इंतजाम करे तो इससे विपक्ष की आक्रामकता पर रोक लग सकेगी। आगामी कुछ महीनों में कुछ राज्यों में विधान सभा चुनाव होने वाले हैं जहाँ लोकसभा चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन अच्छा नहीं था। इसीलिए ये कयास लगाए जा रहे हैं कि वित्त मंत्री इन राज्यों पर मेहरबानियों की बरसात करेंगी। हालांकि उन पर विपक्ष, जनता और बाजार तीनों का जो जबरदस्त दबाव है उससे अपना बचाव वे किस प्रकार कर पाएंगी उसी से उनकी प्रतिभा का पता चलेगा। अन्यथा अभी तक तो वे विशाल बहुमत वाली सरकार की वित्तमंत्री थीं। हालांकि दबाव विपक्ष पर भी कम नहीं है क्योंकि वह भी जनता को ढेर सारे सब्जबाग दिखा चुका है। ऐसे में उसे भी सत्ता पक्ष के साथ सामंजस्य बनाकर चलना होगा। कुल मिलाकर कह सकते हैं इस बार का जनादेश सत्ता और विपक्ष दोनों को हद में रहने का संदेश देता है ।
- रवीन्द्र वाजपेयी
No comments:
Post a Comment