Monday, 26 October 2026

खरगे जैसे बुजुर्ग ऐसी बात करेंगे तब युवाओं को कौन रोकेगा



किसी छुटभैये ने ये कहा होता तब उसको नजरंदाज किया जा सकता था किंतु  80 साल की आयु सीमा लाँघ चुका बुजुर्ग ऐसी निम्नस्तरीय बात सार्वजनिक मंच से कहे तब ये कहना अनुचित नहीं होगा कि उनका मानसिक संतुलन गड़बड़ा गया है या फिर वे  अवसाद की स्थिति में हैं। संदर्भ कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष और राजयसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे द्वारा गत दिवस पटना के एक आयोजन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में की गई टिप्पणी है जिसकी वजह ने उनके साथ ही समूची कांग्रेस पार्टी कटघरे में खड़ी हो गई। दरअसल पटना में स्व. डॉ. श्री कृष्ण सिंह की जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में भाषण देते हुए श्री खरगे बोल उठे  सरकार में अनियमितता करने वालों को जेल भेजा जाएगा। इस पर भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने कहा कि मोदी नहीं जाएंगे। उस पर  चिल्लाते हुए श्री खरगे ने कहा, मोदी का बाप भी जाएगा। और इस बात को उन्होंने कई मर्तबा दोहराया जिससे ये स्पष्ट हो गया कि उनकी जुबान नहीं फिसली अपितु उन्होंने   जान बूझकर वह टिप्पणी की। इसके बाद जो कुछ हुआ वह और भी शर्मनाक  था क्योंकि कांग्रेस कार्यकर्ताओं  ने मोदी नहीं जायेगा चिल्लाने वाले शख्स को भाजपाई मानकर  उसकी पिटाई कर दी। लेकिन पार्टी की किरकिरी तब हुई जब पता चला कि  संतोष नामक वह व्यक्ति भाजपा नहीं बल्कि कांग्रेस पार्टी का कार्यकर्ता ही था। सभागार से निकलने के बाद उस बेचारे ने  बताया कि लोगों को गलतफहमी हुई है। उसके अनुसार वह  तो पूरा वाक्य बोल रहा था कि जब तक जनता बगावत नहीं करेगी, तब तक मोदी कहीं नहीं जाएगा। लेकिन मेरा जब तक , वाला हिस्सा  शोर - शराबे में दब गया और कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने  मुझे बीजेपी का समर्थक समझकर पीट दिया। वहाँ उपस्थित संवाददाताओं ने भी इस बात की पुष्टि की कि  विवाद की शुरुआत एक अधूरे वाक्य और गलतफहमी से हुई।  श्री खरगे की उक्त टिप्पणी के विरोध में गृहमंत्री अमित शाह ने कांग्रेस अध्यक्ष की भाषा को राजनीतिक मर्यादाओं के विरुद्ध बताया वहीं पार्टी ने देशव्यापी प्रदर्शन की घोषणा कर डाली। पटना के कोतवाली थाने में खरगे के खिलाफ लिखित शिकायत दर्ज कराई गई है। यद्यपि ये पहला अवसर नहीं है जब किसी कांग्रेस नेता ने प्रधानमंत्री के विरुद्ध आपत्तिजनक टिप्पणी की हो। अतीत में ऐसी घटनाएं दोहराई जाती रहीं जिनके चलते कांग्रेस को राजनीतिक नुकसान भी उठाना पड़ा। राहुल गाँधी तो श्री मोदी के बारे में जिस शैली और शब्दों का उपयोग करते हैं उससे आये दिन विवाद उत्पन्न होते हैं। उनके और प्रधानमंत्री के बीच सौजन्य भेंट भी कम ही होती है किंतु श्री खरगे और शुरू मोदी के आपसी संबंध काफी अच्छे हैं। विभिन्न अवसरों पर एक - दूसरे से मिलते समय दोनों परस्पर सम्मान व्यक्त करते नजर आते हैं। इसीलिए कांग्रेस अध्यक्ष द्वारा प्रधानमंत्री के पिता को लेकर कही गई बात से लोगों को आश्चर्य हुआ। उम्मीद तो ये थी कि कांग्रेस के बुजुर्गवार अध्यक्ष अपनी स्तरहीन टिप्पणी के लिए तत्काल खेद व्यक्त करते हुए क्षमा मांग लेते। लेकिन अभी तक तो उनकी ओर से इस बारे में कुछ नहीं कहा गया। उल्टे कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने बेहद बचकाने अंदाज में उनका बचाव करते हुए सफाई दी है कि उनका इशारा प्रधानमंत्री के वैचारिक मार्गदर्शक संगठन (रा .स्व .संघ)  की ओर था। सवाल ये है कि श्री खेड़ा को ये दिव्य ज्ञान स्व प्रेरणा से हुआ या श्री खरगे ने उन्हें ऐसा कहने के लिए निर्देशित किया। हो सकता है कांग्रेस पार्टी और खुद खरगे जी अतीत में प्रधानमंत्री सहित अन्य भाजपा नेताओं की टिप्पणियों का उदाहरण देकर पटना में कही गई बात को उचित ठहराएं किंतु आरोप - प्रत्यारोप से अलग हटकर देखें तो श्री खरगे ने जो कहा वह उनके पद और उम्र को देखते हुए अप्रत्याशित और आपत्तिजनक था जिसके लिये  वे बिना देर लगाए खेद व्यक्त कर देते तब आलोचना और फजीहत से बच जाते। अब तक उनके और श्री मोदी के बीच निजी संवाद एवं व्यवहार शालीनता की सीमा में ही रहा है। ये देखते हुए अब खरगे जी जब भी प्रधानमंत्री के रूबरू होंगे तब किस मुँह से उनका सामना करेंगे वे बड़ा सवाल है। हालांकि आज की राजनीति में मर्यादा और शालीनता जैसे शब्द अर्थ खोते जा रहे हैं । जंतर मंतर पर हुए आंदोलन के दौरान प्रधानमंत्री के बारे में लड़के - लड़कियों के कुछ गुटों ने जिस अश्लील शब्दावली का उपयोग किया उसकी सर्वत्र निंदा हुई और नई पीढी़ में संस्कारों के क्षरण को लेकर चिंता जताई जाने लगी। लेकिन जब खरगे जी जैसे वयोवृद्ध सार्वजनिक मंच पर इस तरह की भद्दी भाषा का प्रयोग करेंगे तब युवा पीढ़ी को कौन रोकेगा? 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 24 October 2026

कुछ पेशेवर किस्म के लोग हर आंदोलन में नजर आते हैं



कुछ वर्ष पहले जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में आंदोलनजीवी शब्द का उपयोग किया तब विपक्ष ने इस पर खूब बवाल मचाया। उसका कहना था कि प्रधानमंत्री ने उन लोगों का मजाक बनाया जो जनहित के लिए आवाज उठाते हैं। लोकतंत्र में जनांदोलन अपनी मांगों को रखने के साथ ही सरकार के विरोध का प्रचलित तरीका है। भारत के स्वाधीनता संग्राम ने पूरे विश्व को ये सिखाया कि हिंसा का सहारा लिए बिना भी ब्रिटिश सत्ता जैसी वैश्विक शक्ति को झुकाया जा सकता है। भारत की आजादी के बाद अनेक देशों ने शांतिपूर्ण अहिंसक आंदोलन के जरिये विदेशी दासता से मुक्ति हासिल की। दक्षिण अफ्रीका के नेल्सन मंडेला तो लगभग तीन दशक तक कारागार में रहने के बाद भी अहिंसक आंदोलन के महानायक बनकर  राष्ट्रपति बने। भारत में तो राजनीति और आंदोलनों का चोली दामन का साथ रहा है। आजादी के आंदोलन में शामिल अग्रणी पंक्ति के अनेक नेता जहाँ सत्ता प्रतिष्ठान के शीर्ष पर विराजमान हुए वहीं उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर ब्रिटिश हुकूमत से लड़ने वाले उतने ही लोकप्रिय और सम्मानित नेताओं ने सैद्धांतिक विरोध के चलते विपक्ष में बैठना पसंद किया। विपक्ष में रहते हुए कुछ नेता श्रमिकों के हितों में संघर्ष के रास्ते पर चले तो कुछ ने कर्मचारियों , किसानों और छात्रों के संगठन भी बनाये। सभी क्षेत्रों के लोगों ने अपनी मांगों के लिए हड़ताल, धरना, प्रदर्शन, रैली अनशन जैसे तरीके अपनाये। राजनीतिक दलों द्वारा भी ग्रामीण क्षेत्र से लेकर तो राजधानी दिल्ली तक में आंदोलनों के जरिये शक्ति प्रदर्शन किया। लेकिन समय के साथ उनका स्तर गिरने से अनुशासनहीनता का बोलबाला हो गया। वाजिब मांगों के बजाय अनुचित दबाव बनाने की प्रवृत्ति जोर पकड़ने लगी। इसके लिए राजनीतिक दलों को दोष देना गलत नहीं होगा जिन्होंने किसी आंदोलन के पीछे छिपे निहित उद्देश्यों को जांचे बिना ही अपने फायदे के लिए उसका समर्थन किया। हालांकि ये स्वीकार करना  होगा कि आंदोलनों से कर्मचारियों, मजदूरों और किसानों की स्थिति में सुधार हुआ किंतु दूसरी तरफ इसका लाभ संगठित क्षेत्र को ही मिलता रहा। अर्थात दबाव समूह से जुड़ा तबका तो अपनी बात मनवाने में कामयाब हो गया किंतु बहुत बड़ा वर्ग  असंगठित होने से वंचितों की श्रेणी में जीने बाध्य है। यही विसंगति देश के सामने मौजूद अनेक समस्याओं की जड़ है। और इसीलिए आंदोलनों के प्रति व्यक्त की जाने वाली भावनाएं बदलने लगीं। हमारे देश में दो बड़े जनांदोलनों के बाद केंद्रीय सत्ता बदली।। इनमें जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में हुआ संपूर्ण क्रांति आंदोलन जिसके कारण आपातकाल लगा और जब चुनाव करवाये गए तब इंदिरा गाँधी को सत्ता गँवाना पड़ी। उसी तरह अन्ना हजारे द्वारा लोकपाल की स्थापना के लिए किये आंदोलन ने डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार के जाने का रास्ता बनाया। लेकिन बीते कुछ सालों में देश जिस तरह के आंदोलन देख रहा है उनमें जनहित की आड़ में देशहित को नुकसान पहुंचाने का जो खेल हो रहा है वह खतरनाक है। चाहे मुद्दा किसानों का हो, दलितों या पिछड़ों का हो, कर्मचारी - श्रमिकों का या छात्रों का। उसके समर्थन में कुछ घिसे - पिटे चेहरे आगे - आगे घूमते दिख जाएंगे। कृषि कानूनों के विरोध में दिल्ली की सीमा पर साल भर चले धरने और शाहीन बाग में सड़क घेरकर किये आंदोलन को प्रोत्साहन और समर्थन देने एक वर्ग विशेष की सक्रियता चर्चा का विषय बनी। जंतर मंतर पर हुए हालिया आंदोलन के दौरान भी वही लोग मौजूदगी दर्ज करवाते नजर आये । उसी तरह  नीट परीक्षा के पेपर लीक होने वाले मामले से शुरू होकर मुख्य चुनाव आयुक्त के त्यागपत्र और एसआईआर रद्द करने के लिए हो रहे आंदोलन में भी अनेक समान चेहरे देखे जा सकते हैं। कभी - कभी तो लगता है इन लोगों की रोजी - रोटी ही आंदोलनों से जुड़ी हुई है। और इसीलिए इन आंदोलनों का स्वरूप बिखरा - बिखरा नज़र आता है। किसान आंदोलन, शाहीन बाग और अब चुनाव आयोग के विरुद्ध सड़कों पर उतरे लोगों के साथ चंद ऐसे लोग अनिवार्य रूप से जुड़ गए हैं जिन्हें आंदोलनजीवी कहा जाना सर्वथा उचित है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने कॉकरोच जनता पार्टी के दो नेताओं की उम्र जानने के बाद कटाक्ष किया कि वे जेन जी नहीं हैं। कुल  मिलाकर ये देखने मिल रहा है कि जनांदोलन के नाम पर कुछ ऐसे पेशेवर लोग खुद को नेता साबित करने में लगे हुए हैं जिन्हें जनता धूल चटा चुकी है। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि इन्हीं धंधेबाजों की वजह से आंदोलन अपनी साख खो बैठते हैं। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 23 October 2026

बद्र समझौता : ईरान के विरुद्ध मुस्लिम देशों की मोर्चेबंदी



अगस्त माह में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये ने मिलकर  मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट हस्ताक्षरित किया था। इसे इस्लामिक नाटो नाम दिया गया क्योंकि इसके तहत किसी एक देश पर हुआ सशस्त्र हमला तीनों देशों पर हमला माना जाएगा । जैसी कि नाटो नामक संगठन में व्यवस्था है जिसका नेतृत्व अमेरिका करता है। इसका गठन शीतयुद्ध के दौर में सोवियत संघ के विरोध में किया गया था। इसके तहत जरूरत पड़ने पर परमाणु और मिसाइल सुरक्षा के साथ-साथ साझा सैन्य ट्रेनिंग और खुफिया जानकारी  का लेनदेन भी शामिल है। इसके मुकाबले सोवियत संघ द्वारा वारसा पैक्ट नामक ऐसी ही संधि की गई थी। इन दोनों के अलावा एक तीसरा संगठन गुट निरपेक्ष सम्मेलन के नाम से बना जो उक्त नाटो और वारसा दोनों संधियों से अलग था। इसके नेता के तौर पर भारत के पं. जवाहरलाल नेहरू, यूगोस्लाविया के मार्शल टीटो, मिस्र के  कर्नल नासेर और इंडोनेशिया के सुकर्णों थे। सोवियत संघ के विघटन के बाद शीतयुद्ध की समाप्ति हो गई। इसके बाद उदारीकरण के अंतर्गत विश्व व्यापार संगठन अस्तित्व में आया जिसके कारण समूचा विश्व एक बड़े बाजार में तब्दील हो गया। यहाँ तक कि चीन जैसे कट्टर साम्यवादी देश ने भी पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के प्रभाव में आकर अपने दरवाजे बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए खोल दिये। इसके बाद चीन भी अमेरिका की टक्कर में एक आर्थिक महाशक्ति के तौर पर उभर गया। इसके साथ ही उसने सैन्य महाशक्ति के रूप में भी खुद को स्थापित कर लिया। इसके चलते दुनिया का शक्ति संतुलन भी बदलने लगा। धीरे - धीरे और शक्ति केंद्र भी अपनी जगह बनाते चले गए। लेकिन शीतयुद्ध के भयावह दौर से निकलकर दुनिया में आर्थिक विकास की होड़ बीते तीन दशकों में देखने मिली जिसमें अमेरिका के साथ ही चीन, भारत, ब्राज़ील, और द. अफ्रीका जैसे नये खिलाड़ी मैदान में नजर आने लगे। इसकी वजह से अमेरिका की चौधराहट को चुनौती मिलने लगी। लेकिन  अचानक दुनिया दो ऐसी लड़ाइयों में उलझ गई जिनकी वजह से सब उलट - पुलट हो गया। पहले रूस - यूक्रेन और फिर अमेरिका - ईरान के बीच चल रहे युद्ध ने सभी स्थापित संतुलन बिगाड़ दिये। रही - सही कसर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के सनकीपन ने पूरी कर दी। रूस - यूक्रेन युद्ध तो एक क्षेत्र विशेष तक सीमित है लेकिन ईरान ने अमेरिका और इजरायल के हमले के प्रत्युत्तर में जवाबी हमला करते हुए अन्य इस्लामिक देशों तक फैला दिया। ये एक अभूतपूर्व स्थिति है क्योंकि इसके पहले तक इजरायल के विरुद्ध समूचा इस्लामिक जगत एकजुट हो जाता था। लेकिन इस जंग ने इस्लामिक देशों में भी गुटबाजी पैदा कर दी। मक्का पैक्ट इसी की उपज थी। लेकिन सऊदी अरब के विरुद्ध हूती हमलों को जिस प्रकार ईरान समर्थन दे रहा है और अमेरिका सहित अन्य पश्चिमी देशों ने मदद से हाथ पीछे खींचे उसके कारण कुछ इस्लामिक देशों में सैन्य आत्मनिर्भरता की भावना जागी जिसका प्रमाण गत दिवस कतर की राजधानी दोहा में पाकिस्तान, तुर्किये, कतर और इंडोनेशिया द्वारा किया गया बद्र समझौता है जिसके तहत ये देश मिलकर हथियार और सैन्य तकनीक का साझा उत्पादन करेंगे। इसका उद्देश्य हथियारों के लिए पश्चिमी देशों पर निर्भरता घटाना, आपसी रक्षा उद्योग को बढ़ावा देना और सैन्य तकनीक का आदान-प्रदान करना है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि बद्र समझौते से ये  आने वाले समय में वैश्विक स्तर पर एक नया रक्षा समीकरण बन सकता है।  विचारणीय बात ये है कि क्या ये केवल ईरान से बचाव के लिए बना या इजरायल के विरुद्ध भी इसका उपयोग होगा। इससे भी बड़ी बात ये है कि तुर्किये और पाकिस्तान के कारण इससे भारत को भी सतर्क रहना पड़ेगा। दूसरी बात ये है कि अमेरिका इसे लेकर क्या रवैया अपनाता है क्योंकि वह नहीं चाहेगा कि सऊदी अरब, कतर और पाकिस्तान सैन्य आत्मनिर्भरता हासिल करें अन्यथा उसका अपना धंधा चौपट हो जायेगा। भारत को भी इस नये समझौते के जवाब में कुछ न कुछ करना होगा क्योंकि वह खुद हथियारों के निर्यातक के रूप में उभर रहा है। देखने वाली बात ये भी होगी कि इसके बाद इस्लामिक देशों के संगठन का क्या होगा क्योंकि ईरान ने उसकी जड़ें हिला दी हैं। कुल मिलाकर दुनिया का शक्ति संतुलन जिस तरह बदल रहा है उसमें बद्र समझौता एक नये अध्याय की शुरुआत कहा जा सकता है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी




Thursday, 22 October 2026

कॉकरोच जनता पार्टी का खोखलापन सामने आ गया



कॉकरोच जनता पार्टी के बारे में अवधारणा थी कि इसका सबसे बड़ा नेता अभिजीत दिपके है जिसने देश के मुख्य न्यायाधीश  द्वारा युवकों को लेकर कॉकरोच शब्द का उपयोग किये जाने की प्रतिक्रिया स्वरूप अमेरिका में बैठे - बैठे इस पार्टी का सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर गठन किया। देखते - देखते आभासी माध्यम पर  करोड़ों लोग उससे जुड़ गए जिनमें अधिकतर युवा ही थे। जून में अभिजीत  भारत लौटे। उस समय नीट परीक्षा के पेपर लीक हो जाने से दुखी होकर कुछ छात्रों द्वारा आत्महत्या किये जाने से छात्र और युवाओं में गुस्सा था। यद्यपि कांग्रेस  उस मुद्दे पर विरोध प्रदर्शन करते हुए उस समय के  शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र की मांग कर रही थी। लेकिन सरकार ने उसे नजरंदाज कर दिया। यदि उसी समय उनको मंत्रीपद से हटा दिया जाता तब  शायद कॉकरोच जनता पार्टी को मौका नहीं मिलता। लेकिन अभिजीत जब अमेरिका से आये तब सरकार ने  उन्हें जरूरत से ज्यादा महत्व देते हुए जंतर मंतर पर सभा की अनुमति दे दी। उनके साथ अचानक सौरव दास और आशुतोष रांका नामक दो और युवक सामने आए जिनके बारे में लोगों को कुछ पता नहीं था। उसी सभा में श्री प्रधान के त्यागपत्र के लिए लिए  अंतिम तिथि तय करते हुए आंदोलन की चेतावनी भी दी गई। त्यागपत्र न होने पर जंतर मंतर में धरना शुरू हुआ। जिसमें जेएनयू की टुकड़े - टुकड़े गैंग और आम आदमी पार्टी खुलकर सामने आ गईं। धीरे - धीरे स्पष्ट हो गया कि अभिजीत , सौरव और आशुतोष आम आदमी पार्टी के लिए काम करते  रहे हैं। बहरहाल शिक्षा मंत्री के त्यागपत्र सहित कुछ और मांगों पर केंद्र से समझौता होने पर आंदोलन समाप्त हो गया और  कॉकरोच जनता पार्टी ने राजनीति से दूर रहकर दबाव समूह के तौर पर शिक्षा के क्षेत्र में व्याप्त समस्याओं और विसंगतियों को दूर करने हेतु काम करने का ऐलान किया। उसके नेता विद्यालयों के निरीक्षण जैसे कामों में जुट गये। हालांकि सरकार को धमकाना उनकी आदत सी बन गई। इसी समय एक अखबारी रिपोर्ट के आधार पर विपक्षी पार्टियों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के त्यागपत्र के लिए आंदोलन छेड़ दिया। अभी तक शिक्षा जगत तक खुद को सीमित रखने वाली कॉकरोच जनता पार्टी  भी बहती गंगा में हाथ धोने दिल्ली में सक्रिय हो गई। उसे लगा कि श्री प्रधान के त्यागपत्र की तर्ज पर वह ज्ञानेश कुमार का त्यागपत्र भी करवा लेगी। लेकिन इस बार उसका आकलन गलत हो गया। दूध से जली सरकार ने छाछ फूंककर पीने की कहावत चरितार्थ करते हुए जो मोर्चेबंदी की उसमें कॉकरोच जनता पार्टी उलझ गई। निषेधाज्ञा तोड़ने पर हिरासत में लिए जाने के बाद शांति भंग न करने का लिखित वचन पत्र देकर उसके तीनों नेता बाहर तो आ गए किंतु जंतर मंतर को प्रतिबंधित किये जाने के बावजूद भी वहाँ तिरंगा यात्रा निकालने का दुस्साहस कर बैठे। अभिजीत को तो पहले ही   गिरफ्तार कर छोड़ भी दिया गया किंतु सौरव और आशुतोष  बैरिकेड लाँघकर प्रतिबंधित क्षेत्र में तिरंगा लेकर पहुंचे तो गिरफ्तार करने के बाद जेल भेज दिये गए। सप्ताह पर बाद गत दिवस दोनों जमानत पर रिहा तो हो गए किंतु मामला क्राइम ब्रांच को दिये जाने से जाँच के शिकंजे में फंस गए। आज ही उन्हें क्राइम ब्रांच ने बुलावा भेज दिया। पूरे देश को जंतर मंतर बना देने की डींग हांकने वाले कॉकरोच नेता अब अपने बचाव में लग गए हैं। अभिजीत सफाई देते फिर रहे हैं कि पार्टी का उद्देश्य ज्ञानेश कुमार का त्यागपत्र ही है। सरकार बदलने और बांग्लादेश तथा नेपाल में हुए आंदोलनों से उसे कुछ लेना देना नहीं है। और तो और वे यहाँ तक बोल गए कि पार्टी के बड़े नेता सौरव दास और आशुतोष रांका  हैं , वे तो उनके आदेशानुसार काम करते हैं। उनका ये बयान रहस्यमय है। श्री प्रधान के त्यागपत्र के मामले में सरकार को झुकाने में सफलता मिलने से सातवें आसमान पर उड़ने लगे सौरव और आशुतोष की सारी अकड़ उच्च न्यायालय ने निकालते हुए उन्हें जेन जी मानने से ही इंकार करते हुए जो फटकार लगाई उसके बाद इस पार्टी का खोखलापन उजागर हो गया। असल में उसके तीनों नेता खुद को कानून से ऊपर समझने की गलती कर गए। उनके जेल जाने का विरोध करती  युवाओं की फौज कहीं नजर नहीं आई जिसका संकेत साफ है। आम आदमी पार्टी छोड़कर बाकी के राजनीतिक दल  इस नई नवेली पार्टी के कानूनी पचड़ों में फंस जाने से मन ही मन खुश हैं क्योंकि ये  एकला चलो की नीति पर चल रही थी। अब इज्जत बचाने के लिए अभिजीत, सौरव और आशुतोष अपने  गॉड फादर अरविंद केजरीवाल की शरण में जाएंगे किंतु जिस तरह काठ की हांडी दोबारा नहीं चढ़ती ठीक वैसे ही कॉकरोच जनता पार्टी भी जुलाई जैसा आंदोलन दोबारा खड़ा नहीं कर पाएगी क्योंकि उसके पास न तो कोई सैद्धांतिक आधार है और न ही संगठनात्मक ढांचा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 21 October 2026

नेहा और भूषण के बयानों से आंदोलन की धार कमजोर हो गई



अचानक सब शांत हो गया। दो नेताओं के जेल जाने के बाद कॉकरोच जनता पार्टी के प्रमुख अभिजीत दिपके अपने कार्यकर्ताओं को परिवार के लिए समय निकालने की समझाइश देते सुने जा रहे हैं। दूसरी तरफ वोट चोरी आंदोलन को जिंदा रखने वाले राहुल गाँधी गोवा में गरजने के बाद निजी काम से वियतनाम चले गए ।  वैसे भी त्यौहारों  के समय किसी जनांदोलन को जीवंत रखना मुश्किल होता है। शायद यही सोचकर कॉकरोच और काँग्रेस दोनों ने आंदोलन को विराम दे दिया । हालाँकि काँग्रेस द्वारा 1 नवम्बर को दिल्ली के रामलीला मैदान में मुख्य चुनाव आयुक्त विरोधी महारैली आयोजित  करने की घोषणा की जा चुकी है क्योंकि  उसके बाद फिर दीपावली की तैयारियां शुरू होने से बड़े आंदोलन की  गुंजाइश नहीं रहेगी। दरअसल श्री गाँधी सहित अन्य विपक्षी नेताओं के सर्वोच्च न्यायालय परिसर में जुलूस लेकर पहुँचने पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत द्वारा नाराजगी व्यक्त करने और तमाम नेताओं को नोटिस भेजे जाने के बाद विपक्षी नेताओं की अकड़ में कमी आ गई। उन्हें ये महसूस होने लगा कि  न्यायपालिका विशेष रूप से सर्वोच्च न्यायालय से टकराव भारी पड़ सकता है। विपक्ष के तेवर ठंडे पड़ने का सबसे बड़ा कारण बना आइसा अध्यक्ष नेहा बोरा द्वारा ज्ञानेश कुमार विरोधी आंदोलन को बांग्लादेश में हुए युवा आंदोलन से प्रेरित बताये जाने से जिसके कारण शेख हसीना को जान बचाकर भारत आना पड़ा। रही सही कसर पूरी कर दी वरिष्ट अधिवक्ता प्रशांत भूषण द्वारा  इस आंदोलन के जरिये सरकार बदलने की शेखी बघारे जाने से। इन दोनों के बड़बोलेपन की वजह से विपक्ष की आक्रामकता को जबर्दस्त धक्का लगा। इसका प्रमाण तब मिला जब कॉकरोच जनता पार्टी प्रमुख अभिजीत ने  ये सफाई दी की कि इस आंदोलन को बांग्लादेश या नेपाल में हुए युवा आंदोलन से जोड़ना गलत है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसका उद्देश्य सरकार को नहीं अपितु ज्ञानेश कुमार को हटाने तक ही सीमित है। काँग्रेस की तरफ से शशि थरूर ने  भी नेहा बोरा तथा प्रशांत भूषण के बयानों से असहमति व्यक्त करते हुए आंदोलन के जरिये सरकार को हटाने जैसी किसी भी कोशिश का खंडन किया। अन्य विपक्षी नेताओं के अलावा जो गैर राजनीतिक तबका ज्ञानेश कुमार के विरोध में चल रहे विपक्षी आंदोलन को भावनात्मक समर्थन दे रहा था वह भी बांग्लादेश जैसी अराजकता से प्रेरणा लेने और सरकार हटाने के लिए खूनखराबा हो जाने की बात कहे जाने से बिदक गया। कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि नेहा बोरा और प्रशांत भूषण द्वारा जोश में होश खो बैठने और बेहद गैर जिम्मेदाराना बयान दिये जाने से विपक्षी आंदोलन के सामने छवि का संकट खड़ा हो गया। भाजपा ने भी बिना देर लगाए नेहा और श्री भूषण के उल्लिखित बयानों के आधार पर ये आरोप लगाना शुरू कर दिया कि विपक्ष भारत में बांग्लादेश जैसा हिंसात्मक वातावरण बनाकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया से  चुनी हुई सरकार को अपदस्थ करना चाह रहा है जिसकी वजह से देश अराजकता के मकड़जाल में फंसकर रह जाएगा। नरेंद्र मोदी को पानी पी - पीकर गालियाँ देने वाले कतिपय यू - ट्यूबर पत्रकारों ने भी माना कि इस आंदोलन को बांग्लादेश से प्रेरित और सरकार हटाने से जोड़ना आत्मघाती कदम है। इन्हीं सब वजहों से आंदोलन का पैनापन कम हो गया और बीते कुछ महीनों के बाद विपक्ष को रक्षात्मक होना पड़ा। परिणाम ये हुआ कि आंदोलन से जुड़े संगठन      नेहा बोरा और प्रशांत भूषण से दूरी बनाने लगे। उन सबकी समझ में ये बात आ गई है कि भारत की जनता किसी भी स्थिति में हिंसा की राजनीति को स्वीकार नहीं करेगी। देखना ये है अब ये आंदोलन  किस तरह आगे बढ़ेगा क्योंकि अपनी ढपली, अपनी राग के चलते उसमें बिखराव खुलकर सामने आ चुका है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 19 October 2026

अपना ऊर्जा संकट दूर करने भारत के दरवाजे आया अमेरिका



कुछ दिन पहले की बात है जब अमेरिकी राष्ट्रपति के सबसे बड़े आर्थिक सहयोगी इलान मस्क ने स्टारलिंक इंटरनेट सेवाओं की अनुमति नहीं मिलने के कारण मुकेश अंबानी पर निशाना साधते हुए उन्हें प्रधानमंत्री तक कह डाला। साथ ही ये तंज भी कसा कि भारत में कुछ बड़े लोग काम रुकवा देते हैं।  दरअसल मस्क चाहते थे कि स्टारलिंक को बिना नीलामी के भारत में काम करने की अनुमति दे दी जाए। उनका तर्क ये है कि लगभग डेढ़ सौ देश स्टारलिंक की सेवाएं ले रहे हैं इसलिए भारत को भी उसे अनुमति दे देनी चाहिए। लेकिन रिलायंस और एयरटेल नामक दो भारतीय  खिलाड़ी  उनके मुकाबले आ खड़े हुए। ऐसे में सरकार के लिए भी सीधे स्टारलिंक को अनुमति देना संभव नहीं रहा। इसके बाद  इलान मस्क ने डोनाल्ड ट्रम्प के जरिये भारत की अग्रणी आई. टी कंपनियों के कर्मचारियों की वीसा सुविधाएं खत्म करने का दबाव बनाया। साथ ही  भारत में सस्ती इंटरनेट सेवा प्रदान करने का दाना भी फेंका। तब भी काम नहीं बना तो अंबानी के बारे अच्छी टिप्पणियां करते हुए कड़वाहट कम करने की कोशिश की। इसी क्रम में अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो का आज  भारत आगमन हो रहा है। लेकिन वे राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली न आकर आर्थिक राजधानी मुंबई में कारोबारियों से मिलेंगे। लेकिन चौंकाने वाली बात ये है कि रूबियो जामनगर जाएंगे जहाँ मुकेश अंबानी की रिलायंस कंपनी की रिफाइनरी  है। रूस - यूक्रेन  युद्ध के दौरान रिलायंस ने रूस से आयातित कच्चे तेल से डीजल - पेट्रोल बनाकर यूरोपीय देशों को निर्यात कर अपनी क्षमता प्रमाणित की। अमेरिका को इससे बड़ी तकलीफ हुई। लेकिन भारत ने  ट्रम्प के दबाव को नजरंदाज करते हुए रूस से कच्चे तेल की खरीदी जारी रखी और डीजल - पेट्रोल के निर्यात में भी कमी नहीं की। ईरान संकट लम्बा खिंचने के कारण पूरी दुनिया में तो ऊर्जा संकट उत्पन्न हुआ ही लेकिन अंततः अमेरिका में भी डीजल  की कमी होने से  दाम काफी ऊपर चले गए। जिससे जनता ट्रम्प से  नाराज हो उठी। महंगाई बढ़ने के कारण आगामी 3 नवम्बर को होने वाले मध्यावधि चुनाव में ट्रम्प की पार्टी के संसद में अल्पमत में आने का खतरा उत्पन्न हो गया।इससे बचने के लिए उन्होंने रूस से डीजल खरीदने के सौदे के साथ ही भारत पर लगे 100 फीसदी टैरिफ को एक माह के लिए टालते हुए रूस से कच्चा तेल खरीदने की छूट दे दी। और तो और रिलायंस की जामनगर रिफायनरी से डीजल खरीदने की पेशकश भी कर डाली। यद्यपि ट्रम्प अपनी इज्जत बचाने के लिए इस फैसले को दुनिया में कच्चे तेल के दाम नियंत्रित करने के साथ ही भारत को ऊर्जा संकट से बचाने से जोड़ रहे हैं। लेकिन असलियत यही है कि उन्होंने अपने यहाँ ऊर्जा संकट पैदा होने के कारण मजबूरन रूस से व्यापारिक रिश्ते कायम करने और भारत को 100 फीसदी टैरिफ से महीने भर की राहत देने का फैसला किया। अमेरिकी विदेश मंत्री रूबियो अपनी मुंबई यात्रा के दौरान  ऊर्जा सहयोग, व्यापार और निवेश, रक्षा, और रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने संबंधी चर्चा कारोबारियों से करने के अलावा भारतीय अधिकारियों और विदेश मंत्री एस. जयशंकर से भी मुलाकात करेंगे। लेकिन उनकी यात्रा का मुख्य उद्देश्य जामनगर में रिलायंस रिफाइनरी का भ्रमण कर मुकेश अंबानी से डीजल खरीदने का सौदा करना है जिससे कि अमेरिका में व्याप्त ऊर्जा संकट से राहत मिले। इससे भी महत्वपूर्ण बात ये है कि जिन मुकेश अंबानी को इलान मस्क भारत में स्टारलिंक के लिए रोड़ा बता रहे थे उन्हीं के लिए अमेरिका में आइल रिफ़ायनरी लगाने के लिए लाल कालीन बिछाये जा रहे हैं। उल्लेखनीय है अमेरिका में कच्चे तेल के भंडार तो बहुत हैं लेकिन रिफ़ायनरी नहीं होने से वह डीजल, पेट्रोल और गैस का आयात करने मजबूर है। ईरान संकट के कारण प. एशिया से कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित होने से अमेरिका भी मुसीबत में फंस गया है। वेनेजुएला के तेल भंडारों पर कब्जा करने के बाद भी रिफाइनरी की कमी उसकी समस्या बन गई। और तब उसे भारत का महत्व समझ में आया जो कच्चे तेल को पेट्रोल - डीजल में बदलने के क्षेत्र में काफी आगे है।  बीते कुछ दिनों में भारत के प्रति अमेरिकी रुख में आया बदलाव उसकी मजबूरी का परिणाम है। इसीलिए कुछ दिनों पहले अमेरिका में कार्यरत भारतीयों को बंधुआ मजदूर कहने वाले उपराष्ट्रपति जे. डी. वेंस अब उनके प्रति अपना प्रेम व्यक्त कर रहे हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Saturday, 17 October 2026

ट्रम्प ने फिर पलटी मारी : 100℅ टैरिफ रुका



फैसले लेना और फिर उसे ठंडे बस्ते में डाल देने वाले व्यक्ति की विश्वसनीयता खत्म हो जाती है। इसी तरह धमकी देकर कदम पीछे खींच लेने वाला अपना रुतबा गँवा बैठता है। उक्त दोनों बातें अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प पर सटीक बैठती हैं। जबसे वे दोबारा राष्ट्रपति बने तबसे पूरी दुनिया को बेवजह परेशानी में डालते रहते हैं। ऊलजलूल निर्णय लेकर वे पहले तो किसी भी देश पर बिना वजह रौब दिखाने लगते हैं । लेकिन वह दबाव में नहीं आया तब अपने फैसले को रोकने का बचकाना रवैया दिखाने में भी पीछे नहीं रहते। अमेरिका का व्यापार घाटा कम करने के लिए उन्होंने तमाम देशों पर टैरिफ (आयात शुल्क) की दरें बढ़ा दीं। इनमें भारत और चीन प्रमुख है। इनसे ट्रम्प की नाराजगी का कारण रूस से कच्चा तेल खरीदना है। ट्रम्प का कहना है इसकी वजह से रूस को यूक्रेन के साथ लड़ाई लम्बी खींचने में सहायता मिलती है। टैरिफ की दरें 10 से बढ़ाकर 25 फीसदी तक की गईं। हालांकि चीन के प्रति ट्रम्प वैसी सख्ती नहीं दिखा सके क्योंकि उसके पास उन खनिजों का भंडार है जिनकी आपूर्ति रुक जाने से अमेरिका की अर्थव्यवस्था का भट्टा बैठ जाएगा। इसीलिए ज्योंही चीन ने उनका निर्यात रोकने की धमकी दी त्योंही ट्रम्प के तेवर ठंडे पड़ गए। गत माह उन्होंने भारत और चीन पर रूस से कच्चा तेल खरीदी जारी रखने के कारण 100 फीसदी टैरिफ लगाने सम्बन्धी निर्णय अमेरिकी संसद से पारित करवाकर दबाव बढ़ाने की चाल चली। इसके लिए 18 अक्टूबर तक की मोहलत भी दी। लेकिन न चीन झुका और न ही भारत। उल्टे अमेरिका में डीजल - पेट्रोल की कीमतों में जबरदस्त उछाल आने से जनता की नाराज़गी बढ़ने से ट्रम्प की चिंता बढ़ गई। उल्लेखनीय है 3 नवंबर को अमेरिका में मध्यावधि चुनाव होने वाले हैं। अमेरिकी कांग्रेस( संसद) के निचले सदन की सभी 435 सीटों और ऊपरी सदन सीनेट की 100 में से 35 सीटों पर चुनाव होना है। इसके अलावा, 36 राज्यों में गवर्नर पद के चुनाव और कई स्थानीय चुनाव भी निर्धारित हैं। इसे मध्यावधि चुनाव इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह राष्ट्रपति के चार साल के कार्यकाल के बीच में होता है। अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव चार साल में होता है, जबकि प्रतिनिधि सभा के सदस्यों का कार्यकाल दो साल का होता है। सीनेटर छह साल के लिए निर्वाचित होते हैं, इसलिए हर दो वर्ष में सीनेट की करीब एक-तिहाई सीटों पर चुनाव होता है। यद्यपि इन चुनाव परिणामों से ट्रम्प की गद्दी पर असर नहीं पड़ेगा किंतु  संसद में उनकी पार्टी को बहुमत न मिला तब उनके लिए अपनी नीतियों और निर्णयों को मंजूर करवाना कठिन होगा। इसीलिए वे डीजल - पेट्रोल की उछलती कीमतों से परेशान थे। ईरान से युद्ध के लिए अमेरिकी जनता ट्रम्प की  नीतियों को जिम्मेदार मान रही है। जनमत सर्वेक्षणों में उनकी लोकप्रियता भी लगातार घटती जा रही थी।  घरेलू मोर्चे पर हालत खराब होते देख ट्रम्प ने  बहुत बड़ी पलटी मारी जिससे रूसी तेल खरीदने को लेकर भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ का खतरा फिलहाल टल गया है। उन्होंने रूस से होने वाले ऊर्जा निर्यात से जुड़े प्रतिबंधों, पाबंदियों और शुल्कों को लागू करने से छूट दे दी है। यह कदम तब उठाया गया है जब ट्रम्प ने रूसी राष्ट्रपति पुतिन के साथ एक समझौता किया जिसके अनुसार  रूस शुरुआत में 300,000 टन से ज्यादा डीजल अमेरिका को बेचेगा और इसके बाद नवंबर और आने वाले महीनों में और खेप भेजी जाएंगी। ट्रम्प ने हालांकि 100 टैरिफ लगाने का अधिकार सुरक्षित रखा है लेकिन अमेरिका जिस प्रकार आर्थिक संकट में घिरता जा रहा है उसे देखते हुए ट्रम्प दोबारा इस दिशा में आगे बढ़ेंगे इसकी संभावना कम ही है। और यदि 3 नवम्बर को होने जा रहे चुनाव के नतीजे  विरुद्ध गए तब उनकी अकड़ में भी निश्चित तौर पर कमी आयेगी। सबसे बड़ी बात ये हुई कि उनके दबाव के आगे भारत ने जिस तरह झुकने से इंकार किया उसने उनके गणित को बिगाड़ दिया। जब भी रूस से कच्चे तेल खरीदने पर टैरिफ बढ़ाने की धमकी अमेरिका ने दी , भारत ने साफ कह दिया कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए किसी भी देश से खरीदी करता रहेगा। प. एशिया में संकट के कारण नये स्रोत तलाशने के बावजूद रूस से कच्चे तेल का आयात कम होने की बजाय बढ़ाकर भारत ने ट्रम्प की हेकड़ी निकाल दी। इसके अलावा ट्रेड डील के मामले में भी झुकने से मना कर दिया। ट्रम्प द्वारा 100 फीसदी टैरिफ का फैसला वापिस लेना भारतीय विदेश नीति की बड़ी सफलता है। इससे स्पष्ट हो गया कि दुनिया झुकती है झुकाने वाला चाहिए। 


- रवीन्द्र वाजपेयी