सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत न्यायाधीश संजय किशन कौल द्वारा लिखी गई पुस्तक विदाउट फ़ियर ऑर फ़ेवर , प्रकाशित होने के पहले ही चर्चा में आ गई। एक पत्रिका को दिये साक्षात्कार में उन्होंने उक्त पुस्तक में वर्णित एक घटना का उल्लेख करते हुए दावा किया कि सर्वोच्च न्यायालय के पिछले मुख्य न्यायाधीश डी. वाई चंद्रचूड़ सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए प्रस्तावित नामों पर औपचारिक चर्चा से पूर्व ही सरकार के साथ उन पर विचार-विमर्श करते थे। श्री कौल के मुताबिक उन्हें यह तरीक़ा पसंद नहीं था क्योंकि उसका मतलब न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए सरकार से पूर्व स्वीकृति लेने जैसा था। जस्टिस कौल की तक उक्त पुस्तक अभी बिक्री हेतु उपलब्ध नहीं हुई है। ऐसे में उसके इस अंश को सार्वजनिक करने का सीधा - सीधा उद्देश्य पुस्तक के बाजार में आने से पहले ही उसे विवादित बना देना है ताकि उसकी बिक्री बढ़े। पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल नरवणे की अप्रकाशित पुस्तक के कुछ अंशों को लेकर तो संसद तक में हंगामा हुआ जिससे सदन की कार्यवाही तक बाधित हुई। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने तो जनरल नरवणे की पुस्तक तक दिखाई जबकि वह छपकर ही नहीं आई थी। जनरल की चुप्पी ने भी पुस्तक को लेकर चले विवाद में रहस्य भी उत्पन्न कर दिया। हालांकि कुछ समय बाद उन्होंने श्री गाँधी द्वारा कही जा रही बातों को निराधार बताते हुए स्पष्ट किया कि उन्हें गलवान घाटी में चीनी सेना के मुकाबले के लिए केन्द्र सरकार की ओर से पूरी छूट मिली हुई थी। उसके बाद वह विवाद ठंडा पड़ गया। राहुल ने भी उसको भुला दिया।लेकिन जस्टिस कौल ने खुद ही साक्षात्कार देकर विवाद की शुरुआत कर दी। जब उनके द्वारा कालेजियम की बैठक से पहले सरकार से विमर्श किये जाने संबंधी खुलासे पर जस्टिस चंद्रचूड़ से प्रतिक्रिया मांगी गई तब उन्होंने दो टूक कहा कि उन्होंने चूंकि उक्त पुस्तक अभी तक पढ़ी ही नहीं इसलिए जस्टिस संजय कौल ने उक्त बात किस संदर्भ में कही है, उस पर अभी टिप्पणी करना मुश्किल है । इसके बावजूद मैं यह ज़रूर कहना चाहूंगा कि मुख्य न्यायाधीश के तौर पर मेरा कॉलेजियम की बैठकों का अनुभव बेहद अच्छा रहा और जस्टिस कौल के साथ भी कॉलेजियम के सदस्य के रूप में मेरा रिश्ता हमेशा बेहद सम्मानजनक रहा है।हमारे बीच सार्थक बातचीत हुई है, तर्कपूर्ण संवाद हुए हैं और कॉलेजियम की बैठकों में हम सौहार्दपूर्ण माहौल में साथ रहे हैं। जस्टिस कौल द्वारा एक पत्रिका को दिये साक्षात्कार में पुस्तक के उक्त अंश का उल्लेख किये जाने के बाद कांग्रेस ने भी सरकार पर हमलावर होते हुए कहा है कि मोदी सरकार के कार्यकाल में न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। पार्टी के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने आरोप लगाए कि केंद्र सरकार न्यायपालिका पर 'दबाव डाल रही है और उसे कमज़ोर कर रही है। लेकिन इस सबसे हटकर दो बातें हैं जो महत्वपूर्ण पदों पर विराजमान लोगों द्वारा सेवा निवृत होने के उपरांत लिखी गई पुस्तकों के संदर्भ में विचारणीय हैं। पहली ये कि पुस्तक प्रकाशित होने के पहले उसके कुछ अंशों को सार्वजनिक कर सनसनी फैलाना कहाँ तक उचित है क्योंकि उसमें जिन लोगों के बारे में लिखा गया वे अपनी प्रतिक्रिया बिना पुस्तक देखे नहीं दे पाते और उसके बाजार में आते - आते तक विवाद शांत पड़ चुका होता है । जनरल नरवणे की पुस्तक रक्षा मंत्रालय में अनापत्ति की प्रतीक्षा कर रही थी तब उसके कुछ हिस्से सार्वजनिक कैसे हुए ये जांच का विषय है। लेकिन सरकार को घेरने में विपक्ष ने आसमान सिर पर उठा लिया। जहाँ तक जस्टिस कौल की उक्त पुस्तक का सवाल है तो पद पर रहते हुए उन्होंने मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ के उन कार्यों का विधिवत विरोध क्यों नहीं किया जिनका पुस्तक में उल्लेख है। और यदि मौखिक विरोध किया भी तब उसका कोई प्रमाण उनके पास नहीं होने से उसका उल्लेख पुस्तक में किया जाना निरर्थक है। कालेजियम के भीतर की सारी प्रक्रिया लिपिबद्ध होती है जिस पर सभी उपस्थित न्यायाधीशों की सहमति होती है। जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा भी है कि जो प्रस्ताव तैयार होता है उस पर किसी ने असहमति दी हो ऐसा उन्हें याद नहीं। साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कालेजियम की बैठक का किसी सदस्य ने बायकाट किया हो ऐसा भी नहीं हुआ। ऐसे में लगता है जस्टिस कौल अपनी असहमति अनौपचारिक तौर पर व्यक्त करते रहे। और यदि ऐसा था तब फिर उसका पुस्तक में उल्लेख अनावश्यक ही माना जायेगा। यदि वे जस्टिस चंद्रचूड़ की कार्यप्रणाली से अपनी असहमति राष्ट्रपति को सूचित कर देते तब उनकी बात में वजनदारी होती।
- रवीन्द्र वाजपेयी