Tuesday, 15 September 2026

राजस्थान : सवर्णों की नाराजगी और युवाओं के गुस्से का लाभ नहीं उठा सकी कांग्रेस



राजस्थान के 309 नगरीय निकायों के जो चुनाव परिणाम गत दिवस घोषित हुए उनसे भाजपा को काफी राहत मिली होगी। वरना यूजीसी अधिनियम के बाद सवर्ण जातियों में पनपे गुस्से और उसके बाद  नीट पेपर लीक से युवाओं में बह रही असंतोष की लहर के कारण न सिर्फ विरोधी ही ये मान बैठे थे कि भाजपा का सूपड़ा साफ होना तय है अपितु भाजपा के भीतरखानों में भी निराशाजनक नतीजों की सुगबुगाहट साफ  महसूस हो रही थी। दरअसल 2023 में जब वसुंधरा राजे सहित पार्टी के अन्य दिग्गजों को किनारे धकेलते हुए भजनलाल शर्मा नामक पहली बार के विधायक को मुख्यमंत्री बनाया गया तभी से भाजपा के इस पुराने गढ़ में उसकी पकड़ कमजोर होने की आशंका व्यक्त की जाने लगी थी। श्री शर्मा की पार्टी संगठन में जरूर भूमिका रही किंतु सत्ता के समीकरणों में वे कहीं भी फिट नहीं हुए। पार्टी की गुटबाजी में भी उनका कोई स्थान नहीं रहा। ढाई साल के भीतर बतौर मुख्यमंत्री वे ऐसा कोई करिश्मा नहीं कर सके जिससे उनकी छवि एक लोकप्रिय या प्रभावशाली शासक के तौर पर स्थापित हो पाती। इस राज्य में ब्राह्मण आबादी काफी है और उसका बड़ा हिस्सा भाजपा का परंपरागत समर्थक भी रहा है। इसी जाति का मुख्यमंत्री बनवाकर पार्टी ने राष्ट्रीय स्तर पर सवर्णों को खुश करने का दाँव चला। मुख्यमंत्री के अलावा दो उपमुख्यमंत्री रखना भाजपा की घोषित रणनीति बन गई है जो राजस्थान के साथ ही छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में भी अपनाई गई। लेकिन इन तीनों में श्री शर्मा ही सबसे अनुभवहीन माने गए। इसीलिए नगरीय निकाय चुनावों को उनके राजनीतिक चातुर्य और प्रशासनिक दक्षता की परीक्षा माना जा रहा था। चूंकि 2023 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को मिली जोरदार सफलता महज कुछ महीनों बाद हुए लोकसभा चुनाव में दोहराई नहीं जा सकी इसलिए ये कयास लगने शुरू हो गए कि शर्मा जी शायद ही अपना कार्यकाल पूर्ण कर पाएंगे। और 2028 का विधानसभा चुनाव किसी और के चेहरे पर लड़ा जाएगा। राज्य में भाजपा के जो नेता मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नजर गड़ाये बैठे हैं वे भी नगरीय निकाय चुनावों में भाजपा के लचर प्रदर्शन का इंतजार कर रहे थे ।  लेकिन उनको निराशा हाथ लगी क्योंकि जो परिणाम आये उनको बहुत संतोषजनक तो नहीं कहा जा सकता परंतु वर्तमान राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों में किसी भी सत्तारूढ़ पार्टी के लिए ये संतोष प्रदान करने वाले हैं। विशेष रूप से इसलिए कि भाजपा के जो प्रतिबद्ध मतदाता उससे रुष्ट चल रहे थे उन्होंने कांग्रेस को समर्थन देने के बजाय निर्दलीयों के कंधे पर हाथ रख दिया। बड़ी संख्या में उनका जीतकर आना इसका संकेत है। अनेक निकायों में तो उनके हाथ ही सत्ता की कुंजी है । ये कहा जा रहा है कि ज्यादातर निर्दलीय भाजपा के असंतुष्ट होने से वे अंततः उसी के पाले में आ जाएंगे। वैसे जयपुर, भीलवाड़ा, कोटा और उदयपुर में भाजपा का महापौर बनना तय है। बीकानेर नगर निगम में कांग्रेस को स्पष्ट जीत मिली है। वहीं जोधपुर, भरतपुर, अजमेर और पाली का महापौर निर्दलीय तय करेंगे। अजमेर और पाली में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। चुनाव आयोग के अनुसार भाजपा राज्य में 4178 वार्डों में  तो कांग्रेस पार्टी ने 3612 वार्डों जीती। जबकि कुल 2273 निर्दलीय प्रत्याशी जीतने में सफल रहे। हालांकि कुछ नतीजों को भाजपा के लिए झटका भी कहा जा सकता है क्योंकि बीकानेर में वह पूरी तरह पिट गई वहीं जोधपुर, अजमेर जैसे महत्वपूर्ण शहरों में बहुमत से दूर रह गई। लेकिन उसके लिए खुशी मनाने वाली बात ये है कि कांग्रेस सत्ता विरोधी लहर उत्पन्न करने में नाकामयाब साबित हुई। सवर्णों की नाराजगी और युवाओं के गुस्से को अपने पक्ष में मोड़ने में कांग्रेस नेतृत्व असफल रहा जिसके कारण भाजपा से नाराज उसके परंपरागत मतदाताओं ने निर्दलीयों की लॉटरी खोल दी। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को राजस्थान के इन नतीजों ने चैन की सांस लेने का अवसर दे दिया जो म.प्र और बिहार के दो विधानसभा उपचुनाव परिणाम के बाद चिंता में डूबा था।  दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन के कारण भी भाजपा दबाव में थी जिसके नेता राजस्थान में भी दौरा करते रहे। रही बात कांग्रेस की तो अशोक गहलोत और सचिन पायलट की लड़ाई उसकी स्थायी मुसीबत बन गई है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


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