प. एशिया में दुश्मन का दुश्मन अपना दोस्त की कहावत चरितार्थ हो रही है। यू.ए.ई, कतर, जार्डन, मिस्र जैसे मुस्लिम देशों ने तो पहले से ही इसराइल से रिश्ते सुधारकर उसकी पिटाई से बचने का इंतजाम कर लिया किंतु इस्लामिक देशों के मुखिया सऊदी अरब और इसराइल में राजनयिक रिश्ते कायम नहीं हो सके। सऊदी अरब में इस्लाम का सबसे पवित्र स्थल मक्का होने से दुनिया भर के मुस्लिम हज करने आते हैं। अमेरिका ने सऊदी अरब और इसराइल को नजदीक लाने का प्रयास किया भी किंतु हमास द्वारा इसराइल में की गई हिंसक कार्रवाई से बात आगे नहीं बढ़ सकी। और फिर इसराइल की जो लड़ाई हमास तथा ईरान से चल रही थी उसमें अमेरिका भी कूद पड़ा। शुरुआत में लग रहा था कि ईरान कुछ दिनों में ही घुटने टेक देगा परंतु उसने युद्ध के दायरे को बढ़ाते हुए यू.ए.ई , कतर, ओमान जैसे पड़ोसी देशों पर तो हमले किये ही सऊदी अरब और जॉर्डन तक को लपेटे में ले लिया। सबसे ज्यादा नुकसान सऊदी अरब को हुआ जिसकी कई रिफ़ायनरी ईरान के हमलों में तबाह हो गईं। इसका असर उसके तेल निर्यात पर पड़ने से अर्थव्यवस्था खतरे में आ गई । ईरान द्वारा होर्मुज समुद्री जलमार्ग अवरुद्ध किये जाने से तेल उत्पादक अन्य देशों के सामने भी मुसीबत खड़ी हो गई । यद्यपि लड़ाई लंबी खिंचने से अमेरिका की मारक क्षमता में कमी आई है वहीं ईरान भी कुछ ठंडा पड़ा है। लेकिन एक नया मोर्चा यमन में सक्रिय इस्लामिक उग्रवादी संगठन हूती ने सऊदी अरब में खोल दिया। हमास को तो इसराइल ने काफी कमजोर कर दिया वहीं हिजबुल्ला की कमर भी तोड़कर रख दी परंतु हूती के लड़ाके अब समुद्री जहाजों का अपहरण करने से आगे बढ़कर सऊदी अरब पर हमलावर हैं। हमास और हिजबुल्ला की तरह ही हूती भी ईरान पालित आतंकवादी संगठन ही है जिसके पास ड्रोन और मिसाइल जैसे अत्याधुनिक अस्त्र - शस्त्र हैं। सऊदी अरब उसके हमलों से घबराहट में है। मक्का सुरक्षा संधि के अंतर्गत हाल ही में सऊदी अरब और पाकिस्तान इस बात पर रजामंद हुए थे कि दोनों पर किसी अन्य देश द्वारा किये गए हमले की स्थिति में दूसरा उसको सैन्य सहायता प्रदान करेगा। सऊदी अरब को उम्मीद थी हूती के हमलों का मुकाबला करने में पाकिस्तान उसकी मदद के लिए दौड़ा आयेगा। लेकिन उसने साफ इंकार कर दिया। सऊदी अरब ने मदद की गुहार अमेरिका से भी लगाई किंतु डोनाल्ड ट्रम्प ने भी ठेंगा दिखा दिया। उसके बाद मरता क्या न करता की तर्ज पर उसने हूती विद्रोहियों के बढ़ते खतरों से निपटने के लिए अमेरिकी सेंट्रल कमांड के माध्यम से इज़राइल से अप्रत्यक्ष रूप से खुफिया मदद मांगी है। असल में लाल सागर और बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य के पास हूती लड़ाकों की बढ़ती आक्रामकता से सऊदी अरब के तेल और नागरिक बुनियादी ढांचे को गंभीर खतरा पैदा हो गया है। स्मरणीय है सऊदी अरब के इसराइल से औपचारिक राजनयिक संबंध नहीं हैं और उसने इज़राइल को मान्यता भी नहीं दी । बावजूद इसके अमेरिकी मध्यस्थता से सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने हूतियों की सैन्य गतिविधियों और भावी योजनाओं का पता लगाने के लिए इज़राइल से खुफिया जानकारी देने का अनुरोध किया है। प.एशिया के समीकरणों में ये बहुत बड़ा बदलाव है। सऊदी अरब द्वारा पाकिस्तान रूपी इस्लामिक देश से धोख़ा खा जाने के बाद मुस्लिमों के ऐलानिया दुश्मन इजरायल पर भरोसा जताने से ये स्पष्ट हो गया है कि इस्लामिक देशों के मन में इसराइल विरोधी कट्टरता ढलान पर आने लगी है। दरअसल बीते कुछ दिनों में हूतियों द्वारा तेल और पंपिंग सुविधाओं को निशाना बनाये जाने से सऊदी अरब को अपनी मुख्य तेल पाइपलाइन का काम बंद करना पड़ा था। इसके अलावा हूती विद्रोहियों ने लाल सागर के किनारे द्वीपों पर कब्जा करना शुरू कर दिया और सऊदी जहाजों को रोककर उसकी आर्थिक नाकेबंदी कर दी है। सुना है कुछ अन्य मुस्लिम देश भी ईरान के हमलों से बचने के लिए इसराइल से गुप्त रूप से मदद मांगने की तैयारी में हैं क्योंकि उन्हें लग गया है कि पाकिस्तान का कोई भरोसा नहीं और अमेरिका हर सहायता की कीमत वसूलता है। यदि ऐसा हो गया तब इस्लामिक सहयोग संगठन (ओ. आई. सी) का अस्तित्व भी खतरे में पड़ जाएगा जिसमें 57 मुस्लिम देश शामिल हैं। वैसे भी सऊदी अरब और इसराइल में यदि नजदीकी बढ़ी तब मुस्लिम जगत का कई टुकड़ों में विभाजित होना तय जो इसराइल के विरोध में एकजुट रहा है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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