Saturday, 6 July 2024
ईरान में सुधारवादी राष्ट्रपति भारत के लिए शुभ संकेत
ब्रिटेन के साथ मुक्त व्यापार संधि करने पर जोर दिया जाए
गत दिवस ब्रिटेन के आम चुनाव में 14 साल बाद कंजरवेटिव पार्टी सत्ता से बाहर हो गई और लेबर पार्टी भारी बहुमत से सरकार बनाने जा रही है। इसके कूटनीतिक फलितार्थ तो भविष्य में देखने मिलेंगे किंतु भावनात्मक तौर पर भारतीय मूल के ऋषि सुनक चूँकि प्रधानमंत्री थे इसलिए भारत को ऐसा लगता था कि उनकी सरकार हमारे लिए हितकर रहेगी। यद्यपि इस दौरान दोनों देशों के रिश्ते तो काफी मधुर रहे किंतु प्रधानमंत्री रहते श्री सुनक ने ऐसा कुछ भी नहीं किया जिससे प्रतीत होता कि अपने पूर्वजों के देश के प्रति उनके मन में कुछ कर गुजरने का भाव हो। उल्लेखनीय है ब्रिटेन उनकी मातृभूमि है किंतु परिवार हिन्दू धर्म का पालन करता है। और तो और पत्नी अक्षता , भारत की प्रख्यात सॉफ्टवेयर कंपनी इंफोसिस के संस्थापक नारायण मूर्ति की बेटी हैं। उनकी माँ सुधा मूर्ति भी राज्यसभा में मनोनीत सांसद हैं। जी - 20 सम्मेलन में जब श्री सुनक और अक्षता दिल्ली आये तब वे अक्षरधाम मंदिर भी गए थे। उनकी पराजय से निश्चित तौर पर भारत को भावनात्मक तौर पर धक्का लगा किंतु नये प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर चूंकि कश्मीर विवाद को भारत - पाकिस्तान के बीच का मामला मानने की बात कह चुके हैं इसलिए उनकी जीत से दोनों देशों के रिश्ते और अच्छे होने की उम्मीद की जा सकती है। लेकिन चिंता की एक बात ये है कि इस चुनाव में भारतीय मूल के जो 28 सांसद जीते उनमें से 12 सिख हैं। 28 में अधिकांश कंजरवेटिव पार्टी के हैं। जो सिख सांसद जीतकर आये उनमें से कुछ खालिस्तानी मानसिकता के भी हैं । वे भारतीय हितों के विरुद्ध काम करने प्रधानमंत्री को बाध्य कर सकते हैं। लेकिन इसका दूसरा पक्ष ये है कि श्री स्टार्मर के पास चूँकि भारी बहुमत है इसलिए वे बिना दबाव में आये काम करते रहेंगे। सबसे बड़ा मसला है दोनों देशों के बीच मुक्त व्यापार संधि । सिद्धांत रूप में तो इस पर सहमति बन चुकी है किंतु कुछ न कुछ ऐसा होता रहा जिसके चलते उस पर हस्ताक्षर न हो सके। ब्रिटेन इन दिनों भारी आर्थिक संकट से गुजर रहा है। सुनक सरकार की करारी पराजय के पीछे भी यही वजह बना। जबकि प्रधानमंत्री बनने के पूर्व वे वित्त मंत्री रह चुके थे। कोरोना और उसके बाद यूक्रेन - रूस युद्ध शुरू होने से पूरा यूरोप चपेट में आ गया किंतु ब्रिटेन सर्वाधिक प्रभावित हुआ। ऐसे में भारत के साथ मुक्त व्यापार संधि उसके लिए भी फायदेमंद रहेगी। नये प्रधानमंत्री पर इसके लिए दबाव डालने के लिए भारतीय मूल के सांसदों और बड़े उद्योगपतियों को मध्यस्थ बनाने से बात बन सकती है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
Friday, 5 July 2024
अवैध कालोनियां बनवाने वाले नौकरशाहों और नेताओं पर भी लगाम कसी जाए
म.प्र के नगरीय विकास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने गत दिवस विधानसभा में स्पष्ट किया कि अवैध कालोनियों को वैध नहीं किया जाएगा । उल्टे उनको बसाने वालों के विरुद्ध कड़ी कानूनी कारवाई की जाएगी। दूसरी तरफ उन्होंने ये घोषणा भी कर दी कि सस्ते प्लाटों के लालच में जिन लोगों ने वहाँ मकान बनवा लिए हैं उनके नक्शे स्वीकृत कर अन्य आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराने का प्रबंध किया जाएगा। भविष्य में अवैध कालोनियों को बनने से रोकने के लिए कड़ा कानून बनाये जाने की बात भी मंत्री जी ने कही। वैसे ये समस्या राष्ट्रव्यापी है। महानगर तक इससे अछूते नहीं रहे। प्रश्न ये है कि अवैध कालोनी बिना स्थानीय निकाय के अमले की जानकारी के कैसे बन सकती है ? एक - दो घरों का निर्माण हो तो उसकी अनदेखी होना भी स्वीकार किया जा सकता है किंतु जहाँ दर्जनों मकानों का निर्माण हो रहा हो और संबंधित सरकारी विभाग को कानों कान खबर न हो इससे बड़ा असत्य कोई हो नहीं सकता। विधानसभा में ये बात भी उठी कि अवैध कालोनी में रहने वाले मतदाता चुनाव प्रचार हेतु आने वाले प्रत्याशियों को घेरकर वहाँ बिजली, पानी और सड़क की मांग करते हैं, लिहाजा उनको वैध घोषित किया जाए। श्री विजयवर्गीय का ये कहना तो उचित है कि अवैध कालोनी को वैध नहीं किया जाएगा किंतु जब उनमें बने मकानों के नक्शे स्वीकृत कर अन्य मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध करवा दी जाएंगी तब उन्हें वैध स्वरूप अपने आप हासिल हो जाएगा। इस बारे में नया कानून जब बनेगा तब की तब देखी जाएगी किंतु जिन इलाकों में अवैध कालोनियाँ बन चुकी हैं वहाँ स्थानीय निकायों के उन अधिकारियों और कर्मचारियों पर भी तो कारवाई होनी चाहिए जिनकी लापरवाही कहें या मिलीभगत से हर शहर और कस्बे में धड़ाधड़ गैर कानूनी कालोनियों बन गईं। ये भी गौरतलब है कि जनप्रतिनिधि मतों के लालच में अवैध कालोनियों में बिजली, सड़क और पानी का इंतजाम करवा देते हैं। यही हाल झुग्गी- झोपड़ियों का है जो कुकुरमुत्तों की तरह सरकारी भूमि पर फैलती जाती हैं किंतु शुरुआत में उन्हें रोकने के बजाय शासकीय अमला और नेता बिरादरी उन्हें संरक्षण प्रदान करती है। अनेक झुग्गियों को कोई माफिया बसाकर वहाँ रहने वालों से वसूली करता है। जो पार्षद, विधायक और सांसद इन बस्तियों में पक्की सड़कें, बिजली के खम्बे और पेय जल की व्यवस्था करते हैं उनसे भी पूछा जाना चाहिए कि ये जानते हुए कि संबंधित बस्ती सरकारी भूमि पर अवैध कब्जा कर बसाई गई , उन्होंने वहाँ विकास कार्य क्यों करवाए? ये वोट बैंक का ही खेल है कि जब ऐसी बस्ती को अतिक्रमण विरोधी अभियान के अंतर्गत हटाने का प्रयास होता है तब नेताओं की फौज गरीबों की हितैषी बनकर आ जाती है । और जब इन्हें हटाया जाता है तब उसके वॅाशिंदों को गरीबी का हवाला देकर वैकल्पिक स्थान या मकान देने की व्यवस्था की जाती है। यही स्थिति अवैध मानी जाने वाली कालोनियों की है। उनमें बने मकानों का निर्माण बिना नक्शा स्वीकृत करवाए किये जाने के बाद भी मानवीयता के आधार पर तोड़े जाने से परहेज किया जाता है । चूँकि उनके निवासी मतदाता हैं इसलिए उनको सभी सुविधाएं दिलवाना नेताओं के राजनीतिक स्वार्थों से जुड़ा होता है। कुल मिलाकर ये पूरा मामला नौकरशाही और नेताओं के अपवित्र गठजोड़ से जुड़ा हुआ है। श्री विजयवर्गीय पहले भी इस विभाग के मंत्री रह चुके हैं। उसके अलावा इंदौर के महापौर का दायित्व भी वे संभाल चुके हैं। इसलिए उन्हें समस्या का मूल कारण पता होगा। बेहतर हो वे अपने घर अर्थात नगरीय निकायों के उस अमले को कठघरे में खड़ा करते हुए दंडित करें जिसके कार्यक्षेत्र में अवैध कालोनी अथवा अवैध बस्तियाँ बेरोकटोक आबाद होती चली गईं। इसी के साथ ही उन जनप्रतिनिधियों से भी ये पूछताछ की जानी चाहिए कि उन्होंने गैरकानूनी आवासीय क्षेत्र में विकास कार्य क्यों करवाया? मंत्री महोदय यदि कानून बनाने से पहले कारवाई की शुरुआत उन नौकरशाह और नेताओं से करें जो अवैध कालोनियों और झोपड़पट्टी को बसाने के सूत्रधार हैं तो उससे सरकार की ईमानदारी प्रमाणित होने के साथ उस भूमाफिया पर भी शिकंजा कस सकेगा जो अफसरों और राजनेताओं के संरक्षण में बेखौफ अवैध निर्माण करवाता है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
Thursday, 4 July 2024
म.प्र का बजट : मौजूदा परिस्थितियों में इससे ज्यादा करना संभव नहीं था
म.प्र की मोहन यादव सरकार का पहला बजट गत दिवस पेश हुआ। चूँकि सरकार ने कोई नया करारोपण नहीं किया इसलिए आम जनता की नजर में वह अच्छा है। हालांकि बजट में लोक लुभावन घोषणाओं से भी परहेज किया गया है। यहाँ तक कि पिछली शिवराज सरकार द्वारा प्रारंभ की गई लाड़ली बहना योजना की मौजूदा राशि 1250 रु. प्रतिमाह को भी यथावत रखा गया है जबकि 1000 रु. से शुरू की गई इस योजना में शिवराज सरकार ने 250 रु. बढ़ा दिये थे और इसे 3 हजार तक ले जाने का वायदा किया था। विधानसभा चुनाव में भाजपा की जबरदस्त जीत में यही योजना तुरुप का पत्ता साबित हुई थी। हालांकि शिवराज यदि प्रदेश की सत्ता में वापस आते तब शायद वे बजट में इस योजना की राशि में उत्तरोत्तर वृद्धि का प्रावधान अवश्य करते किंतु मोहन यादव के सामने खजाने के खाली होने की भी समस्या है। इसीलिए उन्होंने लोक लुभावन घोषणाओं और कार्यक्रमों से परहेज किया। फिलहाल चुनाव रूपी कोई चुनौती भी सामने नहीं है। वित्त मंत्री जगदीश देवड़ा ने बजट में अधो संरचना, महिलाओं और आदिवासियों पर काफी ध्यान दिया गया है। तीन नये मेडिकल कालेज खोलने का प्रावधान भी किया गया है। इसी तरह बड़े शहरों में ई बसें चलाने की योजना भी घोषित की गई है। धार्मिक पर्यटन पर भी मोहन सरकार शुरू से काफी जोर दे रही है। इसके लाभ भी मिलने लगे हैं। उज्जैन में महाकाल लोक और ओंकारेश्वर में आद्य शंकराचार्य की विशाल प्रतिमा खड़ी हो जाने के बाद इन स्थानों पर पर्यटकों की रिकार्ड संख्या आने लगी है। इसीलिए नर्मदा पथ के निर्माण को भी प्राथमिकता सूची में रखा गया है। प्रदेश में संरक्षित वन भी बहुत हैं जो बड़ी संख्या में देशी - विदेशी वन्य प्रेमी सैलानियों को आकर्षित करते हैं। शेरों के मामले में तो म.प्र सबसे अग्रणी है। 2014 के बाद से पूरे देश में राजमार्गों का जो विकास हुआ उससे म.प्र को जबरदस्त लाभ हुआ क्योंकि हृदय प्रदेश होने से सभी दिशाओं को जोड़ने वाले राजमार्गों का कुछ हिस्सा प्रदेश से होकर गुजरता है। इससे सड़क परिवहन में भी काफी वृद्धि हुई है। वहीं प्रदेश में हवाई सेवाओं का जिस तरह विस्तार हुआ वह विकास को प्रमाणित करता है। यद्यपि उद्योगों को लेकर अभी भी बहुत कुछ करना शेष है किंतु ये कहना गलत नहीं होगा कि प्रदेश में औद्योगिक विकास के लिए अनुकूल परिस्थितियां मौजूद हैं। बीते वर्षों में हुए निवेशक सम्मेलनों से अच्छा प्रतिसाद मिला। यदि सरकार नियोजित ढंग से प्रयास करे तो आने वाले वर्षो में औद्योगिक दृष्टि से प्रदेश विकसित राज्य की श्रेणी में आ खड़ा होगा। म.प्र को बीमारू राज्य की शर्मनाक स्थिति से निकालने में कृषि क्षेत्र ने भी शानदार योगदान दिया है। गेंहूँ की पैदावार में तो प्रदेश पंजाब और हरियाणा से आगे आ चुका है। वन संपदा प्रदेश की बड़ी दौलत है जिसकी वजह से यहाँ का पर्यावरण संतुलन बना हुआ है। नर्मदा जैसी सदानीरा नदी यहाँ की जीवन रेखा है। लोक लुभावन घोषणाओं से बचने के बावजूद शवों को घर पहुंचाने के लिए वाहन व्यवस्था इस बजट के मानवीय पक्ष को उजागर करती है। शिक्षकों और पुलिस में भर्ती की घोषणा भी बेरोजगारों के चेहरे पर मुस्कान लाने का काम करेगी। किसानों को शून्य ब्याज दर पर ऋण अच्छी सोच का परिचायक है। प्रदेश में चिकित्सकों की संख्या बढ़ाने के लिए 3 नये मेडिकल कालेज खोलने का फैसला स्वागत योग्य है किंतु इनमें पढ़ाने के लिए योग्य शिक्षकों की कमी कैसे दूर होगी ये बड़ा सवाल है। राज्य सरकार को ये तो पता ही होगा कि जो मेडिकल कालेज पहले से चले आ रहे हैं जब वे ही बीमार हों तब नये खोलने का क्या औचित्य है? लड़कियों की शिक्षा हेतु सरकार काफी कोशिशें कर रही है किंतु निजी क्षेत्र की तुलना में शासकीय शिक्षण संस्थानों की दशा बेहद खराब हैं। मोहन सरकार की कार्ययोजनाओं के लिए चूँकि काफी आर्थिक संसाधन चाहिए इसलिए उनमें से बहुत सी बजट का हिस्सा नहीं बन सकीं। विधानसभा चुनाव के पहले पिछली सरकार ने जो दरियादिली दिखाई उसके कारण मौजूदा मुख्यमंत्री के हाथ काफी बंधे हुए थे जिसका असर बजट पर दिख रहा है। लोकसभा चुनाव बीच में आने से संसाधनों का समुचित प्रबंध भी नहीं हो सका। ये देखते हुए श्री देवड़ा ने जो बजट पेश किया वह प्रशंसनीय है। अगले साल जो बजट आयेगा उसमें इस सरकार का आर्थिक दर्शन और स्पष्ट होगा ये उम्मीद की जा सकती है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
Wednesday, 3 July 2024
सत्संग में मौत : आस्था के अतिरेक का दुष्परिणाम
पश्चिमी उ.प्र के हाथरस जिले के एक गाँव में किसी बाबा के सत्संग में हजारों लोग जमा थे । कार्यक्रम के बाद जब बाबा जाने लगे तब उनके चरण छूने श्रद्धालुओं में होड़ मची। बाबा के निजी सेवादारों ने श्रद्धालुओं को रोकने धक्का - मुक्की शुरू कर दी। बाबा तो किसी तरह वहाँ से निकल लिए किंतु 122 लोग कुचलकर मारे गए। बड़ी संख्या घायलों की भी है। घटनास्थल से आये चित्र दिल दहला देने वाले हैं। इतने बड़े आयोजन हेतु पुलिस की जो अनुमति ली गई उसमें लोगों के आने की अनुमानित संख्या वाला स्थान रिक्त छोड़ दिया गया। बताया जाता है हजारों की भीड़ के लिए मात्र 50 पुलिस वाले तैनात किये गए थे। सत्संग में आने वालों की अनुमानित संख्या आयोजकों द्वारा छिपाई गई या उन्हें खुद अंदाज नहीं था , ये जाँच का विषय है। पुलिस ने गैर इरादतन ह्त्या का प्रकरण दर्ज कर लिया जो स्वाभाविक है। इस हादसे में गलती किसकी थी ये फ़िलहाल कहना मुश्किल है। बाबा जी तो ये कहकर बच जायेंगे कि सत्संग तो शांति पूर्वक संपन्न हो गया था जो कुछ घटा वह उनके वहाँ से जाते समय हुआ। लेकिन 100 से ज्यादा श्रद्धालुओं की मौत जिन हालातों में हुई वह इसलिए चिंता का विषय है क्योंकि धार्मिक आयोजनों या किसी देवस्थान के दर्शनों हेतु उमड़ने वाली भीड़ के कारण इस तरह की जानलेवा घटनाएं पहले भी हो चुकी हैं। उनकी जाँच करने के बाद भविष्य में ऐसा न हो इसकी कार्य योजना भी बनी किंतु सभी जगह एक जैसा इंतजाम संभव नहीं है। ऐसे में ये स्थानीय प्रशासन का दायित्व है कि कार्यक्रम की अनुमति देने के पहले सभी सावधानियां बरते। इस हादसे के बारे में जो जानकारी आई उससे स्पष्ट है कि पुलिस का प्रबंध भीड़ को देखते हुए बहुत कम था। खुफिया विभाग भी अपनी जिम्मेदारी से चूक गया। लेकिन असली दोषी तो इस तरह का आयोजन में आने वाले बाबा हैं जो श्रद्धा का व्यवसायीकरण करते हैं। देश में अनेक प्रवचन करने वाले महानुभाव हैं जो फिल्मी सितारों जैसे नखरे दिखाते हैं। उनका रहन - सहन रईसी होता है। महँगी गाड़ियों में चलना उनका शौक है। राजनेता इनके आयोजनों में हाजिरी देकर इनका भाव बढ़ा देते हैं। इस वजह से इन पर भी नेतागिरी का भूत सवार हो जाता है। विवादास्पद बयान देकर सुर्खियां बटोरने का शौक भी ये पाल लेते हैं जिसके कारण फजीहत भी झेलनी पड़ जाती है। ताजा उदाहरण म.प्र के एक नामी कथा वाचक का है जिन्हें हाल ही में नाक रगड़कर माफी मांगनी पड़ी। हालांकि सारे बाबा या कथावाचक एक जैसे हैं ये कहना तो अन्याय होगा किंतु जिस तरह अर्थशास्त्र में कहावत है कि खराब मुद्रा अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है , वैसे ही कुकुरमुत्तों जैसे बढ़ते जा रहे कतिपय बाबाओं ने आध्यात्मिक जगत में प्रदूषण फैला दिया है। हालांकि जनता भी कम कसूरवार नहीं है जो इनकी अंधभक्त हो जाती है। हाथरस की घटना भी इसी का नतीजा है। बाबा की चरण रज प्राप्त करने के लिए हुई धक्का - मुक्की में 122 लोग अपने प्राण गँवा बैठे। पुलिस द्वारा दर्ज प्रकरण में बाबा का नाम नहीं है लेकिन घटना के बाद उनका गायब हो जाना संवेदनहीनता नहीं तो और क्या है? आस्था के अतिरेक और पेशेवर बाबाओं की बढ़ती जमात के चलते इस तरह की दुर्घटनाओं को रोकना कठिन होता जा रहा है। धार्मिक आयोजनों की भव्यता के कारण इनका आकर्षण बढ़ता जा रहा है। राजनेता भी बाबाओं का उपयोग अपना जनाधार बढ़ाने में करने लगे हैं । इसके चलते चुनाव के मौसम में प्रवचनों के बड़े - बड़े आयोजन होते हैं। राजनेताओं से निकटता की वजह से अनेक बाबाओं को प्रशासन और पुलिस विशेष महत्व देती है। इस तरह के बाबा ट्रांसफर और पोस्टिंग जैसे कार्य नेताओं से करवाने के कारण काफी प्रभावशाली हो जाते हैं। यही वजह है कि इन पर कोई रोक - टोक नहीं रहती। लेकिन हाथरस हादसा बहुत बड़ी त्रासदी है। कुम्भ जैसे विराट आयोजन तक में इतनी बड़ी दुर्घटना हाल के वर्षों में सुनने नहीं मिली। इसके पीछे किसकी गलती थी ये पता लगाने के लिए ईमानदारी से जाँच करवाई जाना जरूरी है ताकि इसकी पुनरावृत्ति रोकी जा सके।
- रवीन्द्र वाजपेयी
Tuesday, 2 July 2024
मुस्लिमों की खुशामद में करोड़ों हिंदुओं को आहत कर गए राहुल
Monday, 1 July 2024
प्रकृति को दुख देने से बड़ा पाप और होगा
उत्तराखंड के प्रसिद्ध तीर्थस्थल केदारनाथ के पास विगत दिवस जोरदार हिम स्खलन हुआ। यद्यपि 2013 में आये जल प्रलय जैसी जनहानि तो नहीं हुई किंतु प्रकृति ने एक बार फिर चेतावनी दी है। संयोगवश इसी समय हरिद्वार में एक सूखी पड़ी नदी में अचानक जल सैलाब आया। वहाँ आने वाले पर्यटक उस सूखी पड़ी नदी का उपयोग पार्किंग के लिए करते हैं। इसलिए जब पहाड़ों से अचानक जलधारा उतरी तब वहाँ खड़ी कारें और बसें पास ही बहने वाली गंगा नदी में उतराने लगीं। इसके दृश्य दिल दहला देने वाले थे। उत्तराखण्ड के समूचे पर्वतीय क्षेत्र में हिमस्खलन और भूस्खलन आम बात हो चली है। गर्मियों की शुरुआत होते ही चार धाम की यात्रा प्रारंभ हो जाती है। इनमें शामिल होने वाले तीर्थयात्री साल दर साल बढ़ते जा रहे हैं। बढ़िया सड़कें और ठहरने की बेहतर व्यवस्थाओं ने तीर्थ यात्रा को धार्मिक पर्यटन में तब्दील कर दिया है। प्रतिदिन हजारों धुंआ छोड़ते वाहनों की वजह से पर्यावरण पर बुरा असर पड़ने लगा है। इस सबके कारण ऊंचाई वाली जगहों का तापमान भी बढ़ने लगा है। हिमस्खलन का मुख्य कारण तापमान में वृद्धि को ही माना जाता है। हिमालय पर्वत माला की भूसंरचना जिस प्रकार की है उसमें बढ़ते मानवीय हस्तक्षेप को बर्दाश्त करने की सीमित क्षमता है। गढ़वाल के इलाके को देव भूमि कहने के पीछे उद्देश्य यही था कि इस क्षेत्र की पवित्रता और शांति को सुरक्षित रखा जावे । जब चार धाम की यात्रा पैदल हुआ करती थी तब पर्यावरण के लिए इतना खतरा नहीं था। तीर्थ यात्रियों की संख्या भी कम थी। वाहनों के शोर और धुएं के अलावा हेलीकाप्टर की गड़गड़ाहट से भी वातावरण मुक्त था। होटल और गेस्ट हाउस रूपी कांक्रीट के ढांचे भी नहीं थे। सच कहें तो बहुत कुछ वैसा था जैसा ईश्वर ने हमें दिया किंतु बीते कुछ दशकों में समूचे पर्वतीय क्षेत्रों में मानवीय गतिविधियां जिस तेजी से बढ़ीं और पर्यटन ने उद्योग की शक्ल अख्तियार की उसका दुष्परिणाम रुक -रुककर देखने मिलता रहता है। इस साल चार धाम की यात्रा शुरू होते ही केदारनाथ, बद्रीनाथ, यमुनोत्री और गंगोत्री के रास्ते पर वाहनों की लंबी - लंबी कतारें लगने से जाम की स्थिति उत्पन्न हो गई। 30 - 40 कि.मी तक सड़क पर चलने की जगह नहीं थी। कुछ दिनों तक प्रशासनिक व्यवस्था पूरी तरह अस्त व्यस्त होकर रह गई। ऐसे ही दृश्य शिमला और मनाली में देखने मिले। ऐसे में यदि पहाड़ अपना धैर्य खो रहे हैं तो दोष उनका नहीं हमारा है जो अपने शौक और श्रद्धा के लिए उनकी छाती रौंदते हैं। तीर्थ यात्रा के पैकेज वाले विज्ञापन अखबारों में छाए रहते हैं। कश्मीर घाटी में स्थित अमरनाथ गुफा के दर्शन भी प्रारंभ हो चुके हैं। उस स्थान की यात्रा करने वाले भी लाखों की संख्या में होते हैं। परिणाम स्वरूप यात्रा शुरू होने के कुछ दिन बाद ही बर्फ से बनने वाला प्राकृतिक शिव लिंग पिघल जाता है जिसकी वजह मानवीय उपस्थिति से बढ़ने वाला तापमान ही होता है। अमरनाथ हेतु भी हेलीकाप्टर सेवा भी उपलब्ध है जिसे उस स्थान की शांति नष्ट करने के लिए भी जिम्मेदार माना जाता है। कुल मिलाकर पर्वतीय क्षेत्र के तीर्थ स्थल हों या हिल स्टेशन, सभी में मानवीय आवाजाही बढ़ने से स्थितियाँ बद से बदतर होती जा रही हैं किंतु न समाज चेत रहा है और न ही सरकार। बाजारवादी व्यवस्था के बढ़ते प्रभाव ने तीर्थ यात्रा और आमोद - प्रमोद हेतु किये जाने पर्यटन में अंतर खत्म कर दिया है। समय आ गया है जब इस दिशा में गंभीरता से विचार करते हुए सार्थक कदम उठाये जाएं। अन्यथा केदारनाथ जैसे हादसे जल्दी - जल्दी होने लगेंगे और पहाड़ों से आने वाले जल सैलाब प्रलय का पूर्वाभास करवाते रहेंगे। भारत में प्रकृति संरक्षण के संस्कार बाल्य काल से ही दे दिये जाते हैं। दूब से लेकर वट वृक्ष और कंकड़ से लेकर पर्वत तक सब पूज्य हैं। हर नदी, तालाब और कुए को गंगा का प्रतीक माना जाता है। लेकिन आस्था के अतिरेक में भारतीय संस्कृति के मौलिक सिद्धांतों और जीवन शैली को उपेक्षित किये जाने से ही पर्यावरण का संकट उत्पन्न होने लगा है। तमाम नदियाँ सूखने के कगार पर हैं या उनमें गंदगी का अंबार है। पहाड़ों का प्राकृतिक सौंदर्य दिन ब दिन घट रहा है। इस स्थिति को बदलने के लिए समन्वित प्रयास जरूरी हैं। कोरोना काल में लगाए गए लाॅक डाउन के दौरान नदियाँ, जंगल और पहाड़ सभी ने राहत की सांस ली थी किंतु जैसे ही हालात सामान्य हुए सब कुछ पहले जैसा हो गया। इससे साबित हो गया कि प्रकृति प्रदत्त सभी धरोहरों के स्वरूप को विकृत करने के दोषी हम ही हैं । जिस प्रकृति की गोद में जाकर हम सुख - शांति का अनुभव करते हैं उसे दुख देने से बड़ा पाप और क्या होगा?
- रवीन्द्र वाजपेयी