Monday, 15 July 2024

दलबदल के विरुद्ध जनादेश : भाजपा के लिए प. बंगाल कठिन चुनौती

बीते शनिवार विभिन्न राज्यों में विधानसभा के 13 उपचुनावों के परिणाम घोषित हुए। इनमें तृणमूल और कांग्रेस को चार - चार, भाजपा को दो, द्रमुक और आम आदमी पार्टी को एक - एक तथा एक सीट  निर्दलीय को मिली। ये परिणाम इसलिये महत्वपूर्ण हैं क्योंकि लोकसभा चुनाव संपन्न हुए सवा महीना ही बीता। हालांकि उपचुनाव स्थानीय मुद्दों और प्रत्याशी की छवि पर केन्द्रित होते हैं। इसीलिए उनका राष्ट्रीय राजनीति पर बहुत असर नहीं होता। राष्ट्रीय नेता भी आम तौर पर इनमें प्रचार करने नहीं जाते। लेकिन राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी के मुख्यमंत्री पर पार्टी प्रत्याशी को जिताने की जिम्मेदारी होती है। उस लिहाज से देखें तो ममता बैनर्जी सबसे सफल रहीं जिन्होंने चारों उपचुनाव भारी बहुमत से जितवा दिये। उनमें से तीन सीटों पर 2021 में भाजपा जीती थी। इसी तरह हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस ने तीन में से दो उपचुनाव जीतकर लोकसभा चुनाव में हुए सफाये से उबरने में कामयाबी हासिल की जबकि एक सीट भाजपा ने जीती। इससे ये साफ हो गया कि यहाँ की जनता केंद्र में भाजपा को जी खोलकर समर्थन देती है किंतु राज्य  स्तर पर वह उससे खुश नहीं है। पड़ोसी राज्य पंजाब में आम आदमी पार्टी ने जालंधर वेस्ट सीट धमाकेदार अंदाज में जीत ली। इसमें भाजपा दूसरे स्थान पर रही जो उसके भविष्य के लिए शुभ संकेत कहा जा सकता है।  इस उपचुनाव ने राज्य के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान की पकड़ साबित कर दी। लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस अलग - अलग लड़े थे । इसका लाभ कांग्रेस को मिला जो 11 में से 7 सीटें जीत गई जबकि आम आदमी पार्टी को महज 3 मिल सकीं । लोकसभा चुनाव के बाद आम आदमी पार्टी ने इंडिया गठबंधन से किनारा कर लिया। जालंधर में भी कांग्रेस मैदान में थी। मुख्यमंत्री श्री मान ने अरविंद केजरीवाल के जेल में रहते ये उपचुनाव जीतकर अपनी वजनदारी दिखा दी। बिहार में हुए अकेले उपचुनाव में बाजी निर्दलीय ने मारी। इससे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को धक्का लगा। हालांकि तेजस्वी की पार्टी राजद के हाथ भी निराशा लगी। भाजपा को म.प्र के एक उपचुनाव में जबरदस्त सफलता मिली। छिंदवाड़ा जिले की अमरवाड़ा सीट के कांग्रेस विधायक इस्तीफा देकर  भाजपाई बन गए थे। 2023 में कांग्रेस ने कमलनाथ के इस गढ़ की सभी 8 विधानसभा सीटें जीत लीं थीं। लोकसभा में अपने बेटे की बड़ी हार के बाद इस सीट पर कांग्रेस की शिकस्त  से श्री नाथ की राजनीति के अंत की शुरुआत हो चुकी है। वहीं मुख्यमंत्री मोहन यादव काफी मजबूत हुए जिनके राज में भाजपा को  सभी 29 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल हुई थी। इस तरह भाजपा का यह किला अभेद्य बना रहा किंतु उत्तराखंड में उसे शर्मनाक स्थिति का सामना करना पड़ा जहाँ की दोनों सीटें उसके हाथ से निकल गई। हालांकि 2021 में भी वे उसको  नहीं मिलीं थीं । बद्रीनाथ में जीते कांग्रेस  विधायक को उसने तोड़ा किंतु उसे उपचुनाव नहीं जिता सकी वहीं मंगलौर की सीट बसपा विधायक के निधन से रिक्त हुई जिसे कांग्रेस के मुस्लिम उम्मीदवार ने मामूली अंतर से जीतकर भाजपा को निराश किया। इस बार बसपा यहाँ तीसरे स्थान पर रही। जहाँ तक बात तमिलनाडु के एक उपचुनाव की है तो वहाँ सत्तारूढ़ द्रमुक की जीत पर किसी को हैरानी नहीं हुई। इन परिणामों को इंडिया गठबंधन की जीत के तौर पर प्रचारित किया गया। लेकिन ये उपचुनाव पूरी तरह स्थानीय स्तर पर लड़े गए । प. बंगाल की रायगंज और बागदा में कांग्रेस तथा राणाघाट दक्षिण और मानिकतला में सीपीएम मैदान में थी। ये दोनों विपक्षी गठबंधन में होने के बावजूद तृणमूल के विरुद्ध लोकसभा चुनाव भी लड़ी थीं। सही मायनों में इन उपचुनावों ने मुख्यमंत्रियों की ताकत स्पष्ट साबित की।  भाजपा के लिए चिंता का विषय एक तो उत्तराखण्ड की दोनों  सीटों पर मिली हार है वहीं बिहार में जनता दल (यू) प्रत्याशी का हारना एनडीए के लिए धक्का है। दूसरी बात ये कि जनता ने दलबदलुओं को हराकर राजनीतिक दलों को संकेत दे दिया है। विशेष रूप से भाजपा को अपनी रणनीति बदलनी होगी वरना उसकी असफलताओं का सिलसिला यूँ ही जारी रह सकता है। उसके लिए प. बंगाल बड़ी चुनौती बनता जा रहा है । वहाँ तृणमूल में घुस आये असमाजिक तत्व सत्ता के संरक्षण  सरकार विरोधी मतदाताओं को आतंकित करने में जुटे हुए हैं। हिंसा की राजनीति में तृणमूल ने वामपंथी सरकार को भी पीछे छोड़ दिया है। भाजपा चुनाव के बाद अपने समर्थकों की हिफाजत नहीं कर  पाती तो उसकी स्थिति राज्य में एक कदम आगे दो कदम पीछे की होकर रह जायेगी। वैसे राष्ट्रीय राजनीति की दृष्टि से असली मुकाबला उ.प्र में होने वाले 10 विधानसभा उपचुनावों में होगा जहाँ मजबूत मुख्यमंत्री होने के बाद भी भाजपा लोकसभा चुनाव में कांग्रेस - सपा गठबंधन के आगे कमजोर पड़ गई थी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 13 July 2024

गुजारा भत्ते पर विपक्ष की ठंडी प्रतिक्रिया से मुस्लिम समाज में हैरानी


सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तलाकशुदा महिलाओं को गुजारा भत्ता देने के प्रावधान में मुस्लिम महिलाओं को शामिल किये जाने सम्बन्धी फैसले के बाद मुस्लिम संगठनों में हलचल तेज हो गई है। उच्चस्तरीय बैठकों में इस बात पर ऐतराज जताया गया कि शाहबानो प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये फैसले को 1986 में संसद द्वारा रद्द कर दिये जाने के बाद तलाक़शुदा मुस्लिम महिलाओं  को गुजारा भत्ता दिये जाने का मसला हमेशा के लिए समाप्त हो गया था। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय के  ताजे फैसले में गुजारा भत्ते की  प्रचलित व्यवस्था को तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं पर भी लागू होने की जो बात कही गई है उसकी वजह से 1986 में संसद द्वारा जिस कानून पर मोहर लगाई थी वह  बेअसर हो जाता है। इसीलिए मुस्लिम उलेमाओं सहित पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्यों ने ताजा फैसले को चुनौती देने पर विचार किया। हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने भी इस फैसले पर नाराजगी दिखाई। लेकिन इस मामले में जैसी  राजनीतिक प्रतिक्रियाएं मुस्लिम समुदाय द्वारा अपेक्षित थीं वैसी नहीं आने से उसमें चिंता है। जनता दल (यू) महासचिव के. सी. त्यागी ने सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को मुस्लिम महिलाओं के पक्ष में बताकर कट्टरपंथियों को बड़ा झटका दे दिया। चूंकि सीआरपीसी की धारा 125 इस बारे में बिल्कुल स्पष्ट है और उसमें धार्मिक आधार पर कोई भेदभाव नहीं है , लिहाजा सर्वोच्च न्यायालय ने अपने ताजा फैसले में साफ कहा कि तलाक़शुदा महिला को चाहे किसी धर्म की हो उसे अपने पूर्व पति से भरण पोषण के लिए राशि मांगने का कानूनी अधिकार है। यहाँ तक तो ठीक था किंतु 2024 के लोकसभा चुनाव  में मुसलमानों का एकमुश्त समर्थन हासिल करने वाले विपक्षी दलों विशेष रूप से कांग्रेस ने इस फैसले पर टिप्पणी करने से जिस प्रकार अपने को दूर रखा वह चौंकाने वाला है। लोकसभा चुनाव में मुसलमानों के पर्सनल लॉ को सुरक्षित रखने का आश्वासन देने वाले लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी की खामोशी तो चौंकाने वाली है। अखिलेश यादव ,लालू प्रसाद और ममता बैनर्जी की चुप्पी से भी मुस्लिम समाज स्तब्ध है। उसे डर है कि मोदी सरकार सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को नजीर बनाकर  पर्सनल लॉ के कुछ अन्य प्रावधानों में भी प्रचलित कानूनों के मुताबिक दखलंदाजी कर सकती है। सही बात तो ये है कि लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस अब मुस्लिम तुष्टीकरण के आरोप से मुक्त होना चाहती है। उसके साथ इंडिया गठबंधन के अन्य दलों ने भी इस मुद्दे पर मुस्लिम समुदाय के समर्थन से  जिस तरह हाथ खींचे उससे वह हतप्रभ है। राजनीतिक गलियारों में व्याप्त चर्चाओं के अनुसार श्री गाँधी की रणनीति हिंदुओं पर भाजपा की पकड़ को कम करना है। उनका ध्यान मुख्य रूप से राजस्थान, गुजरात, म.प्र , हिमाचल , उत्तराखंड और कर्नाटक जैसे राज्यों पर है जहाँ उनकी भाजपा से सीधी टक्कर है। लोकसभा चुनाव में भाजपा उक्त राज्यों के बल पर ही सबसे बड़ी पार्टी बन सकी। इन राज्यों की कुछ सीटों को छोड़कर मुस्लिम मतदाता उतने निर्णायक नहीं हैं। राहुल ये समझ चुके हैं कि उ.प्र और बिहार में वे कितने भी हाथ पाँव मारें किंतु जो सफलता मिलेगी वह अखिलेश और तेजस्वी के खाते में जायेगी। उनको ये भी लगने लगा है कि मुसलमान किसी भी स्थिति में भाजपा की तरफ नहीं झुकेंगे। इसलिए अब वे नर्म हिंदुत्व की नीति अपना रहे हैं। इसमें उन्हें कितनी सफलता मिलेगी ये आगामी कुछ महीनों में होने वाले कुछ विधानसभा चुनावों में स्पष्ट हो जायेगा। गुजारा भत्ते संबंधी सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर इंडिया गठबंधन के घटक दलों की खामोशी को लेकर ओवैसी मुस्लिम संगठनों के नेताओं को ये उलाहना दे रहे हैं कि उन्होंने मुस्लिम समाज का अपना नेतृत्व विकसित करने का अवसर गँवा दिया। उल्लेखनीय है ओवैसी ने उत्तर भारत में कुछ छोटे दलों से गठजोड़ करते हुए उम्मीदवार खड़े किये किंतु उनके ऊपर भाजपा की बी टीम होने का आरोप चस्पा हो जाने से उनकी मुहिम फुस्स हो गई। बहरहाल सर्वोच्च न्यायालय के ताजा फैसले से मुस्लिम पर्सनल लॉ का जिन्न फिर बोतल से बाहर आ गया है। जनता दल (यू) द्वारा न्यायालय के फैसले का समर्थन किये जाने से भाजपा का हौसला बुलंद हुआ है। संसद के आगामी सत्र में ओवैसी यदि इस मुद्दे को उठाते हैं तब भाजपा विरोधी अन्य दलों की  प्रतिक्रिया देखने लायक होगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 12 July 2024

पहाड़ धसकने की बढ़ती घटनाएं चिंता का विषय



उत्तराखंड के कुछ वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया पर छाए हैं। इनमें पहाड़ को धसकते हुए दिखाया गया है। कुछ में मलबे के साथ पानी की तेज धार भी आती दिख रही है जो नीचे बह रही नदी  में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न कर देती है। बद्रीनाथ जाने का मार्ग अवरुद्ध है। हजारों यात्री  फंसे हैं जिन्हें होटल, गेस्ट हॉउस आदि के दोगुने पैसे चुकाने पड़ रहे हैं। ये स्थिति समूचे उत्तराखंड में देखी जा सकती है। जो लोग मोबाइल पर रील बनाकर प्रसारित कर रहे हैं उनका उद्देश्य महज मनोरंजन है या वे  सूचना के तौर पर लोगों को आगाह कर रहे हैं ये तो उनको ही पता होगा किंतु जो चित्र देखने मिल रहे है वे  डरावने हैं क्योंकि जिस आसानी से कहीं भी पहाड़ धसक रहा है उससे लगता है हिमालय की भू संरचना को जबरदस्त नुकसान पहुंचा है। भुरभुरी मिट्टी से खड़ी यह पर्वत माला जब तक वृक्षों से आच्छादित रही तब तक ऊपरी इलाकों में होने वाले हिमपात या बरसात का बोझ पहाड़ सह जाता था क्योंकि वृक्षों की जड़ें  बर्फ और पानी के बोझ को सहने की शक्ति मिट्टी को देती रहती थीं किन्तु धनपिपासु ठेकेदारों, भ्रष्ट सरकारी अमले और उनके सिर पर हाथ रखे राजनेताओं की तिकड़ी ने पहाड़ों पर छाई रहने वाली हरियाली छीन ली जिससे वे काले और कुरूप नजर आने लगे। बीते अनेक वर्षों से हिमस्खलन, भूस्खलन और बादल फटने से तबाही के दृश्य देखने मिलने लगे  हैं। दुर्घटनाएं भी बढ़ती जा रही हैं। हजारों तीर्थ यात्री बीच रास्ते फंसे रहते हैं। कुछ अस्वस्थ होकर दम तोड़ देते हैं। राज्य और केंद्र सरकार के अलावा सेना तथा सीमा सड़क संगठन दुर्घटना स्थल पर पहुंचकर लोगों को राहत देने में पीछे नहीं रहते किंतु अब इस तरह की दुर्घटनाएं जिस तेजी से होने लगी हैं उसकी वजह से समस्या विकराल हो रही है। यद्यपि उत्तराखंड के चार धाम की यात्रा में सबसे अधिक भीड़ वाला मौसम निकल चुका है किंतु अभी भी हजारों श्रद्धालु पहुँच रहे हैं। वर्षाकाल में पहाड़  धसकने के साथ बादल फटने की घटनाएं ज्यादा होती हैं लिहाजा इन दिनों सावधानी की ज्यादा आवश्यकता है। ऐसे में इस मौसम में यात्रा को रोक देने अथवा यात्रियों की संख्या नियंत्रित करने जैसे उपाय किये जाने चाहिए। इसमें दो मत नहीं है कि वाहनों की बेहिसाब आवाजाही से जो शोर और कंपन होता है वह भी कहीं न कहीं पहाड़ों के लिए कष्टदायी  है। सड़कों को बारहमासी के साथ फोर लेन बना देने से इस पर्वतीय क्षेत्र का सुख चैन छिनने लगा है। पहले तो चारधाम यात्रा अधिकतम दीपावली तक चलती थी किंतु सड़कों का स्तर और चौड़ाई बढ़ जाने से अनेक सैलानी उसके बाद भी वहाँ जाने का दुस्साहस करते हैं जिनका उद्देश्य तीर्थाटन कम और मौज - मस्ती ज्यादा होता है। इसलिए वे यहाँ की पवित्रता और पर्यावरण दोनों को क्षति पहुंचाते हैं। आशय ये है कि जिसे देवभूमि कहा  जाता है वह पर्यटन केंद्र का रूप लेती जा रही है। इस बारे में एक बात और भी ध्यान देने योग्य है कि उत्तराखंड के ग्रामीण इलाकों से बड़ी संख्या में आबादी का पलायन मैदानी इलाकों की ओर होने से गाँव के गाँव खाली हो गए। इनमें रहने वाले लोगों को प्रकृति और पहाड़ की तासीर पता थी। इसलिए वे जल, जंगल और जमीन तीनों के प्रति सम्मान और संवेदनशीलता रखते थे। लेकिन जो लोग बाहर से आकर यहाँ निवेश कर रहे हैं उनका एकमात्र उद्देश्य येन केन प्रकारेण पैसा बटोरना है और उसी के फेर में समूचे यात्रा मार्ग पर कांक्रीट के ढांचे खड़े किये जा रहे हैं और सारी गंदगी पहाड़ और नदियों में  फैल रही है। ये देखते हुए अब उत्तराखंड सरकार को चार धाम यात्रा में आने वाले यात्रियों की संख्या पर नियंत्रण लगाना पड़ेगा। इसके अलावा वाहनों की बेहिसाब आवाजाही पर भी लगाम लगानी होगी जिनसे निकलने वाला धुंआ वृक्षों को क्षति पहुंचाता है। कांक्रीट के बढ़ते निर्माण भी रोके जाने चाहिए। कुल मिलाकर बात ये है कि चार धाम की यात्रा पर आने वाले श्रद्धालुओं को ये एहसास करवाया जाना जरूरी है कि यह देवभूमि है तो इसकी पवित्रता बनाये रखना उनका कर्तव्य है। तीर्थयात्रियों को भी थोड़ा संयम रखना चाहिए। चार धाम की यात्रा में आ रहे व्यवधानों के बाद भी लोगों का वहाँ जाकर भीड़ लगाना गैर जिम्मेदाराना रवैया है। उनको ये ध्यान रखना चाहिए कि जिसमें अनुशासन न हो वह धर्म नहीं ढकोसला है।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 11 July 2024

सर्वोच्च न्यायालय ने समान नागरिक संहिता के मुद्दे को फिर जिंदा कर दिया


लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने मुसलमानों के निजी कानूनों के संरक्षण का वायदा किया था।  पार्टी के घोषणापत्र के अलावा  अन्य नेताओं ने प्रचार के दौरान मुस्लिम समुदाय को आश्वस्त किया कि वे शरीयत में वर्णित प्रावधानों से छेड़छाड़ नहीं होने देंगे । दरअसल उसे ऐसा करने की जरूरत इसलिए पड़ गई क्योंकि  भाजपा समान नागरिक संहिता लाने की बात कह चुकी थी। 400 पार के उसके नारे को कांग्रेस ने दलितों और मुसलमानों के बीच ये कहकर प्रचारित किया कि भाजपा तीन चौथाई बहुमत इसलिए हासिल करना चाहती थी ताकि संविधान में बदलाव करते हुए आरक्षण खत्म करे और मुसलमानों के पर्सनल लॉ समाप्त करते हुए समान नागरिक संहिता लागू कर दे। कांग्रेस का यह दाँव कारगर साबित हुआ। यद्यपि नरेंद्र मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने में कामयाब हो गए किंतु ये भी सच है कि जनता दल (यू). और तेलुगु देशम जैसे दलों से समर्थन लेने के कारण अब वे समान नागरिक संहिता सदृश मुद्दों पर नीतिगत फैसले लेने का खतरा नहीं उठाना चाहेंगे। लेकिन गत दिवस सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले ने परोक्ष  तौर पर ही सही किंतु  समान नागरिक संहिता का मुद्दा फिर से जीवित कर दिया। तेलंगाना की एक मुस्लिम महिला ने तलाक़ के बाद परिवार न्यायालय में सी.आर.पी.सी की धारा 125 के अंतर्गत  गुजारा भत्ता हेतु आवेदन दिया। उस पर विचार करने के बाद न्यायालय ने उसके पति को  20 हजार रु. प्रतिमाह गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया। उसके विरुद्ध पति ने उच्च न्यायालय में अपील की जिसने तलाक़शुदा पत्नी को  गुजारा भत्ता प्राप्त करने का अधिकारी तो माना किंतु राशि घटाकर 10 हजार कर दी। पति महोदय ने इस फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में ये कहते हुए चुनौती दी कि शाहबानो मामले में सर्वोच्च न्यायालय के ऐसे ही फैसले को संसद ने 1986 में पलट दिया था जिसके अनुसार मुस्लिम महिला द्वारा गुजारा भत्ता प्राप्त करने के अधिकार को खत्म कर दिया था। बताने की जरूरत नहीं कि सर्वोच्च न्यायालय के उक्त निर्णय को संसद में उलटवा देने की कितनी बड़ी कीमत कांग्रेस को चुकानी पड़ी। गत दिवस सर्वोच्च न्यायालय ने तेलंगाना के मुस्लिम याचिकाकर्ता की अपील ठुकराते हुए अपने फैसले में स्पष्ट तौर पर कहा कि 1986 में संसद द्वारा पारित कानून सी. आर.पी.सी की धारा 125 के आड़े नहीं आता जिसके अंतर्गत हर विवाहित महिला चाहे वह मुस्लिम ही क्यों न हो, गुजारा भत्ते की पात्र और हकदार है। हालांकि न्यायालय ने ये निर्णय मुस्लिम महिला पर छोड़ दिया कि वह 1986 में  पारित कानून को माने या फिर सी.आर.पी.सी की धारा 125 के अंतर्गत गुजारा भत्ता हासिल करने का विकल्प चुने। इस ताजा फैसले का मुस्लिम समाज निःसंदेह विरोध करेगा क्योंकि इसके कारण तलाक़शुदा मुस्लिम महिलाओं द्वारा गुजारा भत्ता लेने का रास्ता खुल गया। देखने वाली बात ये है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ में रत्ती भर बदलाव भी सहन न करने वाले मुस्लिम धर्मगुरु इस फैसले को किस प्रकार स्वीकार कर सकेंगे जिसमें साफ लिखा है कि  मुस्लिम  सहित हर विवाहित महिला तलाक़ के बाद गुजारा भत्ते की अधिकारी है।  दूसरे शब्दों में कहें तो गत दिवस आये फैसले ने संसद और शरीयत दोनों को एक तरह से चुनौती दे डाली। स्व. राजीव गाँधी ने शाहबानो संबंधी सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को तो संसद में अपने विशाल बहुमत के बल पर रद्द करवा दिया किंतु गत दिवस आये फैसले ने उनके बेटे राहुल और कांग्रेस दोनों  को अजीबोगरीब स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया। क्योंकि जिस मुस्लिम पर्सनल लॉ को सुरक्षित रखने का आश्वासन देकर उन्होंने इस समुदाय का थोक समर्थन हासिल किया उसमें सर्वोच्च न्यायालय ने सेंध लगा दी। संविधान की किताब लेकर घूमने वाले श्री गाँधी सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की आलोचना करने से भी बचेंगे। अन्य विपक्षी दलों की स्थिति भी सांप छछूंदर जैसी होकर रह गई जो इस फैसले का स्वागत करेंगे तो मुसलमान नाराज हो जायेंगे और विरोध करेंगे तो हिंदुओं में उसकी विपरीत प्रतिक्रिया होगी। रही बात संसद के जरिये इस कानून को उलटने की तो समान नागरिक संहिता की पैरोकार भाजपा के रहते ये नामुमकिन है। ऐसे में कुछ राज्यों के आगामी विधानसभा चुनावों में ये फैसला विपक्षी दलों के लिए मुसीबत बने बिना नहीं रहेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 10 July 2024

आगामी विधानसभा चुनावों की छाया होगी केंद्र के बजट पर


18 वीं लोकसभा के  दूसरे सत्र में 23 जुलाई को वित्त मंत्री निर्मला सीतारामण मौजूदा वित्तीय वर्ष का बजट लोकसभा में प्रस्तुत करेंगी।  लोकसभा चुनाव के कारण फरवरी में अंतरिम बजट पेश किया गया था।यद्यपि भाजपा इस बार बहुमत से पीछे रह गई किंतु उसने सहयोगी दलों के साथ जिस आसानी से सरकार बनाई उससे लगने लगा कि नरेन्द्र मोदी पूरे 5 साल सत्ता में रहेंगे। सबसे बड़ा संकेत मिला शेयर बाजार में उछाल से जिसका सूचकांक  4 जून को आये चुनाव परिणामों के बाद से तकरीबन 10 फीसदी बढ़ चुका है।  एग्जिट पोल के बाद चढ़े शेयर बाजार ने  नतीजों में भाजपा का बहुमत न आते देख जबरदस्त गोता लगाया। इस पर एग्जिट पोल करने वालों  पर  आरोप लगा कि उन्होंने कुछ लोगों के इशारे पर गलत आकलन पेश किया जिससे आम निवेशकों को भारी नुकसान हुआ। राहुल गाँधी ने तो इसकी जाँच हेतु संयुक्त संसदीय समिति गठित करने की मांग तक कर डाली। लेकिन जैसे ही सरकार अस्तित्व में आई शेयर बाजार ने तेजी पकड़ी और वह 80 हजार के इर्द- गिर्द बना हुआ है। आगे उसमें वृद्धि होगी या भाव गिरेंगे ये बजट पर निर्भर करेगा। मोदी सरकार के पिछले सभी बजट हालांकि अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में सहायक साबित हुए किंतु छोटा और मध्यम व्यापारी तथा कम आय वाले नौकरपेशा को ये महसूस होता रहा कि सरकार या तो बड़े उद्योगपतियों की हितचिंतक है या फिर उन लाभार्थियों की जिनका वोट उसे सत्ता तक पहुंचाता है। यदि इस बार भाजपा को बहुमत मिला होता तब  उम्मीद की जा सकती थी आगामी बजट भी पिछले बजटों जैसा होगा। लेकिन चुनाव परिणामों ने  प्रधानमंत्री को  दबाव में तो ला ही दिया। मध्यमवर्गीय मतदाताओं द्वारा कम मतदान और गरीब तबके में आरक्षण हटने के भय के साथ ही जाति की तरफ झुकने से भाजपा  को कम से कम 75 सीटों का नुकसान हुआ। वैसे तो हर सरकार इंफ्रा स्ट्रकचर, विकास दर और आर्थिक सुधारों की बात करती है। लेकिन सत्ता में बने रहने के लिए उसे उस जनता को भी खुश करना होता है जो  उसकी ताजपोशी करवाती है। बीते दस सालों में नरेंद्र मोदी ने बड़े - बड़े काम किये। पर्याप्त बहुमत और अपार लोकप्रियता से उत्पन्न आत्मविश्वास के दम पर उन्होंने जोखिम भी  उठाये। चूंकि नीयत साफ थी इसलिए जनता ने उन्हें सिर - आँखों पर बिठाया। राष्ट्रवाद और हिंदुत्व जैसे मुद्दों के कारण उनका नाम  जीत की गारंटी माना जाने लगा किंतु इस लोकसभा चुनाव ने  कई सबक दे डाले। ऐसे में उनकी सरकार के  आगामी बजट में वह सब होना संभावित है जो चुनावी राजनीति को सीधे प्रभावित करे। अगले कुछ महीनों में हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखण्ड और संभवतः जम्मू और कश्मीर तथा  अगले साल दिल्ली और बिहार में विधानसभा चुनाव होंगे। ऐसे में श्री मोदी के सामने दूध से जला छाछ भी फूंक - फूंककर पीने वाली स्थिति है। जिन राज्यों में इसी साल चुनाव होने वाले हैं उन सभी में लोकसभा चुनाव में भाजपा को कहीं कम तो कहीं ज्यादा नुकसान हुआ है। वह भी तब जब अधिकांश  अनुमान भाजपा को कम से कम 300 और एनडीए को 350 सीटें दे रहे थे । लेकिन अब विपक्ष का हौसला सातवें आसमान पर है। उसको एकता की ताकत समझ में आ गई है। जिन राज्यों में भाजपा की काँग्रेस से सीधी लड़ाई है वहाँ वह भारी पड़ जाती है किंतु जहाँ अनेक दल मैदान में हैं वहाँ उनके एकजुट हो जाने पर उसको नुकसान हो जाता है। ये देखते हुए आगामी बजट में केंद्र सरकार को आर्थिक तुष्टीकरण करना पड़ेगा। अर्थात आम जनता को तत्काल लाभ पहुंचाने वाले ऐसे प्रावधान करना होंगे जो आसानी से समझ में आ सकें। पेट्रोल - डीजल को जीएसटी के अंतर्गत लाने के अलावा आयकर छूट की सीमा में अच्छी खासी वृद्धि , चिकित्सा बीमा की प्रीमियम में कमी जैसे कुछ ऐसी बातें बजट में होना समय की मांग है। किसानों को साल में मिलने वाली 6 हजार की राशि दोगुनी करना भी जरूरी है। बुजुर्गों को रेल टिकिट में रियायत फिर शुरू होनी चाहिए। 2024 के लोकसभा चुनाव में बेरोजगारी का मुद्दा भाजपा के लिए नुकसानदेह साबित हुआ। पार्टी इस पर कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे सकी। वह गलती इस बजट में सुधारी जा सकती है। इसलिये बेहतर हो प्रधानमंत्री कुछ आर्थिक विशेषज्ञों के साथ ही चुनावी राजनीति में माहिर लोगों से सुझाव लेकर ऐसा बजट बनवाएं जिसे देखकर आम आदमी महसूस कर सके कि ये उसके लिए बना है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 9 July 2024

घाटी के बाद जम्मू को निशाना बना रहे आतंकवादी


जम्मू के कठुआ इलाके में सेना के वाहन पर आतंकवादी हमले में 5 फौजी शहीद हो गए। हाल ही में ऐसी ही एक और वारदात में 2 जवान जान से हाथ धो बैठे। सैन्य वाहन पर हमले की घटना बीते मई माह में भी हुई थी। लेकिन हालिया हमलों से ये बात निकलकर आ रही है कि आतंकवादी कश्मीर घाटी के साथ - साथ जम्मू अंचल को भी अपना कार्यक्षेत्र बना रहे हैं। हालांकि हिन्दू बहुल जम्मू क्षेत्र में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवादियों ने पहले भी हमले किये किंतु राज्य विधानसभा चुनाव के पहले इस तरह की घटनाएं लगातार होना किसी बड़े षडयंत्र का हिस्सा प्रतीत होती है। उल्लेखनीय है लोकसभा चुनाव के दौरान पूरे राज्य में दशकों बाद रिकार्ड तोड़ मतदान हुआ। लेकिन उससे बड़ी बात ये रही कि राज्य के दो पूर्व मुख्यमंत्री मेहबूबा मुफ्ती और उमर अब्दुल्ला क्रमशः अनंतनाग और बारामूला की अपनी परंपरागत सीट पर बुरी तरह से हार गए। मेहबूबा को नेशनल  काँफ्रेंस के प्रत्याशी ने  शिकस्त दी वहीं उमर को जेल में बंद एक आतंकवादी ने चित्त कर दिया। अलगाववाद से जूझते आ रहे इस राज्य में ये बहुत बड़ा बदलाव कहा जा सकता है। निकट भविष्य में जम्मू कश्मीर राज्य में विधानसभा चुनाव करवाने की तैयारियां चल रही हैं। लोकसभा चुनाव में भाजपा ने जम्मू क्षेत्र की दोनों सीटें जम्मू और ऊधमपुर बरकरार रखीं वहीं नेशनल काँफ्रेंस श्रीनगर और अनंतनाग पर काबिज हुई । बारामूला से जीते निर्दलीय राशिद ने जेल से आकर लोकसभा की शपथ तो ले ली किंतु उनकी रिहाई आसान नहीं है। इस प्रकार सदन में नेशनल काँफ्रेंस और भाजपा के दो - दो सदस्य ही मौजूद रहेंगे। लेकिन अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार संभवतः पहली मर्तबा लोकसभा में नजर नहीं आयेगा। इससे आगामी विधानसभा चुनाव के समीकरणों का पूर्वाभास होता है क्योंकि अब तक ये माना जाता था उक्त दोनों खानदानों के बिना कश्मीर घाटी की राजनीति की कल्पना तक नहीं की जा सकती। लेकिन राशिद नामक आतंकवादी द्वारा उमर अब्दुल्ला को हरा देने से ये संकेत मिला है कि घाटी के युवा परिवार की सियासत से ऊबकर  अपने नये नायक तलाश रहे हैं। पंजाब से भी ऐसा ही परिणाम देखने मिला जहाँ जेल में बन्द अमृतपाल सिंह लोकसभा चुनाव जीत गया। ये एक खतरनाक संकेत है। मोदी सरकार ने जम्मू कश्मीर में विधानसभा सीटों का परिसीमन इस प्रकार करवाया  जिससे क्षेत्रीय असंतुलन दूर हुआ। अभी तक घाटी पूरी तरह हावी रहा करती थी। लेकिन अब जम्मू अंचल में भी सीटें बढ़ गई हैं। इससे अलगाववादी चिंतित हैं। इसलिए आतंकवादी घटनाओं का केंद्र जम्मू के सीमावर्ती इलाकों को बनाया जा रहा है। कांग्रेस घाटी में नेशनल काँफ्रेंस के साथ गठबंधन करने के कारण चुनाव जीता करती थी। अब चूंकि अब्दुल्ला परिवार का प्रभाव सिमट रहा है तब घाटी में उसके लिए कोई गुंजाइश नहीं बची। यही स्थिति भाजपा की है जो जम्मू में तो बेहद ताकतवर है किंतु घाटी में तमाम दावों के बाद भी घुटनों के बल चलने की स्थिति में है। ये देखते हुए विधानसभा की असली लड़ाई जम्मू की सीटों पर देखने मिलेगी जिनके सहारे भाजपा श्रीनगर की गद्दी हासिल करना चाह रही है। रही बात घाटी की तो वहाँ की राजनीति भटकाव की शिकार होकर रह गई है। ऐसे में राशिद जैसे कुछ प्रयोग और भी होने की आशंका है । जम्मू क्षेत्र में अचानक सेना की टुकड़ियों पर हमले बढ़ने से लग रहा है अलगाववादी ताकतें अब हिंदू बहुल इलाकों को निशाना बनाकर मतदान का प्रतिशत घटाने की रणनीति पर आगे बढ़ रहे हैं। केंद्र सरकार को इस बारे में सतर्क हो जाना चाहिए। जम्मू के कुछ सीमावर्ती इलाकों में रोहिंग्या घुसपैठियों को फारुख सरकार ने बसा दिया था जो आतंकवादियों के सहायक की भूमिका निभा सकते हैं । धारा 370 हटने के बाद घाटी में शांति का अनुभव होने लगा है। ऐसे में आतंकवादी अब जम्मू में नया ठिकाना बनाने में जुटे हैं। उनकी जड़ें जमने से पहले ही उनमें मठा डालना जरूरी है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 8 July 2024

बदलते वैश्विक परिदृश्य के बीच मोदी की मॉस्को यात्रा पर सबकी निगाहें



प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत - रूस सम्मेलन में भाग लेने मॉस्को जा रहे हैं। यूक्रेन युद्ध के बाद उनकी यह पहली रूस यात्रा है जो रूसी राष्ट्रपति पुतिन के निमंत्रण पर हो रही है।  यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि श्री मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद रूस जा रहे  हैं। इस बार उनकी सरकार सहयोगी दलों के समर्थन पर निर्भर हैं। इसे उनके प्रभाव में कमी के तौर पर देखा जा रहा है। ऐसे में राष्ट्रपति पुतिन उनके प्रति किस प्रकार पेश आते हैं उससे दोनों देशों के संबंधों का भविष्य तय होगा। यूक्रेन युद्द के बाद लगे प्रतिबंधों के कारण रूस , अमेरिका सहित समूचे पश्चिमी देशों से कट गया। ऐसे में केवल भारत और चीन ही हैं जिन्होंने उसके साथ व्यापारिक और सैन्य रिश्ते पहले से ज्यादा मजबूत किये। कच्चे तेल और गैस के अलावा अन्य तकनीकी चीजों की खरीदी बड़ी मात्रा में दोनों के द्वारा की गई। इससे अमेरिका थोड़ा नाराज जरूर हुआ किंतु वैश्विक स्तर पर भारत की जो मजबूत स्थिति है उसकी वजह से वह ज्यादा कुछ न कर सका। वैसे उसके साथ भी भारत के व्यापारिक और कूटनीतिक  संबंध अब तक के सबसे अच्छे दौर से गुजर रहे हैं।  इसका बड़ा कारण पाकिस्तान का लगातार कमजोर और अस्थिर होते जाना है। वहीं अमेरिका इस बात को भली - भाँति समझ चुका है कि भारत अब एक ऐसी शक्ति बन चुका है जो दक्षिण एशिया में चीन के विस्तारवाद को रोकने में सक्षम है। बीजिंग के साथ चले आ रहे सीमा विवाद पर नई दिल्ली के कड़े रुख और सीमावर्ती क्षेत्रों में आवागमन के बेहतरीन प्रबन्ध के साथ ही सैनिकों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि से अमेरिका भी प्रभावित है। भारत द्वारा अग्रिम मोर्चे तक लड़ाकू विमान और लम्बी दूरी तक मार करने वाली मिसाइलें तैनात करने से चीन दबाव में आया है। उसकी वन बेल्ट वन रोड परियोजना भी खटाई में पड़  चुकी है।  पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में  पाकिस्तान और चीन के विरोध में जो आवाजें बुलंद हो रही हैं उससे अमेरिका भारत की उपेक्षा करने की जुर्रत नहीं कर सकता। लेकिन  यूक्रेन संकट के बाद  रूस और  चीन के बीच निकटता बढ़ने से भारत की चिंताएं बढ़ चली हैं। यद्यपि दोनों के बीच लम्बे समय तक तनावपूर्ण सम्बन्ध रहे।  साम्यवादी विचारधारा के बावजूद सोवियत संघ की सर्वोच्चता चीन ने कभी स्वीकार नहीं की। लेकिन जब सोवियत संघ का विघटन हुआ तब चीन को रूस के साथ रिश्ते सुधारने के फायदे नजर आने लगे। रूस द्वारा बेचे जाने वाले कच्चे तेल का चीन सबसे बड़ा खरीददार  बन गया। सैन्य तकनीक भी उसने वहाँ से ली। बदले में रूस ने भी चीन को कूटनीतिक समर्थन देने में कोई कंजूसी नहीं की। ताईवान इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। दोनों देश सुरक्षा परिषद के सदस्य हैं जहाँ कश्मीर विवाद में रूस सदैव भारत के साथ खड़ा रहा जबकि चीन विरोध में। इसलिए पुतिन और जिनपिंग के बीच बढ़ती नजदीकी नई दिल्ली की चिंता बढ़ाने वाली है।  उस परिप्रेक्ष्य में श्री मोदी की मॉस्को यात्रा का रणनीतिक महत्व है। उल्लेखनीय है यूक्रेन पर हमले का भारत ने न तो समर्थन किया और न ही विरोध।  ये बात भी सही है कि इस युद्ध से वैश्विक स्तर पर जो उथल - पुथल हुई उसका प्रत्यक्ष न सही किंतु अप्रत्यक्ष असर तो हम पर भी पड़ा है। कोरोना के बाद आये इस संकट ने दुनिया को तीसरे विश्वयुद्ध के कगार पर ला खड़ा किया है। भारतीय प्रधानमंत्री की रूस यात्रा के समय ही अमेरिका में नाटो देशों का शिखर सम्मेलन हो रहा है। यूक्रेन युद्ध के एक कारणों में यूक्रेन का नाटो की तरफ झुकना भी था। पुतिन को भय था कि इस बहाने अमेरिका उसके दरवाजे पर आकर बैठ जाएगा। सोवियत संघ के हिस्से रहे पूर्वी यूरोप के कुछ देशों के नाटो से जुड़ने के कारण भी रूस काफी चिंतित था। ऐसे समय में भारत ने युद्ध रोकने की अपील तो की परंतु अमेरिकी अपेक्षाओं के विरुद्ध रूस की निंदा से परहेज किया। इसलिए राष्ट्रपति पुतिन भी भारत को महत्व देते आये हैं किंतु कुछ समय से चीन की तरफ उनका झुकाव शंका उत्पन्न करने वाला है। तीसरी बार सरकार बनाने के बाद श्री मोदी की मॉस्को यात्रा का बहुआयामी महत्व है। रूसी राष्ट्रपति से आमने - सामने की बातचीत में वे आपसी सम्बन्धों की मजबूती के बारे में उनका रुख जानने का प्रयास करेंगे और भारत - चीन के बीच विवाद के बारे में जानकारी देकर अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करेंगे। अमेरिका में इसी साल राष्ट्रपति चुनाव होंगे। मौजूदा राष्ट्रपति बाईडेन की गद्दी खतरे में है। लेकिन यदि डोनाल्ड ट्रंप वापस व्हाइट हाउस पर काबिज हुए तब यूक्रेन संकट और गहरा जायेगा। फ्रांस में भी सत्ता परिवर्तन के आसार हैं। ब्रिटेन में लेबर पार्टी की सरकार बन गई ।  वहीं ईरान में हिज़ाब विरोधी उदारवादी राष्ट्रपति चुनकर आ गए जो अमेरिका और यूरोपीय देशों से रिश्ते सुधारने इच्छुक हैं। इस प्रकार दुनिया के बदलते परिदृश्य के बीच हो रही श्री मोदी की मॉस्को यात्रा पर चीन सहित पूरी दुनिया की निगाहें लगी हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी