Monday, 18 November 2024

आम आदमी पार्टी : ताजी हवा का झोका भी प्रदूषण का शिकार



हालांकि आजकल कौन सा नेता अपनी पार्टी छोड़कर दूसरी में चली जाए, कहना  मुश्किल है क्योंकि सिद्धांत और विचारधारा का तो कोई महत्व रहा नहीं। लेकिन 2014 की मोदी लहर के बाद दिल्ली विधानसभा चुनाव में धूमकेतु की तरह चमकी आम आदमी पार्टी को राष्ट्रीय राजनीति में ताजी हवा का झोंका माना जाने लगा क्योंकि उसमें अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसौदिया को छोड़ दें तो बाकी दूसरा चेहरा नहीं था जिसकी जनता के बीच कुछ पकड़ हो। नई नवेली पार्टी ने अति साधारण किस्म के लोगों को उम्मीदवार बनाकर जिस धमाकेदार अंदाज में दिल्ली का चुनाव जीता उसकी पूरे विश्व में चर्चा हुई। कांग्रेस का सफाया हो गया वहीं भाजपा भी  3 विधायकों तक सिमट गई। यही करिश्मा 2020 में भी दोहराया गया। और फिर दिल्ली नगर निगम भी आम आदमी पार्टी के कब्जे में चली गई। इन सबके कारण श्री केजरीवाल को प्रधानमंत्री का दावेदार माना जाने लगा। पंजाब में भारी बहुमत से सरकार बनाने के बाद तो उनकी महत्वाकांक्षाएं आसमान छूने लगीं । पार्टी ने रिकार्ड समय में राष्ट्रीय दल होने का गौरव भी हासिल कर लिया। हालांकि अन्य राज्यों में उसकी जमानत जप्ती का सिलसिला जारी रहा। जिसका ताजा उदाहरण हरियाणा का चुनाव है। कुछ राज्य में जरूर उसके विधायक जीते किंतु कांग्रेस का विकल्प बनकर भाजपा को चुनौती देने की जो उम्मीद श्री केजरीवाल ने पाल रखी थी वह तब फुस्स होकर रह गई जब भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरने के बाद पार्टी कांग्रेस की अगुआई में बने इंडिया गठबंधन में शामिल हो गई। जिन भ्रष्ट नेताओं की सूची जारी कर श्री केजरीवाल अपने को ईमानदारी का पुतला बताते नहीं थकते थे उन्हीं से गले मिलकर उन्होंने ये साबित कर दिया कि ताजी हवा होने का दावा कर रही आम आदमी पार्टी भी दिल्ली के प्रदूषण का शिकार हो गई। बीते दो सालों में उसकी छवि लगातार दागदार होती गई। दिल्ली के मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री सहित कुछ और नेता भ्रष्टाचार के आरोप में जेल चले गए। पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस से गठबंधन करने के बाद भी दिल्ली में उसे कुछ हासिल न हुआ। ऐसा लगता है राष्ट्रीय नेता बनने के फेर में श्री केजरीवाल अपने गढ़  में ही कमजोर होने लगे। हाल ही में दिल्ली के महापौर चुनाव में पार्टी के 10 विधायकों ने भाजपा प्रत्याशी का समर्थन किया। गत दिवस प्रदेश  सरकार के वरिष्ट मंत्री कैलाश गहलोत  वायदे पूरे नहीं करने के साथ ही मुख्यमंत्री आवास पर किये बेतहाशा खर्च के लिए श्री केजरीवाल पर तीखे आरोप लगाने के बाद आज भाजपा में शामिल हो गए। हालांकि वे मुख्यमंत्री न बनाये जाने से नाराज थे किंतु उन जैसे नेता का सरकार और  पार्टी छोड़ना इस बात का संकेत है कि  श्री केजरीवाल का दबदबा पहले जैसा नहीं रहा। इसका कारण उनकी  साफ - सुथरी छवि पर दाग लगना है। दिल्ली सरकार जिन जनकल्याणकारी नीतियों के चलते प्रसिद्ध हुई थी वे भी पहले जैसी प्रभावशाली नहीं रहीं। सबसे बड़ा धक्का लगा शराब घोटाले से मिली बदनामी से। वरना अपने गृहराज्य हरियाणा में श्री केजरीवाल की इतनी फजीहत न हुई होती। पार्टी छोड़ते समय श्री गहलोत ने जो आरोप लगाए उन्हें मुख्यमंत्री पद न मिलने से उत्पन्न खीझ भी कहा जा सकता है किंतु उनकी ये बात में पूरी तरह सही है कि श्री केजरीवाल ने केंद्र सरकार से लड़ने में काफी समय बर्बाद किया। हालांकि दूसरी पार्टी से नेताओं का आम आदमी पार्टी में आना भी जारी है। विशेष रूप से कांग्रेस से ज्यादा लोग आ रहे हैं। लेकिन स्वाति मालीवाल के बाद कैलाश गहलोत के बाहर निकलने से श्री केजरीवाल की वजनदारी घटी  क्योंकि ये दोनों उनके बेहद करीबी रहे हैं। हालांकि कुछ नेताओं के इधर - उधर होने से किसी पार्टी के भविष्य पर सवाल उठाना जल्दबाजी होगी किंतु ये तो मानना पड़ेगा कि आम आदमी पार्टी की कमीज भी बेदाग नहीं रही। जिस नई राजनीति से देश को परिचित करवाने का श्री केजरीवाल श्रेय लेते थे वह दिल्ली की यमुना जैसी होकर रह गई है। अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की कोख से जन्मी आम आदमी पार्टी भी देश की अन्य राजनीतिक पार्टियों की तरह ही सत्ता की अंधी दौड़ में शामिल नजर आने लगी है। इसीलिए उसे न भ्रष्टाचार से परहेज रहा और न ही भ्रष्ट नेताओं के साथ गलबहियाँ करने में। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 16 November 2024

न वैसे नेता रहे और न ही श्रोता: हाईटेक प्रचार में डूब गया विचार

समय के साथ सभी चीजें बदलती हैं। इसलिए चुनाव भी नए रंग और नए रूप में नजर आने लगे हैं। सघन जनसंपर्क अब औपचारिकता में बदल गया है। मतदाताओं की बढ़ती संख्या और निर्वाचन क्षेत्र के फैलाव ने प्रत्याशियों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। इसीलिए घर - घर जाकर दरवाजा खटखटाने वाले प्रचार की जगह अब हाईटेक संचार माध्यमों ने ले ली है। मोबाइल पर धड़ाधड़ संदेश आते हैं , प्रत्याशी का रिकॉर्डेड अनुरोध भी सुनाई देता है। सोशल मीडिया के सभी मंच चुनावी प्रचार से भरे हैं । बड़े  नेताओं के तामझाम भरे रोड शो होने लगे हैं। कुछ विशिष्ट हस्तियों के नाम पर भीड़ जमा करने का तरीका भी अपनाया जाने लगा है किंतु इस सबके बीच देर रात तक चलने वाली छोटी - बड़ी सभाएं अतीत बन चुकी हैं जिनमें विभिन्न दलों के नेता घंटों अपनी विचारधारा का बखान करते हुए मतदाताओं से समर्थन की अपील करते थे। वे नेता  हेलीकॉप्टर और चार्टर्ड विमानों से नहीं अपितु रेल या सड़क मार्ग से आते। उनके आने में  देर होने पर भी जनता उनको सुनने घंटों प्रतीक्षा करती रहती थी। नुक्कड़ सभाओं में प्रादेशिक या स्थानीय नेतागण अपनी पार्टी का पक्ष रखते थे। आज की तरह रैलियों में शामियाना और कुर्सियां नहीं लगती थीं । आगे बिछी कुछ दरियों पर पहले से आए श्रोता कब्जा जमा लेते और पीछे हजारों श्रोता खड़े -खड़े भाषण सुनते थे। प्रधानमंत्री के अलावा अनेक ऐसे राष्ट्रीय नेता भी थे जो भले सांसद - विधायक न रहे हों किंतु जनता उनको सुनने बेताब रहा करती थी। सबसे बड़ी बात ये थी कि उन नेताओं को सुनने के लिए वे लोग भी आते जो उनकी विचारधारा से सहमत नहीं होते थे । नुक्कड़ सभाओं के माध्यम से प्रादेशिक नेता छोटे - छोटे श्रोता समूह से मुखातिब होते और लोग भी धैर्यपूर्वक उन्हें सुनते थे। समय बीतने के साथ चुनाव महंगे होते जा रहे हैं। चुनाव आयोग ने बीते कुछ दशकों में उनका रंग - रूप पूरी तरह बदल दिया। खर्च कम करने के लिए किए गए उपाय कितने सफल हुए ये बड़ा सवाल है क्योंकि धन का उपयोग पहले से कई गुना बढ़ गया है। रात 10 बजे सभाएं बंद कर दी जाती हैं। आयोग एक - एक कुर्सी और वाहन का हिसाब रखता है। चाय , समोसे तक का खर्च जोड़ा जाने लगा है। अखबारी विज्ञापन के अलावा सोशल मीडिया पर भी  हेट, फेक और पेड समाचार पर 24 घंटे निगाह रखी जाने लगी है। वृद्ध और निःशक्त मतदाताओं को घर पर मतदान की सुविधा भी शुरू हो गई है। मतदाता सूचियां बनाने और मतपर्चियां घर - घर भेजने का सरकारी इंतजाम  मत प्रतिशत बढ़ाने में  सहायक हुआ है। लेकिन चुनावी सभाओं का  असली आनंद  लुप्त हो गया है। न वैसे ओजस्वी वक्ता रहे और न ही प्रतिबद्ध श्रोता। इसका मुख्य कारण ये भी है कि सभी प्रमुख राजनीतिक दल और उनके नेता सत्ता में रह चुके हैं। ऐसे में वे केवल अपने विरोधी की आलोचना कर जनता को प्रभावित नहीं कर सकते। उन्हें सरकार में रहते हुए जनहित में किए गए कामों का हिसाब भी देना होता है।  वह पीढ़ी भी धीरे - धीरे समाप्त होती जा रही है जो किसी पार्टी  या नेता की अंधभक्त होती थी। नेहरू जी ,  डा.लोहिया और अटल जी जैसे जननेताओं के विरोधी भी उनके प्रति सम्मान का भाव रखते थे। धीरे - धीरे नेताओं का स्तर गिरने लगा जिसके परिणामस्वरूप राजनीति के प्रति समाज में व्याप्त आदर भाव में  भी कमी आती गई। आज देश में शायद ही कोई नेता बचा हो जिसको सुनने स्वस्फूर्त जनता उमड़ पड़ती हो। गांव और कस्बों में हेलीकॉप्टर देखने जरूर लोग जमा हो जाते हैं किंतु नेताओं को सुनने का लालच खत्म होने लगा है। और हो भी क्यों न , बीते 75 साल से भाषण सुनती आई जनता जब देखती है कि साधारण परिस्थिति का व्यक्ति तो चुनाव जीतने के बाद अपार धन संपत्ति अर्जित कर लेता है किंतु उसकी अपनी  दशा नहीं बदलती तब उसके मन में गुस्सा जागता है। और इसी गुस्से ने नेताओं के प्रति असम्मानजनक संबोधनों को जन्म दिया । जो राजनीति समाज को दिशा देती थी वह खुद ही दिशाहीन हो चली है । इसी तरह जिन नेताओं को जनता अपना पथ प्रदर्शक माना करती थी वे खुद भटकाव का शिकार  हैं। ये स्थिति अच्छी नहीं है जिसका प्रमाण राजनीति से अच्छे  लोगों का दूर होते जाना है। हालांकि सभी पार्टियों और नेताओं को कठघरे में खड़ा करना न्यायोचित नहीं होगा किंतु अधिकांश की साख में कमी आई है , जो लोकतंत्र के लिए शुभ  संकेत नहीं है। चूंकि हमारा समाज काफी धैर्यवान है इसलिए अपनी उपेक्षा और बदहाली पर उत्तेजित नहीं होता। हर चुनाव के बाद लोकतंत्र की मजबूती और मतदाताओं की समझदारी का बखान तो खूब होता है किंतु  अधिक मतदान और चुनाव के निर्विघ्न संपन्न हो जाने को ही सफलता और संतोष का पैमाना माना लेना सच्चाई से आंखें चुराने जैसा है। भारतीय लोकतंत्र दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र भले हो किंतु वह अपनी नैसर्गिक खूबसूरती खोता जा रहा है। कृत्रिमता , बाजारवाद और नीतिगत भटकाव उसकी पहिचान बन चुके हैं। चुनावों के  लगातार महंगे होने से भी उनकी गंभीरता और गरिमा में कमी आई है। नेताओं के आकर्षण में कमी आने का ही प्रमाण है कि पहले उनको देखने - सुनने जनसैलाब उमड़ा करता था किंतु अब वही नेता रोड शो के माध्यम से खुद को दिखाते नजर आते हैं।


-रवीन्द्र वाजपेयी

झांसी अग्निकांड : गलतियों से सबक न लेने का दुष्परिणाम


बात 3 साल पुरानी है। म.प्र की राजधानी भोपाल के  हमीदिया मेडिकल कालेज के शिशु रोग वार्ड में आग लगने से 4 नौनिहालों की दर्दनाक मौत ने इस अस्पताल की व्यवस्था की पोल खोल दी। उल्लेखनीय है यहाँ अति विशिष्ट लोगों की चिकित्सा भी होती है। चूंकि बात राजधानी की थी लिहाजा शासन - प्रशासन सब  चुस्त - दुरुस्त हो गए। तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने  फरमान जारी कर दिया कि प्रदेश भर के अस्पतालों और ऊँची इमारतों में आग बुझाने के प्रबंधों की जाँच के बाद उपयुक्त इंतजाम न होने पर कड़ी कारवाई की जाए। फिर क्या था पूरे प्रदेश में फायर ऑडिट नामक मुहिम चल पड़ी। स्थानीय निकायों के अग्निशमन विभाग द्वारा अस्पतालों, ऊँची इमारतों और होटलों सहित व्यवसायिक परिसरों को आग बुझाने के पुख्ता प्रबंध होने का अनापत्ति प्रमाण पत्र दिया जाता है। इसमें लापरवाही  के चलते ही इस तरह की दुर्घटनाएं होती हैं। लेकिन इसे विडंबना ही कहना  होगा कि उसी विभाग को फायर ऑडिट का जिम्मा दिया गया। कुछ दिनों तक तो पूरे प्रदेश में  खूब हल्ला मचा किंतु  कितने प्रतिष्ठानों अथवा भवनों पर अपर्याप्त अग्नि शमन  व्यवस्था  के चलते कारवाई हुई ये शायद ही कोई जानता होगा। 1997 में दिल्ली के एक सिनेमा हाॅल में आग लगने से भी बड़ी संख्या में मौतें हुईं थीं। इस तरह के हादसों के बाद सरकार और उसके मातहत चलने वाली व्यवस्था जिस प्रकार की उदासीनता दिखाती है वह किसी अपराध से कम नहीं है। मृतकों और घायलों को मुआवजा देकर लोगों के गुस्से पर पानी डालने का कर्मकांड होता है। राजनेता भी ऐसे अवसरों पर बनावटी आँसू बहाते दिख जाते हैं। हादसे के फ़ौरन बाद जनता के मन में उठा गुस्सा भी बुलबुले की तरह ही क्षणजीवी होता है। गत रात्रि उ.प्र के झाँसी शहर के मेडिकल कालेज में भी भोपाल के हमीदिया अस्पताल जैसा हादसा घट गया , जब शिशुओं के वार्ड में आग भड़कने से 10 नवजात बच्चे काल के गाल में समा गए। हालांकि वहाँ भर्ती काफी बच्चों को सुरक्षित निकाल लिया गया । राज्य के मुख्यमंत्री के निर्देश पर उपमुख्यमंत्री सरकारी अमले के साथ घटनास्थल पर पहुँच गए और त्रिस्तरीय जाँच की घोषणा कर दी। नियमानुसार मुआवजे का ऐलान भी हो गया। दोषियों को बख्शे नहीं जाने की हुंकार भी भरी जा रही है किंतु अव्यवस्थित व्यवस्था में सुधार करने की ईमानदार सोच के अभाव में किसी सकारात्मक परिणाम की उम्मीद करना बेमानी है। जिन नवजात शिशुओं का जीवन शुरू होते ही आग की लपटों में झुलस गया उनके माता - पिता और परिजनों को उक्त हादसा जो दर्दनाक यादें दे गया उनकी क्षतिपूर्ति कुछ लाख या करोड़ों रुपयों में संभव नहीं है। ये बात पूरी तरह सच है कि इस तरह की दुर्घटना को ऐसा कोई भी इंसान जान बूझकर अंजाम नहीं देता जिसके मन में थोड़ी सी भी मानवीयता है। लेकिन ये बात भी उतनी ही सच है कि उसके पीछे मानवीय लापरवाही अवश्य रहती है। यद्यपि ऐसे  हादसे उन विकसित देशों में भी होते हैं जहाँ सब कुछ चाक - चौबंद होता है। लेकिन वहाँ इस बात की चिंता की जाती है कि उसकी पुनरावृत्ति न हो। साथ ही जो व्यक्ति उसके लिए जिम्मेदार पाया जाता है वह  कितने भी बड़े ओहदे पर हो , दंड से नहीं बच सकता। उ.प्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ काफी सख्त प्रशासक माने जाते हैं। सरकारी अमले में उनका खौफ भी है। लेकिन जिस नौकरशाही के भरोसे सब कुछ छोड़ रखा जाता है वह अपनी जिम्मेदारी के पालन में कितनी ईमानदार है , इस प्रश्न का उत्तर अच्छे - अच्छों के पास नहीं है। और इसीलिए बड़े से बड़े हादसे कुछ दिन तक सुर्खियां बने रहने के बाद विस्मृतियों का शिकार हो जाते हैं। झांसी में हुई दुर्घटना के कारण तो जाँच के बाद ही स्पष्ट हो सकेंगे किंतु प्रारम्भिक पूछताछ में ही ये स्पष्ट हो गया है कि आग बुझाने वाले संयंत्र चले ही नहीं क्योंकि वे एक्सपायर हो चुके थे। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 15 November 2024

आदिवासियों के विकास में उनके नेता ही बाधा बन गए

जनजातीय समुदाय के महान नेता बिरसा मुंडा की 150 वीं जयंती को जनजातीय गौरव दिवस के तौर पर मनाया जाना पूरी तरह उचित है। झारखंड में जन्मे बिरसा ने अपने समुदाय के अधिकारों के लिए लड़ते हुए अंग्रेजी सत्ता को जो चुनौती दी वह इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। जल, जंगल और जमीन से  जनजातीय समुदाय का जुड़ाव केवल अधिकार तक नहीं बल्कि भावनात्मक होता है। विकास की अंधी दौड़ के बावजूद यदि आज भी जो वन्य संपदा बची है उसका श्रेय इस समुदाय को ही है, जिसे आदिवासी भी कहा जाता है। बिरसा मुंडा ने गुलामी के उस दौर में भी शहरी चमक - दमक से दूर रहने वाले वन बंधुओं में जो जागृति उत्पन्न की वह किसी क्रांति से कम नहीं थी। ये बात भी धीरे - धीरे ही सही किंतु सामने आ ही गई कि आजादी के आंदोलन में आदिवासी समुदाय का योगदान भी भरपूर था। जबलपुर में इस समुदाय के ही रघुनाथ शाह  और शंकरशाह को अंग्रेजों ने मौत की सजा दी थी। ऐसे महान देशभक्तों को सम्मानपूर्वक याद करना निश्चित रूप से प्रशंसनीय है। आजादी के बाद से ही दलितों के साथ ही आदिवासी समुदाय को भी आरक्षण के जरिये मुख्य धारा में लाने का अभियान प्रारंभ हो गया था। संसद और विधानसभाओं में उनका प्रतिनिधितित्व सुनिश्चित करने के लिए निर्वाचन क्षेत्र सुरक्षित किये गए। उन्हें सरकार में भी हिस्सेदारी दी जाने लगी। इसके साथ ही आदिवासी क्षेत्रों के विकास पर भी ध्यान दिया गया। वहाँ शिक्षा,  चिकित्सा, सड़क, पेयजल और बिजली आदि की सुविधाएं उपलब्ध कराने विशेष बजट रखा जाने लगा।  आरक्षण का लाभ मिलने से न सिर्फ संसद और विधानसभाओं में उनकी भागीदारी नजर आती है बल्कि प्रशासन में भी आदिवासी महत्वपूर्ण पदों तक पहुँच सके। शासकीय योजनाओं के चलते विकास की रोशनी भी धुंधली ही सही किंतु  दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों तक पहुँच सकी। बीते एक - दो दशकों में उनमें राजनीतिक तौर पर भी  जागृति आई है। अपने अधिकारों के लिए वे भी दलित समुदाय की तरह लामबंद होना सीख गए हैं। अंग्रेजी राज के जमाने में ही ईसाई मिशनरियों ने आदिवासी समुदाय में मतांतरण की मुहिम प्रारंभ की जिसके चलते सुदूर क्षेत्रों में भी चर्च बनते गए। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के जरिये मिशनरियों ने उन्हें ईसाई बनाना शुरू किया। पूर्वोत्तर राज्यों में तो  रिकार्ड ईसाईकरण हुआ। उसके अलावा झारखण्ड, बिहार, उड़ीसा, म.प्र , छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, आंध्र सहित देश के हर उस अंचल में ईसाई मिशनरियों  ने अपना जाल बिछाया जिनमें  आदिवासी बाहुल्य था।  सत्तर के दशक में पनपे  नक्सलवादी गुटों ने भी आदिवासियों पर ही ध्यान केंद्रित किया। उनके मन में व्यवस्था के प्रति विद्रोह के अलावा ये धारणा भरी गई कि वे हिन्दू नहीं हैं। इसके पीछे  आदिवासी समाज को मुख्य धारा से अलग करने का षडयंत्र  ही था। ये मानने में कुछ भी बुराई नहीं है कि ईसाई मिशनरियों के साथ ही नक्सलवादियों ने जनजातीय समुदाय में अपनी पैठ काफी गहराई तक कायम कर ली। लेकिन इसके लिए केवल उनको दोषी देना अन्याय होगा। हिन्दू समाज के साधु - संतों ने इन वन बंधुओं की जो उपेक्षा की उसके कारण ही देश विरोधी ताकतें उनको मुख्यधारा से दूर ले जाने में सफल हुईं। इससे भी बढ़कर आदिवासियों के नाम पर नेता बने लोग कसूरवार हैं जिन्होंने सत्ता तो उनके समर्थन से हासिल की लेकिन उसके बाद उनको उपेक्षित करते हुए अपना और परिवार का विकास किया। नरेन्द्र मोदी सरकार ने भले ही द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति बनाकर आदिवासी समुदाय को गौरव की अनुभूति करने का अवसर दिया हो किंतु जमीन पर स्थिति बहुत ही अलग है। जो लोग आदिवासियों को मिले आरक्षण का लाभ लेकर ऊँचे पदों पर जा बैठे उन्होंने केवल अपने कुनबे का भविष्य संवारने पर ध्यान दिया। इसके चलते शासन और प्रशासन दोनों में कुछ सीमित लोग ही आदिवासी समुदाय का प्रतिनिधित्व करते देखे जा सकते हैं, सर्वोच्च न्यायालय ने जब क्रीमी लेयर का मुद्दा उठाया और आरक्षण का लाभ ले चुके लोगों से दूसरों के लिए त्याग करने की अपेक्षा की तो लाभान्वित वर्ग एकजुट होकर विरोध करने लगा। यही कारण है कि आठ दशक बाद भी आदिवासी समुदाय का जितना विकास होना था नहीं हो सका। जनजातीय गौरव दिवस की धूमधाम के साथ ही इस बात पर भी चिंतन - मनन होना चाहिए कि इस वर्ग के उत्थान के लिए किये गए प्रयासों का समुचित लाभ उस तक क्यों नहीं पहुंचा ? जब तक इस प्रश्न का उत्तर तलाशकर उचित समाधान नहीं निकलता तब तक आदिवासी समाज को मुख्यधारा में लाने  का उद्देश्य पूरा नहीं हो सकेगा और ईसाई मिशनरियों के साथ ही नक्सलियों को भी देश को कमजोर करने का अवसर मिलता रहेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 14 November 2024

झोपड़ बस्तियाँ विकास के दावों पर सवालिया निशान हैं


देश की आर्थिक राजधानी मुंबई  अनेक बातों के लिए चर्चा में रहती है । अरब सागर के किनारे बसे मुंबई का फिल्म उद्योग अभिनय करने के इच्छुक युवक - युवतियों को यहाँ खींच लाता है। पूरे देश से आकर बसे लोगों ने इस महानगर को लघु भारत का रूप दे दिया है। एक समय था जब शिवसेना जैसी राजनीतिक पार्टी ने पहले दक्षिण भारतीय और बाद में उत्तर भारतीयों के विरुद्ध बेहद आक्रामक रवैया दिखाया। यहां तक कि नौकरी के लिए परीक्षा और साक्षात्कार के लिए आने वाले अन्य राज्यों के युवाओं पर हमले भी हुए। हालांकि बाद में वोट बैंक के दबाववश वह मुहिम ठण्डी पड़ती गई। इसीलिए  आज की  मुंबई महाराष्ट्र की राजधानी होते हुए भी केवल मराठियों की नहीं रही। उद्योग -  व्यवसाय के सिलसिले में पूरे देश के उद्यमी इस महानगर में आकर अपना भाग्य चमकाते हैं। देश और दुनिया के हजारों  धन कुबेर यहाँ बसे हुए हैं। लेकिन दूसरी तरफ इस नगर में लाखों लोग ऐसे भी हैं जिनके पास रहने का स्थान न होने से वे फुटपाथ पर ही गुजारा करने मजबूर हैं। इसी तरह  मुंबई की तमाम शान - शौकत के साथ यहाँ एशिया की सबसे बड़ी और विश्व की तीसरे नम्बर की झुग्गी बस्ती धारावी भी है जिसमें 60 हजार परिवारों के 10 लाख लोग बेहद दयनीय हालातों में रहते हैं । धारावी अपने आप में एक शहर है जिसमें लोग रहते ही नहीं बल्कि यहाँ करोड़ों का कारोबार भी होता है। सैकड़ों छोटे - छोटे कल -  कारखाने भी यहाँ से संचालित होते हैं। इस झोपड़ बस्ती में अपराधों को भी संरक्षण मिलता है। धारावी में माफिया राज भी धड़ल्ले से चलता है। कुल मिलाकर धारावी इस महानगर के माथे पर कलंक की तरह है जिसे मिटाने के लिए लम्बे समय से योजनाएं बनाई जाती रहीं किंतु नतीजा शून्य ही रहा। राज्य और केंद्र में सरकारें बदलती रहीं किंतु उसका दुर्भाग्य दूर नहीं हो सका तो उसका बड़ा कारण राजनेताओं में ईमानदारी और इच्छाशक्ति का अभाव ही रहा। कुछ बड़े उद्योगपतियों ने भी धारावी  के उद्धार की पहल कि परंतु वह भी राजनीतिक खींचातानी में उलझकर रह गई। डा. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में मुंबई को चीन के शंघाई शहर जैसा व्यवस्थित बनाने के ख्वाब भी दिखाये गये किंतु वे साकार नहीं हो सके। महाराष्ट्र विधानसभा के मौजूदा चुनाव में धारावी का विकास बड़ा मुद्दा बना हुआ है। इसके पुनरोद्धार के लिए अडानी उद्योगसमूह को ठेका मिला है। धारावी में स्थायी रूप से बसे लोगों को फ्लैट बनाकर देने का प्रावधान किया गया है। हालांकि अडानी को काम मिलने का गैर भाजपा पार्टियां विरोध भी कर  रही हैं। ये भी सुनने में आ रहा है कि मुंबई का भू माफिया भी धारावी को विकसित नहीं होने देना चाहता जिसके पीछे ज्ञात - अज्ञात अनेक कारण हैं। दरअसल इस बस्ती में कुछ माफिया सरगनाओं के कब्जे में बड़ी संख्या में घर हैं जिनका वे किराया वसूलते हैं। उनको डर है कि धारावी से झोपड़ पट्टियां हटने से उनकी आय का स्रोत बंद हो जाएगा। विरोध का एक कारण धारावी का अपराधियों की कर्म भूमि होना भी हैं। इसकी सघनता इतनी ज्यादा है कि पुलिस के लिए यहाँ चल रही अपराधिक गतिविधियों को रोक पाना और उनसे जुड़े लोगों को पकड़ना बेहद कठिन है। ये भी कहा जाता है की धारावी मुंबई पुलिस की अवैध कमाई का बड़ा जरिया है। यही वजह है कि राज्य और केंद्र की सरकारों द्वारा समय - समय पर धारावी को विकसित करने की जो योजनाएं बनाई गईं वे कागजों से आगे नहीं बढ़ सकीं। ऐसे में यदि वर्तमान महायुति सरकार सत्ता में लौटी तब धारावी के विकास की संभावना जीवित रहेगी किंतु  महा विकास अगाड़ी सत्ता में आई तो अडानी से खुन्नस के चलते रोड़े अटकाए जाने की आशंका प्रबल हो जाएगी। सही बात ये है कि  धारावी जैसी विशाल झोपड़ बस्ती मुंबई के अलावा अन्य किसी महानगर में भले न हो किंतु छोटे  आकार में ही सही उनकी मौजूदगी वहाँ है। ये बात निःसंकोच कही जा सकती है कि ये  झोपड़ बस्तियाँ विकास के समूचे दावों की पोल खोल देती हैं। साथ ही राजनेताओं के निकम्मेपन का जीता - जागता प्रमाण भी हैं जो सत्ता में आते ही अपने रहने के लिए तो शानदार घर बनवा लेते हैं किंतु गरीबों की बदहाली दूर करने में उनको कोई रुचि नहीं है। नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री आवास योजना लागू कर साधनहीन जनता की आवास समस्या दूर करने की जो पहल की उसके अच्छे परिणाम निकल रहे हैं। लेकिन उनके निर्माण में गुणवत्ता का जबरदस्त अभाव है। बेहतर हो धारावी के विकास जैसी योजना पूरे देश के लिए बने और उस पर तेजी से काम हो । वरना सबका साथ, सबका विश्वास का नारा भी गरीबी हटाओ की तरह झांसेबाजी में बदलकर रह जाएगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 13 November 2024

सैकड़ों राजाओं की जगह पैदा हो गए हजारों नेता


महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे इस बात से भन्नाए हुए हैं कि चुनाव आयोग ने उनके बैग की तलाशी ले ली। उन्होंने इसे अपनी तौहीन मानते हुए कहा कि पहली बार उनके साथ ऐसा हुआ । साथ ही आयोग को चुनौती दी कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के बैग की जांच करने की हिम्मत भी दिखाए। जवाब में आयोग ने बताया कि वह श्री शाह के साथ ही भाजपा अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा के बैग की तलाशी भी कर चुका है। ये जानकारी भी आई कि ऐसी ही जाँच केंद्रीय मंत्री नितिन गड़करी और महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस की भी की जा चुकी है। आचार संहिता लगने के बाद चुनाव आयोग के निर्देश पर पुलिस राह चलते वाहनों को रोककर जाँच करती है कि कहीं उनमें नगद रुपये या शराब तो नहीं ले जाई जा रही। आम जनता और व्यापारी इससे परेशान भी होते हैं । लेकिन  साधारण से राजनीतिक नेता तक को  ये बर्दाश्त नहीं होता कि उसके साथ सामान्य नागरिक जैसा व्यवहार हो। चुनाव के समय  शासन में बैठे मंत्रियों तक को विशिष्ट सुविधाओं से वंचित होना पड़ता है। सरकारी वाहन और विश्राम गृह की व्यवस्था भी स्थगित रहती है।  चूंकि काले धन का उपयोग चुनाव में धड़ल्ले से होता है लिहाजा उसे रोकने के लिए नेताओं और आम जनता के वाहनों और सामान की तलाशी ली जाती है। इस दौरान बड़ी मात्रा में नगदी बरामद भी होती रही है। हालांकि इसके लिए कितने लोग दंडित हुए ये पता नहीं चलता। इसीलिए इस कारवाई को रस्म अदायगी माना जाता है। आयकर और ईडी भी चुनाव के समय छापेमारी  करते हैं। उसका उद्देश्य भी काले धन की पतासाजी करना ही  है किंतु विपक्ष का आरोप होता है कि सरकार इन संस्थाओं के जरिये उसके समर्थकों को प्रताड़ित करती है। वहीं सरकार इसे सामान्य प्रक्रिया  बताकर बचाव करती है।लेकिन इस सबके बीच सवाल उठता है कि श्री ठाकरे को उनके बैग की जाँच पर इतना बुरा क्यों लगा ? उनका ये कहना कि जीवन में पहली बार ऐसा हुआ इस बात का परिचायक है कि वे अपने को कानून से ऊपर मानते हैं। पहले कभी ऐसा नहीं हुआ इसलिए इस बार होने पर  अपमान महसूस होना ही वह सामंती मानसिकता है जिससे अधिकांश राजनीतिक नेता ग्रसित हैं। इसका प्रगटीकरण केवल चुनावों के दौरान ही होता हो ऐसा नहीं है। आये दिन कहीं न कहीं नेतागण अपनी शान में गुस्ताखी का रोना रोते हुए नजर आते हैं। टोल नाके में उनसे टोल मांगे जाने पर तोड़ - फोड़ और मारपीट सामान्य बात है। यातायात नियमों को तोड़ना उनके लिए प्रतिष्ठा सूचक होता है। यदि किसी  पुलिस वाले ने उनका चालान करने का दुस्साहस किया तो नेताजी उसकी वर्दी उतरवाने की धमकी देकर रौब दिखाने से बाज नहीं आते। सत्ता में बैठे महानुभावों की अकड़ देखकर दूसरे भी उसकी नकल करने में पीछे नहीं रहते। इस सबका परिणाम ही है कि लोकतंत्र  के बाद भी एक बड़ा वर्ग अपने को राज परिवार का सदस्य मानकर अहंकार में डूबा रहता है।  वाहन की  नंबर प्लेट पर नंबर की बजाय अपने पद का नाम लिखकर  श्रेष्ठता प्रदर्शित करना आम बात है। उद्धव इस प्रकार की अकड़ दिखाने वाले अकेले नेता नहीं हैं। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो राजनीतिक बिरादरी के ज्यादातर लोग नव सामंतवाद के जीवंत प्रतीक हैं। अभी हाल में केंद्रीय मंत्री वीरेंद्र खटीक जबलपुर आये थे। उन दिनों दीपावली की खरीदी की वजह से बाजारों में काफी भीड़ होने से चार पहिया तो क्या दो पहिया वाहन ले जाना तक कठिन था। मंत्री जी ने बजाय अपना रुतबा दिखाने के पार्टी कार्यकर्ताओं के स्कूटर / मोटर साइकिलों पर लोगों के घर जाने का निर्णय लिया और बिना तामझाम के कब आये कब चले गए किसी को पता नहीं चला। श्री खटीक अपने निर्वाचन क्षेत्र में भी इसी तरह लोगों के बीच आते - जाते हैं। सांसद रहते हुए स्टेशन से ऑटो में आते हुए उन्हें देखा जाना सामान्य बात थी। ऐसे नेताओं की तारीफ उनके संगी - साथी ही नहीं बल्कि विरोधी भी करते हैं किंतु जब अनुसरण की बात उठती है तो कन्नी काट लेते हैं। राहुल गाँधी और शिवराज सिंह चौहान के रेस्टारेंट में भोजन करने के फोटो समाचार बन जाते हैं , जबकि इसमें अनोखा क्या है ? इंदिरा गाँधी ने  जब 500 से अधिक राजा - महाराजाओं के प्रीवीपर्स बंद किये तो उसे समाजवाद की दिशा में बड़ा कदम माना गया था किंतु आज नेताओं की शक्ल में जहाँ देखो वहाँ नव सामंत नजर आते हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 12 November 2024

महाराष्ट्र के चुनाव में अनेक नेताओं का राजनीतिक भविष्य दांव पर


महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव पर पूरे देश की निगाह लगी है क्योंकि  वह अनेक सितारों से भरी किसी हिन्दी फिल्म जैसा एहसास करवा रहा है। इसका परिणाम नई सरकार का फैसला ही नहीं बल्कि अनेक राजनेताओं का राजनीतिक भविष्य भी तय कर देगा। मुख्य रूप से  वे हैं शरद पवार, उद्धव ठाकरे, अजीत पवार और एकनाथ शिंदे। भाजपा नेता देवेंद्र फड़नवीस के लिए भी ये  महत्वपूर्ण चुनाव है क्योंकि यदि महायुति को बहुमत मिला और शिंदे गुट अच्छी खासी सीटें जीत गया तब भाजपा श्री फड़नवीस को मुख्यमंत्री बनाने का खतरा शायद ही मोल ले क्योंकि वैसा करने पर श्री शिंदे भी पाला बदल सकते हैं। और यदि केंद्रीय नेतृत्व ने उन्हें महाराष्ट्र से हटाकर दिल्ली बुलाया तब प्रदेश में उनका स्थान लेने अन्य नेता सामने आये बिना नहीं रहेंगे। चिंता की लकीरें श्री शिंदे के माथे पर भी कम नहीं हैं क्योंकि सत्ता गई तब वे कितने समय तक अपने साथ आये नेताओं और  शिवसैनिकों को अपने पाले में रख पाएंगे, ये बड़ा सवाल है। यद्यपि इस तरह की चिंता उद्धव ठाकरे को भी सोने नहीं दे रही । उन्हें  डर है कि  परिणाम  महा विकास अगाड़ी के विपरीत गए तब मातोश्री का  रहा - सहा दबदबा भी जाता रहेगा और जो शिवसैनिक अब तक उनके प्रति वफादार बने हुए हैं वे भी शिंदे गुट के साथ जाने में नहीं हिचकेंगे। ये आशंका भी उन्हें सता रही है कि बहुमत मिलने की स्थिति में भी पवार और कांग्रेस इस बार उनकी ताजपोशी नहीं होने देंगे और इसीलिए अगाड़ी ने किसी को भावी  मुख्यमंत्री के तौर पर पेश नहीं किया। अपने भविष्य को लेकर चिंता पवार परिवार में भी कम नहीं है क्योंकि कोई भी गठबंधन जीते चाचा और भतीजे में से किसी एक के सियासी सफर का  अंत  होना तय है। सबसे ज्यादा खतरे में हैं अजीत क्योंकि उनको विधानसभा में जाने से रोकने के लिए शरद पवार ने जिस प्रत्याशी को उतारा है वह उनका भतीजा है। इस दांव से बुजुर्ग पवार ने लोकसभा चुनाव में अजीत द्वारा उनकी बेटी सुप्रिया सुले के विरुद्ध पत्नी को लड़ाये  जाने का बदला लिया है। लेकिन अजीत को सफलता मिली तो वे पवार परिवार के अघोषित मुखिया बन जाएंगे। यद्यपि उनका राजनीतिक वर्चस्व इस बात पर निर्भर करेगा कि वे कितने विधायक जितवाकर लाते हैं। यदि उनका प्रदर्शन लोकसभा जैसा रहा तब सत्ता में आने के बाद भी भाजपा उनसे छुटकारा पाने में देर नहीं करेगी। अजीत के कारण उसे अपने कार्यकर्ताओं के बीच भी नाराजगी झेलनी पड़ रही है। भ्रष्टाचार के आरोप में जेल जा चुके  नवाब मलिक को टिकिट देकर अजीत ने भाजपा नेतृत्व की आपत्ति को जिस तरह अनसुना किया उसके बाद श्री फड़नवीस को सार्वजनिक रूप से कहना पड़ा कि भाजपा कार्यकर्ता उस सीट पर उनका काम नहीं करेंगे। इस प्रकार महाराष्ट्र का चुनाव राजनीतिक दलों से अधिक उनके  नेताओं के गले की फांस बन गया है। काँटे की टक्कर माने जा रहे इस मुकाबले में एक और व्यक्ति है जो किसका खेल बिगाड़ेगा ये फ़िलहाल किसी की समझ में नहीं आ रहा और वह है मराठा आरक्षण के आंदोलन का नेतृत्व करने वाले मनोज जराँगे पाटिल । उनका अनशन शिंदे सरकार के आश्वासन के बाद टूटा था किंतु आरक्षण की मांग मंजूर नहीं होने पर उन्होंने चुनाव में प्रत्याशी उतारने का ऐलान कर दिया जिससे महायुति में राहत थी। मनोज ने तीसरा मोर्चा  बनाने भी हाथ पाँव मारे लेकिन सफलता नहीं मिलने पर ये कहते हुए मैदान छोड़ दिया कि अकेले एक जाति के बल पर चुनाव जीतना संभव नहीं है। उनके रुख पर सबकी नजर टिकी हुई है किंतु गत दिवस उन्होंने भाजपा के विरुद्ध बयान देकर  शिंदे सरकार गिराने की बात तो कही किंतु साथ में ये भी जोड़ दिया कि कोई जीते - हारे उन्हें फर्क़ नहीं पड़ेगा।  श्री जराँग ये भी बोल गए कि श्री फड़नवीस जातिवादी हैं और मराठाओं से चिढ़ते हैं। दूसरी तरफ शरद पवार को वे भरोसे लायक नहीं मानते। महाराष्ट्र में मराठा जाति राजपूतों के समकक्ष मानी जाती है। श्री जराँगे  का दावा है पहले उनको आरक्षण मिलता था।  आरक्षण की सीमा 50 फीसदी तक होने से अब मांग हो रही है कि उसे बढ़ाया जाए। हालांकि कोई भी पार्टी खुलकर मराठा आरक्षण का समर्थन नहीं कर पा रही क्योंकि वैसा करने से दूसरी जातियाँ नाराज हो सकती हैं। इस प्रकार इस चुनाव में मनोज के दबाव और प्रभाव की भी परीक्षा हो जाएगी।अंदर की बात ये है कि शरद पवार खुद को सबसे बड़ा मराठा नेता मानते हैं और उन्हें ये बर्दाश्त नहीं है कि कोई और इस जाति का चौधरी बने। इस प्रकार ये चुनाव उक्त शख्सियतों के राजनीतिक भविष्य का फैसला करने वाला होगा। यद्यपि शरद जी महाराष्ट्र के सबसे वरिष्ट नेता हैं किंतु  उनकी स्थिति अब बूढ़े शेर जैसी हो गई है। इस चुनाव में बाल ठाकरे के रुतबे और प्रमोद महाजन के राजनीतिक कौशल का अभाव भी महसूस हो रहा है।  दांव पर तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस नेता राहुल गाँधी की प्रतिष्ठा भी लगी है क्योंकि हरियाणा चुनाव के बाद दोनों के लिए महाराष्ट्र की बाजी जीतना और जरूरी हो गया है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी