Tuesday, 12 November 2024

महाराष्ट्र के चुनाव में अनेक नेताओं का राजनीतिक भविष्य दांव पर


महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव पर पूरे देश की निगाह लगी है क्योंकि  वह अनेक सितारों से भरी किसी हिन्दी फिल्म जैसा एहसास करवा रहा है। इसका परिणाम नई सरकार का फैसला ही नहीं बल्कि अनेक राजनेताओं का राजनीतिक भविष्य भी तय कर देगा। मुख्य रूप से  वे हैं शरद पवार, उद्धव ठाकरे, अजीत पवार और एकनाथ शिंदे। भाजपा नेता देवेंद्र फड़नवीस के लिए भी ये  महत्वपूर्ण चुनाव है क्योंकि यदि महायुति को बहुमत मिला और शिंदे गुट अच्छी खासी सीटें जीत गया तब भाजपा श्री फड़नवीस को मुख्यमंत्री बनाने का खतरा शायद ही मोल ले क्योंकि वैसा करने पर श्री शिंदे भी पाला बदल सकते हैं। और यदि केंद्रीय नेतृत्व ने उन्हें महाराष्ट्र से हटाकर दिल्ली बुलाया तब प्रदेश में उनका स्थान लेने अन्य नेता सामने आये बिना नहीं रहेंगे। चिंता की लकीरें श्री शिंदे के माथे पर भी कम नहीं हैं क्योंकि सत्ता गई तब वे कितने समय तक अपने साथ आये नेताओं और  शिवसैनिकों को अपने पाले में रख पाएंगे, ये बड़ा सवाल है। यद्यपि इस तरह की चिंता उद्धव ठाकरे को भी सोने नहीं दे रही । उन्हें  डर है कि  परिणाम  महा विकास अगाड़ी के विपरीत गए तब मातोश्री का  रहा - सहा दबदबा भी जाता रहेगा और जो शिवसैनिक अब तक उनके प्रति वफादार बने हुए हैं वे भी शिंदे गुट के साथ जाने में नहीं हिचकेंगे। ये आशंका भी उन्हें सता रही है कि बहुमत मिलने की स्थिति में भी पवार और कांग्रेस इस बार उनकी ताजपोशी नहीं होने देंगे और इसीलिए अगाड़ी ने किसी को भावी  मुख्यमंत्री के तौर पर पेश नहीं किया। अपने भविष्य को लेकर चिंता पवार परिवार में भी कम नहीं है क्योंकि कोई भी गठबंधन जीते चाचा और भतीजे में से किसी एक के सियासी सफर का  अंत  होना तय है। सबसे ज्यादा खतरे में हैं अजीत क्योंकि उनको विधानसभा में जाने से रोकने के लिए शरद पवार ने जिस प्रत्याशी को उतारा है वह उनका भतीजा है। इस दांव से बुजुर्ग पवार ने लोकसभा चुनाव में अजीत द्वारा उनकी बेटी सुप्रिया सुले के विरुद्ध पत्नी को लड़ाये  जाने का बदला लिया है। लेकिन अजीत को सफलता मिली तो वे पवार परिवार के अघोषित मुखिया बन जाएंगे। यद्यपि उनका राजनीतिक वर्चस्व इस बात पर निर्भर करेगा कि वे कितने विधायक जितवाकर लाते हैं। यदि उनका प्रदर्शन लोकसभा जैसा रहा तब सत्ता में आने के बाद भी भाजपा उनसे छुटकारा पाने में देर नहीं करेगी। अजीत के कारण उसे अपने कार्यकर्ताओं के बीच भी नाराजगी झेलनी पड़ रही है। भ्रष्टाचार के आरोप में जेल जा चुके  नवाब मलिक को टिकिट देकर अजीत ने भाजपा नेतृत्व की आपत्ति को जिस तरह अनसुना किया उसके बाद श्री फड़नवीस को सार्वजनिक रूप से कहना पड़ा कि भाजपा कार्यकर्ता उस सीट पर उनका काम नहीं करेंगे। इस प्रकार महाराष्ट्र का चुनाव राजनीतिक दलों से अधिक उनके  नेताओं के गले की फांस बन गया है। काँटे की टक्कर माने जा रहे इस मुकाबले में एक और व्यक्ति है जो किसका खेल बिगाड़ेगा ये फ़िलहाल किसी की समझ में नहीं आ रहा और वह है मराठा आरक्षण के आंदोलन का नेतृत्व करने वाले मनोज जराँगे पाटिल । उनका अनशन शिंदे सरकार के आश्वासन के बाद टूटा था किंतु आरक्षण की मांग मंजूर नहीं होने पर उन्होंने चुनाव में प्रत्याशी उतारने का ऐलान कर दिया जिससे महायुति में राहत थी। मनोज ने तीसरा मोर्चा  बनाने भी हाथ पाँव मारे लेकिन सफलता नहीं मिलने पर ये कहते हुए मैदान छोड़ दिया कि अकेले एक जाति के बल पर चुनाव जीतना संभव नहीं है। उनके रुख पर सबकी नजर टिकी हुई है किंतु गत दिवस उन्होंने भाजपा के विरुद्ध बयान देकर  शिंदे सरकार गिराने की बात तो कही किंतु साथ में ये भी जोड़ दिया कि कोई जीते - हारे उन्हें फर्क़ नहीं पड़ेगा।  श्री जराँग ये भी बोल गए कि श्री फड़नवीस जातिवादी हैं और मराठाओं से चिढ़ते हैं। दूसरी तरफ शरद पवार को वे भरोसे लायक नहीं मानते। महाराष्ट्र में मराठा जाति राजपूतों के समकक्ष मानी जाती है। श्री जराँगे  का दावा है पहले उनको आरक्षण मिलता था।  आरक्षण की सीमा 50 फीसदी तक होने से अब मांग हो रही है कि उसे बढ़ाया जाए। हालांकि कोई भी पार्टी खुलकर मराठा आरक्षण का समर्थन नहीं कर पा रही क्योंकि वैसा करने से दूसरी जातियाँ नाराज हो सकती हैं। इस प्रकार इस चुनाव में मनोज के दबाव और प्रभाव की भी परीक्षा हो जाएगी।अंदर की बात ये है कि शरद पवार खुद को सबसे बड़ा मराठा नेता मानते हैं और उन्हें ये बर्दाश्त नहीं है कि कोई और इस जाति का चौधरी बने। इस प्रकार ये चुनाव उक्त शख्सियतों के राजनीतिक भविष्य का फैसला करने वाला होगा। यद्यपि शरद जी महाराष्ट्र के सबसे वरिष्ट नेता हैं किंतु  उनकी स्थिति अब बूढ़े शेर जैसी हो गई है। इस चुनाव में बाल ठाकरे के रुतबे और प्रमोद महाजन के राजनीतिक कौशल का अभाव भी महसूस हो रहा है।  दांव पर तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस नेता राहुल गाँधी की प्रतिष्ठा भी लगी है क्योंकि हरियाणा चुनाव के बाद दोनों के लिए महाराष्ट्र की बाजी जीतना और जरूरी हो गया है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

No comments:

Post a Comment