Tuesday, 26 November 2024

संविधान की आड़ में समाज को टुकड़ों में बांटने का षडयंत्र चिंता का विषय


आज भारत के संविधान की 75 वीं वर्षगांठ है। 26 नवम्बर 1949 को संविधान सभा ने इसके प्रारूप को स्वीकृत किया जिसके बाद 26 जनवरी 1950 को यह विधिवत लागू हुआ । संसदीय प्रजातंत्र उसी संविधान द्वारा प्रदत्त है। इसमें उल्लिखित मौलिक अधिकार  प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कानून के समक्ष समानता प्रदान करते हैं। समाजवाद को अपनी प्रस्तावना में स्थान देने के बाद भी हमारे संविधान ने निजी संपत्ति के अधिकार को मान्यता प्रदान की। विश्व के सबसे बड़े  लिखित संविधान   का निर्माण जिन महानुभावों ने किया वे चूंकि समाज के प्रत्येक वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाले थे इसीलिए उसे किसी एक व्यक्ति या विचारधारा के बजाय हम भारत के लोगों द्वारा निर्मित बताकर आत्मप्रशंसा से बचा गया। हमारे साथ ही आजाद हुए पाकिस्तान ने भी अपना संविधान बनाया किंतु उसे इतनी मर्तबा तोड़ा - मरोड़ा गया कि उसकी मौलिकता दफन हो गई। बदलाव तो भारत के संविधान में भी बहुत हुए और आगे भी होंगे लेकिन सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक विषमता के बावजूद भारत की एकता और अखंडता अब तक यदि अक्षुण्ण है तो इसका श्रेय देश की जनता को है जो अपनी अनगिनत और अनसुलझी परेशानियों के बाद भी धैर्य का परिचय देती आई है। वरना हमारे सभी पड़ोसी देशों में जनता का गुस्सा तख्ता पलट के रूप में देखने मिला। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र होने का गौरव प्राप्त हमारी व्यवस्था संविधान आधारित है इसलिए किसी व्यक्ति या  विचारधारा का प्रभुत्व स्वीकार्य नहीं है। हालांकि  ऐसा करने का दुस्साहस हुआ किंतु जनता ने  उस कोशिश को नाकाम कर दिया और वह भी शांतिपूर्ण तरीके से अपने मताधिकार का प्रयोग करते हुए। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है 1977 का लोकसभा चुनाव। 1975 में अलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा उनका चुनाव अवैध घोषित किये जाने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने लोकतंत्र को कुचलकर संविधान की मर्यादा भंग करने की कोशिश की थी। विपक्ष को जेल में ठूंस दिया गया। समाचार माध्यमों पर सेंसर लगाकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को खत्म करने जैसा पाप हुआ। मौलिक अधिकार निलंबित कर दिये गए और अनुशासन पर्व के नाम पर देश को तानाशाही के शिकंजे में कसने की चाल चल दी गई। और कोई देश होता तो  उस अलोकतांत्रिक कदम के विरुद्ध वैसा ही कुछ होता जैसा पाकिस्तान, बांग्ला देश, म्यांमार और श्रीलंका में देखने मिला। लेकिन जनता ने संयम  से काम लेते हुए देश को गृह युद्ध से बचा लिया। जब श्रीमती गाँधी को लगा कि  विपक्ष को जेल भेजने पर जनता ने किसी प्रकार का रोष नहीं दिखाया तब उन्होंने 1977 में चुनाव का ऐलान करते हुए तानाशाही पर लोकशाही की मोहर लगवाने का दांव चला किंतु  19 महीने तक शांत रही जनता ने मतदान के जरिये क्रांति कर दी। इंदिरा जी की सत्ता तो गई ही वे खुद भी चुनाव हार गईं। उसके बाद से किसी शासक ने वह गलती तो नहीं दोहराई किंतु संघीय ढांचे के साथ ही सामाजिक  समरसता को छिन्न भिन्न करने का जो खतरनाक अभियान बीते तीन दशकों से देखने मिल रहा है वह चिंताजनक है। सत्ता हासिल करने के लिए देशहित को बलि चढाए जाने का अपराध जिस बेखौफ तरीके से हो रहा है उससे देश की एकता और अखंडता पर खतरा मंडरा रहा है। हाल ही में संपन्न लोकसभा चुनाव में संविधान की आड़ लेकर समाज में ज़हर फैलाने का दुष्कृत्य किसी षडयंत्र का हिस्सा ही था। समाज को जाति के नाम पर टुकड़े - टुकड़े करने का पाप उन्हीं लोगों द्वारा किया जा रहा है जो विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान की शपथ लेते हैं। संसद में जिस प्रकार अवरोध उत्पन्न किये जाते हैं वह संविधान का अपमान नहीं तो क्या है ? दुःख की बात ये है कि सभी राजनीतिक दल इसके लिए बराबरी से दोषी हैं। आज़ादी के 77 साल बीतने के बाद भी भाषा और प्रांत के बीच जो विवाद उत्पन्न किये जाते हैं वे संविधान की मूल भावना के विरुद्ध हैं। कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है के नारे को अर्थहीन साबित करने का सुनियोजित प्रयास हो रहा है। संविधान में जिस लोक कल्याणकारी राज्य की कल्पना की गई थी वह कितनी साकार हो सकी इस पर गंभीर विमर्श आज की सबसे बड़ी जरूरत है। एक तरफ देश के करोड़ों लोग रोटी, कपड़ा और मकान जैसी मूलभूत जरूरतों से वंचित हैं, वहीं दूसरी तरफ एक वर्ग समृद्धि के कीर्तिमान बनाता जा रहा है। ऊपरी तौर पर  देखें तो भारत, दुनिया की बड़ी आर्थिक शक्ति बनने की ओर बढ़ता नजर आता है किंतु आर्थिक विषमता के चलते जमीनी स्थितियाँ असंतोषजनक हैं। केंद्र और राज्यों की सरकारें वैसे तो जनता के लिए खजाने खोलने में जुटी हुई हैं । ये तात्कालिक हल भले हो किंतु इससे असमानता को मिटाने में सफलता नहीं मिलने वाली। लोकतंत्र को बाजार और मतदाता को उपभोक्ता समझने का जो चलन आजकल प्रचलित है वह संविधान निर्माताओं की कल्पना के सर्वथा विपरीत है। इसलिए संविधान निर्माण के 75 साल पूरे होने के अवसर को रस्म अदायगी तक सीमित न रखते हुए लोकतंत्र को उसका वास्तविक स्वरूप प्रदान करने के बारे में राष्ट्रीय सहमति बनाने की जरूरत है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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