चुनाव आयोग द्वारा प्रदत्त जानकारी के अनुसार गत दिवस संपन्न दो राज्यों में विधानसभा चुनाव के दौरान जप्त की गई नगदी का आंकड़ा 2019 की तुलना में काफी अधिक है। चुनाव में उपयोग हुआ जो काला धन , शराब , मादक पदार्थ और उपहार सामग्री चुनाव आयोग की पकड़ से बाहर रहीं , उनका मूल्य कई गुना अधिक होगा। इससे स्पष्ट होता है कि आयोग की सख्ती के बाद भी मतदाताओं को लुभाने या सीधे तौर पर कहें तो खरीदने के लिए नगद राशि , शराब और अन्य चीजें बांटने जैसे तरीकों में रत्ती भर भी सुधार नहीं हुआ। वह भी तब, जब अचार संहिता घोषित होते ही प्रशासन जबर्दस्त घेराबंदी करने लगता है। वाहनों को रोककर छापेमारी जैसी कार्रवाई भी की जाती है जिसके परिणामस्वरूप करोड़ों रुपयों की जप्ती हो सकी। चुनाव के दौरान आती रहीं खबरों के अनुसार जमकर नगद रुपया , शराब आदि बांटी गई। मतदान के कुछ घंटों पूर्व तक गरीबों की बस्तियों में उक्त अवैधानिक कार्य खुलकर होते रहे। इसके लिए किसी एक पार्टी या प्रत्याशी को कटघरे में खड़ा करना तो अनुचित होगा क्योंकि चुनाव जीतने के लिए इस तरह के तरीके आम हो चुके हैं है। वाहनों की जो संख्या प्रत्याशी चुनाव कार्यालय को लिखकर देते हैं उससे ज्यादा का उपयोग होता है क्योंकि मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल निर्दलीय प्रत्याशियों के कोटे से अपने वाहन चलवाते हैं। सबसे बड़ा फर्जीबाड़ा तो प्रत्याशियों के खर्च का ब्यौरा है । चुनाव के दौरान ही उन्हें बीच - बीच में उसकी जानकारी और मतदान के बाद चार्टर्ड अकाउंटेंट से ऑडिट करवाकर कुल खर्च का विवरण निर्वाचन अधिकारी के पास जमा करना होता है। जिसे देखकर हंसी आती है। निर्दलीय उम्मीदवार कम खर्च दर्शाएं तो बात समझ में आती है किंतु भाजपा और कांग्रेस सहित अन्य दलों के प्रत्याशी जितना कम खर्च दर्शाते हैं उसके सत्यापन की कोई सूक्ष्म व्यवस्था नहीं है । जब कोई चुनाव याचिका पेश होती है तभी खर्च संबंधी विवरण का संज्ञान लिया जाता है। सही बात ये है कि चुनाव के दौरान तो सख्ती ऊपरी तौर पर नजर आती है किंतु हकीकत ये है कि चुनाव आयोग और राजनीतिक दलों के बीच तुम डाल - डाल तो हम पात - पात वाली स्थिति है। इसीलिए चुनावों में बेतहाशा खर्च रोकने के उपाय उम्मीद पर खरे नहीं उतरते। और फिर नगदी , शराब , नशीले पदार्थ और उपहार सामग्री जिनसे जप्त होती है उनमें से कितनों को और कितनी सजा मिली ये रहस्य है। पकड़े जाने वाले कब छूट जाते हैं , पता ही नहीं चलता। नतीजा ये है कि चुनाव में काला धन , शराब और सामान बांटने वाले पूरी तरह से बेखौफ रहते हैं। मतदान के समय भले ही अन्य राज्यों का पुलिस बल तैनात किया जाता है किंतु प्रारंभिक दौर में तो स्थानीय प्रशासन और पुलिस ही चूंकि चुनाव का संचालन करते हैं जिनका नेताओं और शराब माफिया से रिश्ता बताने की जरूरत नहीं हैं । दरअसल वे पूरी तरह ईमानदार हों तो चुनाव में अपनाए जाने वाले अनुचित और अवैध तरीकों पर काफी हद तक रोक लग ही सकती है। वर्तमान स्थिति वाकई हास्यास्पद है क्योंकि जिस बेरहमी से प्रत्याशी और राजनीतिक दल चुनाव में पैसा लुटाते हैं उसका आधा भी आयोग को दिए जाने वाले विवरण में नहीं दर्शाया जाता। स्व.टी. एन.शेषन ने चुनाव सुधार का जो हौसला दिखाया था उसे आयोग द्वारा आगे तो बढ़ाया गया किंतु उसके जितने दावे किये जाते हैं उतने जमीन पर नजर नहीं आने से चुनावी खर्च बढ़ता जा रहा है। यही वजह है कि राजनीति में आने के इच्छुक बुद्धिजीवी और पेशेवर लोगों को मजबूरन किसी पार्टी का दामन थामना पड़ता है । लोकतंत्र की सार्थकता तभी है जब समाज का वह वर्ग भी चुनाव लड़ने की हिम्मत जुटा सके जिसके पास बेतहाशा खर्च का सामर्थ्य नहीं है। अन्यथा चुनावों का जो स्वरूप सामने आने लगा है वह और विकृत होता जाएगा।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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