Friday, 15 November 2024

आदिवासियों के विकास में उनके नेता ही बाधा बन गए

जनजातीय समुदाय के महान नेता बिरसा मुंडा की 150 वीं जयंती को जनजातीय गौरव दिवस के तौर पर मनाया जाना पूरी तरह उचित है। झारखंड में जन्मे बिरसा ने अपने समुदाय के अधिकारों के लिए लड़ते हुए अंग्रेजी सत्ता को जो चुनौती दी वह इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। जल, जंगल और जमीन से  जनजातीय समुदाय का जुड़ाव केवल अधिकार तक नहीं बल्कि भावनात्मक होता है। विकास की अंधी दौड़ के बावजूद यदि आज भी जो वन्य संपदा बची है उसका श्रेय इस समुदाय को ही है, जिसे आदिवासी भी कहा जाता है। बिरसा मुंडा ने गुलामी के उस दौर में भी शहरी चमक - दमक से दूर रहने वाले वन बंधुओं में जो जागृति उत्पन्न की वह किसी क्रांति से कम नहीं थी। ये बात भी धीरे - धीरे ही सही किंतु सामने आ ही गई कि आजादी के आंदोलन में आदिवासी समुदाय का योगदान भी भरपूर था। जबलपुर में इस समुदाय के ही रघुनाथ शाह  और शंकरशाह को अंग्रेजों ने मौत की सजा दी थी। ऐसे महान देशभक्तों को सम्मानपूर्वक याद करना निश्चित रूप से प्रशंसनीय है। आजादी के बाद से ही दलितों के साथ ही आदिवासी समुदाय को भी आरक्षण के जरिये मुख्य धारा में लाने का अभियान प्रारंभ हो गया था। संसद और विधानसभाओं में उनका प्रतिनिधितित्व सुनिश्चित करने के लिए निर्वाचन क्षेत्र सुरक्षित किये गए। उन्हें सरकार में भी हिस्सेदारी दी जाने लगी। इसके साथ ही आदिवासी क्षेत्रों के विकास पर भी ध्यान दिया गया। वहाँ शिक्षा,  चिकित्सा, सड़क, पेयजल और बिजली आदि की सुविधाएं उपलब्ध कराने विशेष बजट रखा जाने लगा।  आरक्षण का लाभ मिलने से न सिर्फ संसद और विधानसभाओं में उनकी भागीदारी नजर आती है बल्कि प्रशासन में भी आदिवासी महत्वपूर्ण पदों तक पहुँच सके। शासकीय योजनाओं के चलते विकास की रोशनी भी धुंधली ही सही किंतु  दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों तक पहुँच सकी। बीते एक - दो दशकों में उनमें राजनीतिक तौर पर भी  जागृति आई है। अपने अधिकारों के लिए वे भी दलित समुदाय की तरह लामबंद होना सीख गए हैं। अंग्रेजी राज के जमाने में ही ईसाई मिशनरियों ने आदिवासी समुदाय में मतांतरण की मुहिम प्रारंभ की जिसके चलते सुदूर क्षेत्रों में भी चर्च बनते गए। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के जरिये मिशनरियों ने उन्हें ईसाई बनाना शुरू किया। पूर्वोत्तर राज्यों में तो  रिकार्ड ईसाईकरण हुआ। उसके अलावा झारखण्ड, बिहार, उड़ीसा, म.प्र , छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, आंध्र सहित देश के हर उस अंचल में ईसाई मिशनरियों  ने अपना जाल बिछाया जिनमें  आदिवासी बाहुल्य था।  सत्तर के दशक में पनपे  नक्सलवादी गुटों ने भी आदिवासियों पर ही ध्यान केंद्रित किया। उनके मन में व्यवस्था के प्रति विद्रोह के अलावा ये धारणा भरी गई कि वे हिन्दू नहीं हैं। इसके पीछे  आदिवासी समाज को मुख्य धारा से अलग करने का षडयंत्र  ही था। ये मानने में कुछ भी बुराई नहीं है कि ईसाई मिशनरियों के साथ ही नक्सलवादियों ने जनजातीय समुदाय में अपनी पैठ काफी गहराई तक कायम कर ली। लेकिन इसके लिए केवल उनको दोषी देना अन्याय होगा। हिन्दू समाज के साधु - संतों ने इन वन बंधुओं की जो उपेक्षा की उसके कारण ही देश विरोधी ताकतें उनको मुख्यधारा से दूर ले जाने में सफल हुईं। इससे भी बढ़कर आदिवासियों के नाम पर नेता बने लोग कसूरवार हैं जिन्होंने सत्ता तो उनके समर्थन से हासिल की लेकिन उसके बाद उनको उपेक्षित करते हुए अपना और परिवार का विकास किया। नरेन्द्र मोदी सरकार ने भले ही द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति बनाकर आदिवासी समुदाय को गौरव की अनुभूति करने का अवसर दिया हो किंतु जमीन पर स्थिति बहुत ही अलग है। जो लोग आदिवासियों को मिले आरक्षण का लाभ लेकर ऊँचे पदों पर जा बैठे उन्होंने केवल अपने कुनबे का भविष्य संवारने पर ध्यान दिया। इसके चलते शासन और प्रशासन दोनों में कुछ सीमित लोग ही आदिवासी समुदाय का प्रतिनिधित्व करते देखे जा सकते हैं, सर्वोच्च न्यायालय ने जब क्रीमी लेयर का मुद्दा उठाया और आरक्षण का लाभ ले चुके लोगों से दूसरों के लिए त्याग करने की अपेक्षा की तो लाभान्वित वर्ग एकजुट होकर विरोध करने लगा। यही कारण है कि आठ दशक बाद भी आदिवासी समुदाय का जितना विकास होना था नहीं हो सका। जनजातीय गौरव दिवस की धूमधाम के साथ ही इस बात पर भी चिंतन - मनन होना चाहिए कि इस वर्ग के उत्थान के लिए किये गए प्रयासों का समुचित लाभ उस तक क्यों नहीं पहुंचा ? जब तक इस प्रश्न का उत्तर तलाशकर उचित समाधान नहीं निकलता तब तक आदिवासी समाज को मुख्यधारा में लाने  का उद्देश्य पूरा नहीं हो सकेगा और ईसाई मिशनरियों के साथ ही नक्सलियों को भी देश को कमजोर करने का अवसर मिलता रहेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

No comments:

Post a Comment