Wednesday, 20 November 2024

उबाऊ होता जा रहा है कभी न खत्म होने वाला चुनावी सिलसिला

ज झारखंड और महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव के लिए मतदान की प्रक्रिया पूरी हो जायेगी। 23 नवम्बर को मतगणना के बाद ये स्पष्ट हो जाएगा कि जनता ने किसे सत्ता संभालने का अवसर दिया है। झारखंड में जहाँ झामुमो के हेमंत सोरेन को अपनी सत्ता बचाने संघर्ष करना पड़ रहा है वहीं महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे का राजनीतिक भविष्य दांव पर है। राष्ट्रीय राजनीति के लिहाज से देखें तो इन दोनों चुनावों के नतीजों से भाजपा की अगुआई वाले एनडीए और कांग्रेस के नेतृत्व में बने इंडिया  गठबंधन की भावी तस्वीर भी काफी कुछ साफ हो जाएगी। लोकसभा चुनाव के अप्रत्याशित परिणामों से एक तरफ जहाँ भाजपा को जबरदस्त धक्का लगा वहीं कांग्रेस 100 सीटों के करीब पहुँचने के बाद आत्मविश्वास से भर उठी। राहुल गाँधी  के प्रति राजनीतिक विश्लेषक अपनी धारणा में संशोधन हेतु मज़बूर हुए। लोकसभा में उनके भाषणों में जो आक्रामकता दिखी उससे विपक्ष को लगने लगा कि उसे प्रधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी की टक्कर का नेता मिल गया है। लेकिन कांग्रेस कुछ ज्यादा ही आत्मविश्वास में आ गई जिसके कारण उसने हरियाणा विधानसभा चुनाव में  गठबंधन के अन्य घटक दलों के लिए सीट छोड़ने से इंकार कर दिया। इससे नाराज होकर आम आदमी पार्टी ने 88 प्रत्याशी उतार दिये। हालांकि सबके सब जमानत गँवा बैठे किंतु इसकी वजह से कांग्रेस को बड़ा नुकसान हुआ। यादव बहुल इलाकों में समाजवादी पार्टी को भी कांग्रेस ने उपकृत न करने की गलती की। हरियाणा वैसे तो  90 सीटों वाला राज्य है किंतु तमाम सर्वेक्षणों को झुठलाते हुए भाजपा ने वहाँ स्पष्ट बहुमत के साथ सरकार बनाकर अपने समर्थकों और कार्यकर्ताओं को लोकसभा चुनाव नतीजों से उपजी निराशा से उबार लिया। दूसरी तरफ कांग्रेस और राहुल गाँधी के लिए हरियाणा चुनाव ने मुश्किलें बढ़ा दीं। इंडिया गठबंधन के सहयोगी दलों ने कांग्रेस को उलाहने देने शुरू कर दिये। इसका असर महाराष्ट्र में देखने मिला जहाँ शरद पवार और उद्धव ठाकरे ने सीटों के बंटवारे में कांग्रेस को ज्यादा हिस्सा देने से इंकार कर दिया और   प्रत्येक को 85 सीटें मिलीं। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस  इस राज्य की सर्वाधिक सीटें जीतकर महा विकास अगाड़ी में बड़े भाई की भूमिका में आ गई थी किंतु हरियाणा की हार ने उससे वह रुतबा छीन लिया। इसीलिए महाराष्ट्र का चुनाव राष्ट्रीय राजनीति की भावी दिशा तय करेगा । आगामी जितने भी विधानसभा चुनाव होने हैं उनमें ज्यादातर में कांग्रेस सहयोगी दलों के भरोसे है। प. बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और और केरल में वाम दलों से उसका मुकाबला होगा जो  इंडिया गठबंधन में शामिल हैं। झारखण्ड में भी कांग्रेस झामुमो के पीछे चलने बाध्य है। यही स्थिति भाजपा के सामने भी है। महाराष्ट्र उसके लिए भी जीवन - मरण का सवाल बन गया है। इस राज्य में यदि उसको दोबारा सत्ता नहीं मिली तब हरियाणा में जीत की चमक फीकी पड़ते देर नहीं लगेगी। महाराष्ट्र में भी हरियाणा की तरह से ही भाजपा के नेतृत्व वाली महायुति सरकार के बारे में  ज्यादातर सर्वेक्षणों का अनुमान नकारात्मक आने के बाद रास्वसंघ ने मोर्चा संभाला है क्योंकि उसे भी ये अंदेशा है कि इस राज्य में यदि एनडीए सत्ता में नहीं लौटा तो उसका असर मोदी सरकार के भविष्य पर  पड़ सकता है। इसी तरह झारखंड के नतीजे अगले वर्ष होने वाले बिहार के चुनाव को प्रभावित करेंगे। लेकिन इन चुनावों से एक बार फिर ये बात सामने आ गई कि कभी न रुकने वाली चुनाव प्रक्रिया न सिर्फ जनता बल्कि राजनीतिक दलों को भी बोझ लगने लगी है। इसीलिए नीति - सिद्धांतों की  बजाय मुफ्त उपहार बांटने की होड़ मची रहती है। स्टार प्रचारक बने नेता बजाय अपनी पार्टी का पक्ष रखने के विरोधी की आलोचना करने में अपना समय  खर्च करते हैं। सबसे बड़ी बात धन की बरबादी है।  लाखों -  करोड़ों की बात अब पुरानी हो चुकी है। अरबों - खरबों से कम किसी राज्य का चुनाव नहीं होता। इन दो राज्यों के चुनाव संपन्न होते ही दूसरे मोर्चे खुल जाएंगे। इनकी वजह से राष्ट्रहित में लिये जाने वाले नीतिगत निर्णय लंबित पड़े रहते हैं। काले धन का प्रवाह राजनीति का अपराधीकरण कर रहा है। दुर्भाग्य से इन मुद्दों पर विमर्श की किसी को फुर्सत नहीं है। इसीलिए एक देश एक चुनाव की चर्चा छिड़ते ही उसका विरोध शुरू हो जाता है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

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