Friday, 29 November 2024

राहुल की अडानी विरोधी मुहिम पर विपक्षी दलों में ही मतभेद



संसद का शीतकालीन हंगामे की भेंट चढ़ रहा है। 4 दिनों में महज 40 मिनिट ही कामकाज चला। उद्योगपति गौतम अडानी के विरुद्ध अमेरिका में दर्ज प्रकरण को लेकर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी उनकी गिरफ्तारी पर अड़े हैं। जेपीसी ( सं. संसदीय समिति) की मांग भी की जा रही है। हालांकि विपक्ष द्वारा संभल सहित अन्य कुछ मुद्दे  उठाकर भी  दोनों सदनों को चलने नहीं दिया जा रहा ।  लेकिन अडानी का विरोध राहुल का सबसे प्रिय मुद्दा होने से कांग्रेस पार्टी के बाकी नेता भी चाहे - अनचाहे उनके सुर में  सुर मिलाने लगते हैं। ऐसा लगता है उनकी अडानी से कोई निजी खुन्नस है। इसीलिए वे उनके खिलाफ बोलने का कोई अवसर नहीं छोड़ते। रोचक बात ये है कि इस बारे में इंडिया गठबंधन में ही  एक राय नहीं है। हिंडनबर्ग विवाद के समय भी श्री गाँधी ने जेपीसी की मांग पर संसद की कारवाई नहीं चलने दी। तब अविभाजित रांकपा के अध्यक्ष शरद पवार और प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने उस मांग से किनारा कर लिया था। जिस ताजा विवाद पर अडानी के विरुद्ध मोर्चा खोलकर संसद की कारवाई को रोका जा रहा है उसे लेकर भी विपक्ष में फूट सामने आ गई । ममता तो पहले से ही अडानी का विरोध करने से बचती आई हैं किंतु चौंकाने वाली बात ये हुई कि केरल में सत्तारूढ़ वामपंथी दलों ने भी अडानी विरोधी मुहिम में साथ देने से इंकार किया है। इसका कारण राज्य में बंदरगाह बनाने अडानी की कंपनी से हुआ अनुबंध है। गौरतलब है वामपंथी राष्ट्रीय राजनीति में तो  इंडिया गठबन्धन का हिस्सा हैं किंतु केरल में उनके और कांग्रेस  के बीच 36 का आंकड़ा है । यहाँ तक कि वायनाड लोकसभा सीट पर राहुल के खड़े होने पर वामपंथियों ने एतराज जताते हुए अपना प्रत्याशी भी उतार दिया। रायबरेली से भी जीतने के बाद श्री गाँधी ने उक्त सीट खाली कर दी जिस पर हुए उपचुनाव में उनकी बहिन प्रियंका वाड्रा जीतकर आई हैं। उनके विरुद्ध भी वामपंथी उम्मीदवार खड़ा हुआ था। दरअसल देश के सभी राज्य निवेशकों को आमंत्रित करने में जुटे रहते हैं।  अडानी इस समय देश के सबसे  बड़े निवेशकों में हैं। हर राज्य चाहता है वे उसके विकास में सहभागी बनें। यही वजह है कि राहुल के खुले विरोध को नजरंदाज करते हुए कांग्रेस शासित अनेक राज्यों ने इस समूह को बड़े - बड़े काम दिये जिसका स्पष्टीकरण पत्रकारों द्वारा मांगे जाने पर श्री गांधी उन पर भाजपाई होने का आरोप लगाने लगते हैं। उनका अडानी विरोध जनता के गले भी नहीं उतर रहा। हाल के वर्षों में  कांग्रेस को जहाँ भी चुनावी सफलता हासिल हुई उनमें अडानी मुद्दे की कोई भूमिका नहीं रही। लोकसभा चुनाव के बाद हरियाणा और महाराष्ट्र में भी श्री गाँधी द्वारा अडानी की आड़ लेकर प्रधानमंत्री को घेरने का भरपूर प्रयास किया किंतु मतदाताओं ने लेश मात्र ध्यान नहीं दिया। और तो और  कांग्रेस के सहयोगी दलों को भी अडानी का लगातार विरोध बोझ लगने लगा है। संसद में अनेक छोटे - छोटे दलों के सांसद भी हैं। कारवाई नहीं चलने के कारण वे अपने क्षेत्र से  जुड़े मुद्दे उठाने से वंचित रह जाते हैं। कांग्रेस बेशक विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी है किंतु उसके नेता की जिद के चलते बाकी पार्टियां महत्वहीन होकर रह जाएं ये तो कहीं से भी उचित नहीं है। अडानी या अन्य किसी ने भी कानून विरुद्ध कोई कार्य किया है तो उसे सजा मिलनी चाहिए किंतु इसके लिए संसद का बहुमूल्य समय नष्ट करना लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करना है। जहाँ तक बात सत्ता पक्ष की है तो उसके लिए राहुल का ये रवैया फायदेमंद है क्योंकि उसे जो कुछ पारित करवाना होता है वह  हंगामे के बीच भी हो जाता है। अब तो राजनीतिक विश्लेषक भी मानने लगे हैं कि श्री गाँधी द्वारा अडानी का अंधा विरोध उनकी हताशा को दर्शाने लगा है। ये बात भी चर्चा में आने लगी है कि अमेरिका से अडानी विरोधी जो धमाके हो रहे हैं उनके पीछे व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा का हाथ है। शरद पवार और ममता बैनर्जी के बाद जब वामपंथी भी अडानी मुद्दे पर श्री गाँधी के साथ खड़े होने तैयार नहीं हैं तब उन्हें  समझ लेना चाहिए कि उनकी बात से गठबंधन के साथी ही सहमत नहीं हो रहे । जनहित से जुड़े मुद्दे उठाना नेता प्रतिपक्ष का कर्तव्य है। अन्य सम -  सामयिक ज्वलंत विषयों पर भी उनके अभिमत का महत्व है क्योंकि वह उनके दल की नीति स्पष्ट करता है। लेकिन अडानी से जुड़े विवादों में श्री गाँधी के विरोध का औचित्य जब सभी विपक्षी दलों को समझ नहीं आ रहा तब आम जनता उससे कितनी प्रभावित होगी ये सोचने वाली बात है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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