अमेरिका दुनिया को किस प्रकार प्रभावित करता है उसका अंदाज वहाँ के राष्ट्रपति चुनाव में पूरे विश्व की रुचि देखकर लग जाता है। लोकतांत्रिक देश तो फ्रांस और ब्रिटेन भी हैं किंतु वहाँ हुए चुनाव की उतनी चर्चा नहीं हुई। दरअसल अमेरिका न केवल आर्थिक और सैन्य महाशक्ति है अपितु वह दुनिया के राजनीतिक संतुलन को भी प्रभावित करने में सक्षम है। यही वजह है कि उसके राष्ट्रपति की वजनदारी से कोई इंकार नहीं कर सकता। गत दिवस संपन्न चुनाव में पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का दोबारा चुना जाना इसलिए महत्वपूर्ण बन गया क्योंकि 2020 में जो बाइडेन से परास्त होने के बाद उन पर तरह - तरह के आरोप लगे। यहाँ तक कि उन्हें जेल भेजे जाने की संभावना भी व्यक्त की जाने लगी थी। लेकिन तमाम विवादों के बावजूद उन्होंने सबको चौंकाते हुए रिपब्लिकन पार्टी की उम्मीदवारी हासिल की और फिर बड़े ही आक्रामक तरीके से लड़कर जीत हासिल की। आम तौर पर अमेरिका में राष्ट्रपति को उसकी पार्टी लगातर दूसरी मर्तबा भी चुनाव में उतारती है क्योंकि उसे अधिकतम दो कार्यकाल ही मिल सकते हैं। ट्रम्प को भी वह अवसर दिया गया किंतु वे हार गए। बढ़ती आयु को देखते हुए लगा था कि उनकी राजनीतिक यात्रा का पूर्ण विराम हो गया किंतु चौतरफा घेराबन्दी से विचलित हुए बिना उन्होंने अपनी वापसी हेतु प्रयास किया और चार साल बाद एक बार फिर अमेरिका के सत्ता सूत्र संभालने जा रहे हैं। चुनाव अभियान की शुरुआत में डेमोक्रेट प्रत्याशी और उपराष्ट्रपति कमला हैरिस के साथ हुई बहस में ऐसा लगा था कि ट्रम्प उनके सामने टिक नहीं पाएंगे किंतु एक जनसभा में उन पर गोली चलने के बाद से उनके प्रति रुझान बढ़ा और फिर वे लगातार अपने प्रतिद्वंदी के बराबर आते गए तथा अंततः बाजी उनके हाथ लग गई। ट्रम्प की जीत में उनकी जीवटता की बड़ी भूमिका रही वरना अपेक्षाकृत कम आयु की हैरिस को हराना कठिन था। इस चुनाव ने अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में महिलाओं की पराजय का सिलसिला जारी रखा। इस बारे में रोचक तथ्य ये है कि ये दूसरा अवसर है जब राष्ट्रपति चुनाव में महिला उम्मीदवार मैदान में उतरी। 2016 में पहली बार हिलेरी क्लिंटन को ये अवसर मिला जबकि इस चुनाव में कमला हैरिस ने मोर्चा संभाला। संयोगवश दोनों हार गईं और दोनों को हराने का श्रेय ट्रम्प को ही मिला। हिलेरी बराक ओबामा के प्रशासन में विदेश सचिव रहीं। वहीं हैरिस भी निवर्तमान राष्ट्रपति बाइडेन के कार्यकाल में उपराष्ट्रपति बनीं। इस बार उनकी विजय की संभावना काफी बताई जा रही थीं किंतु ट्रम्प ने आखिरी क्षणों में चुनाव अपने पक्ष में कर लिया। वे उन राज्यों में भी जीते जो डेमोक्रेटिक पार्टी के समर्थक रहे। ऐसा लगता है अमेरिकी मतदाता यूक्रेन को युद्ध हेतु मदद देने की बाइडेन की नीति से नाराज हो उठे जो अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर बोझ बनती जा रही है। ट्रम्प ने युद्ध रुकवाने का जो वायदा किया वह कारगर रहा। इसके अलावा उन्होंने अमेरिकी युवकों के रोजगार को सुरक्षित करने का आश्वासन देकर जीत की राह बनाई। लेकिन आखिरी दिनों में उन्होंने अमेरिका में बसे भारतीय मूल के हिंदुओं को लुभाने का दांव चलते हुए बांग्ला देश में पर हो रहे अत्याचारों का विरोध कर हैरिस को पिछले पाँवों पर धकेल दिया जो इस मुद्दे पर कुछ भी बोलने से बचती रहीं। शुरुआत में भारतीय मूल की होने के कारण कमला को भारतीय समुदाय का समर्थन सुनिश्चित माना जा रहा था लेकिन ट्रम्प ने आखिरी दौर में ताबड़तोड़ हमले कर डाले जिनकी वजह से पांसा उनके पक्ष में गिर गया। ये बात भी सही है कि बतौर राष्ट्रपति बाइडेन अपेक्षित प्रभाव नहीं छोड़ सके। ट्रम्प ने अमेरिका प्रथम का नारा उछालकर राष्ट्रवाद को जिस तरह प्राथमिकता दी उसकी वजह से भारत में उनके चुनाव पर सबकी नजरें थीं। वामपंथियों के अलावा कांग्रेस सहित विपक्ष को को जहाँ कमला हैरिस में अनुकूलता नजर आ रही थी वहीं भाजपा ट्रम्प की जीत चाह रही थी। इसके पीछे ट्रम्प और नरेंद्र मोदी के निजी सम्बन्ध बताये जाते हैं। लेकिन मोदी विरोधी लॉबी ये प्रचार करने में जुट गई है कि ट्रम्प के दोबारा सत्ता में आने के बाद भारतीय विद्यार्थियों और पेशेवरों को परेशानी हो जायेगी। इसके अलावा वे भारतीय सामान पर ज्यादा ड्यूटी लगाकर दबाव बनाएंगे। ये आशंकाएँ निराधार नहीं हैं क्योंकि ट्रम्प की पहली प्राथमिकता अपने देश और उसके लोगों की भलाई होगी किंतु दूसरी तरफ ये भी सही है कि वैश्विक राजनीति में भारत इस स्थिति में आ गया है कि उसे उपेक्षित करना किसी भी महाशक्ति के लिए आसान नहीं रह गया। यूक्रेन और रूस की जंग के अलावा पश्चिम एशिया में इसराइल की अनेक देशों से हो रही लड़ाई में भारत सरकार ने जिस कूटनीतिक कौशल का परिचय दिया उसके कारण ट्रम्प और पुतिन तो क्या जिनपिंग तक भारत के महत्व को स्वीकार करने बाध्य हैं। ट्रम्प के सत्ता में लौटने के बाद चीन भी दबाव में है। वहीं बांग्ला देश की सत्ता में बैठे भारत विरोधी तत्वों में भी घबराहट है जिन्हें बाइडेन का समर्थन बताया जा रहा था। ट्रम्प की जीत में एलन मस्क जैसे धनकुबेर की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। नव निर्वाचित राष्ट्रपति खुद भी व्यवसायी हैं और भारत में भी उनके अनेक औद्योगिक घरानों से निकट संबंध हैं। ये सब देखते हुए भारत - अमेरिका संबंध और मजबूत होने की उम्मीद की जा सकती है। आगामी वर्ष क्वाड की बैठक में भारत आने की बात कहकर उन्होंने इसका संकेत भी दे दिया है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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