कैनेडा में हिन्दू मंदिरों पर खालिस्तानी उग्रवादियों द्वारा हमला और हिन्दू धर्मावलम्बियों के साथ हिंसा की घटना से दोनों देशों के बीच पहले से खराब चल रहे रिश्तों में और खटास आ गई है। जो समाचार मिल रहे हैं उनके मुताबिक पुलिस बजाय उग्रवादियों को रोकने के तमाशबीन बनी रही। हालांकि कैनेडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने हमले की निंदा की किंतु उसके लिए उनके भारत विरोधी रवैये को ही जिम्मेदार माना जाएगा। एक खालिस्तानी उग्रवादी निज्जर की हत्या के लिए भारत सरकार पर आधारहीन आरोप लगाने वाले ट्रूडो की हरकतें किसी राष्ट्रप्रमुख से कतई अपेक्षित नहीं है । आरोप लगाते - लगाते ट्रूडो सरकार भारतीय गृह मंत्री अमित शाह को भी कठघरे में खड़ा करने का दुस्साहस कर बैठी। दो देशों के बीच विवाद की स्थिति में कूटनीतिक माध्यमों का उपयोग होता है। राष्ट्र प्रमुख एक दूसरे से सीधे बातचीत भी कर लेते हैं। लेकिन ट्रूडो का आचरण किसी तानाशाह सरीखा है । अपने देश के नागरिक की हत्या की जाँच करना सरकार की जिम्मेदारी है किंतु निज्जर को मारने में भारत सरकार और कैनेडा में पदस्थ राजनयिक शामिल थे, इसका ठोस प्रमाण दिये बिना ट्रूडो ने जो गैर जिम्मेदाराना बयानबाजी की वह चौंकाने वाली है क्योंकि दोनों देशों के रिश्ते बेहद मजबूत रहे। सबसे बड़ी बात भारतीय मूल के लाखों लोगों का वहाँ कई पीढ़ियों से बसा होना है जिसमें सिखों की संख्या बेशक ज्यादा है जिन्होंने अपना धार्मिक और राजनीतिक प्रभाव काफी बढ़ाया है। गुरुद्वारों की विशाल संख्या और कैनेडा सरकार में सिखों का दबदबा गैर सिख भारतीय मूल के लोगों की तुलना में ज्यादा है। 80 और 90 के दशक में जब भारत में खालिस्तानी आतंकवाद चरम पर था तभी से अनेक खालिस्तानी संगठन वहाँ से भारत विरोधी गतिविधियों और दुष्प्रचार में लगे रहे। अपने को अति लोकतांत्रिक दिखाने के फेर में कैनेडा सरकार उनकी हरकतों को उपेक्षित करती रही। परिणामस्वरूप वह खालिस्तानी मानसिकता की शरण स्थली बन गया। लोकतांत्रिक देशों में वोट बैंक के लालच में अक्सर अवांछित तत्वों को फलने - फूलने का अवसर दिया जाता है। भारत में भी बांग्ला देश के लाखों घुसपैठियों को पहले वामपंथियों और फिर ममता बैनर्जी सदृश राजनेताओं ने जिस तरह सिर पर बिठा लिया वही काम कैनेडा के शासकों द्वारा खालिस्तानी उग्रवादियों को छूट देकर किया जाता रहा है। हिंदुओं के धर्मस्थलों पर हुए ताजा हमलों के बाद कैनेडा वासी हिन्दू भी संगठित होने लगे हैं। ऐसे में भारतीय मूल के दो समुदायों के बीच संघर्ष की आशंका बढ़ रही है जिसकी चिंगारी अमेरिका और ब्रिटेन तक फैल सकती हैं। स्मरणीय है अमेरिका में बैठा पन्नू नामक खालिस्तान समर्थक भारतीय विमानों में बम रखने जैसी धमकी खुले आम दे रहा है। वहीं ब्रिटेन के तमाम गुरुद्वारों में जरनैल सिंह भिंडरवाले के बड़े पोस्टर प्रदर्शित किये गए हैं। वहाँ भी सिख उग्रवादियों द्वारा हिंदुओं के धर्मस्थलों पर हमले की वारदातें हो चुकी हैं। यहाँ तक कि भारतीय दूतावास पर तिरंगे के स्थान पर खालिस्तानी झंडा लगाने की हरकत भी की गई। हो सकता है उक्त देशों की सरकार में बैठे कुछ लोगों को भारत विरोधी खालिस्तानी उग्रवादियों की गतिविधियां रास आ रही हों किंतु वे याद रखें कि जिन सांपों को वे दूध पिला रहे हैं वही उनको डसेंगे। जिन - जिन देशों ने अपने यहाँ उग्रवादियों को पनाह दी उन सबको खामियाजा भोगना पड़ा। यदि कैनेडा के प्रधानमंत्री ट्रूडो चुनाव जीतने के लिए उनको संरक्षण देने से बाज नहीं आये तो उन्हें समझ लेना चाहिए कि भारत में तो खालिस्तान कभी नहीं बन सकता किंतु कैनेडा में अवश्य उसकी कल्पना साकार हो जाएगी । कैनेडा की प्रगति में भारतीय मूल के अप्रवासियों की महती भूमिका रही है। यदि खालिस्तानी इसी तरह आतंक फैलाते रहे तो उसकी छवि खराब होना तय है जिसका प्रभाव अर्थव्यवस्था के अलावा वहाँ की आंतरिक सुरक्षा पर पड़े बिना नहीं रहेगा। लेकिन भारत में जो देशभक्त सिख समुदाय है उसको भी चाहिए कि कैनेडा के खालिस्तान समर्थक सिखों की हरकतों का खुलकर विरोध करे क्योंकि इससे पूरे समुदाय की प्रतिष्ठा को धक्का पहुँचता है।
- रवींद्र वाजपेयी
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