दीपावली के पूर्व से ही देश की राजधानी दिल्ली में हालात गंभीर हैं। लोगों को सांस लेने में कठिनाई होने लगी है। शुद्ध हवा के लिये सुबह सैर पर निकलने वालों के फेफड़ों में जहर समाने लगा है। अस्थमा से ग्रसित लोगों के लिए ऐसी स्थितियां जानलेवा हो सकती हैं। घरों में तो वायु शुद्ध करने वाले उपकरण लगाए जा सकते हैं किंतु बाहर निकलने पर प्रदूषित सांस ही लेनी पड़ती है। और फिर जो लोग झुग्गियों में रहते हैं उनकी तकलीफ का अंदाजा लगाया जा सकता है। देश का दिल कहे जाने वाले महानगर पर दुनिया के सर्वाधिक प्रदूषित शहर होने का कलंक लग ही चुका है। वहाँ यमुना नदी में फैक्ट्रियों से निकले प्रदूषित जल और रसायनों के कारण झाग तैरता दिखता है जिसमें छठ पूजा की जाएगी। पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने यमुना को स्वच्छ रखने की समय सीमा कई बार घोषित की किंतु कुछ नहीं हुआ। पंजाब से आने वाले पराली के धुएं के अलावा औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाला प्रदूषण दिल्ली के वायुमंडल को जहरीला बनाता है। वाहनों के धुएं को रोकने सीएनजी और बैटरी चलित वाहनों को बढ़ावा दिया गया। 10 वर्ष पुरानी गाड़ियों को सड़क से बाहर करने का नियम भी लागू हुआ। मेट्रो ट्रेन चलने के बाद कुछ उम्मीद जागी थी। लेकिन बढ़ती आबादी और वाहनों की संख्या के कारण आगे पाट - पीछे सपाट की स्थिति बनती रही है। सर्वोच्च न्यायालय , केंद्र और राज्य सरकार के अलावा तमाम स्वयंसेवी संगठन पर्यावरण सुधारने में लगे हैं । लेकिन नतीजा शून्य है। उल्टे स्थितियां खराब हो रही हैं। पहले दिल्ली सरकार पंजाब को कोसती थी जहां के किसान फसल कटने के बाद खेतों में आग लगा दिया करते हैं। लेकिन अब तो उस राज्य में भी आप आदमी पार्टी की ही सरकार है। ऐसे में दोनों को मिलकर रास्ता निकालना चाहिए था । यद्यपि ये स्थिति पूरे देश की है। चंडीगढ़ जैसे शहर ही अपवाद हैं वरना क्या मुंबई और क्या कोलकाता , सभी में हालात चिंताजनक हैं। दो दशक पहले तक बेंगुलुरु का मौसम बेहद सुहावना हुआ करता था किंतु सायबर सिटी बनने के साथ ही वह भी प्रदूषित हो गया। दुर्भाग्य से पर्यावरण संरक्षण का अभियान दिखावा होकर रह गया है। लेकिन सबसे बड़ी बात ये है कि कोई भी राजनीतिक पार्टी पर्यावरण संरक्षण पर गंभीर नहीं है। दूसरी तरफ ये भी सही है कि जनता भी इस मुद्दे पर उदासीन है। इसका प्रमाण है कि कि आज तक एक भी चुनाव प्रदूषण दूर करने के नाम पर नहीं हुआ। इसी महीने जिन 2 राज्यों में विधानसभा चुनाव हैं वहां भी मुफ्तखोरी से मतदाता को आकर्षित करने की प्रतिस्पर्धा चल रही है । नगदी , सस्ती गैस, मुफ्त बिजली , सायकिल आदि चुनावी वायदों में है । लेकिन पर्यावरण संरक्षण प्रमुख विषय नहीं है। जनता की रुचि न होने से नेता भी इस तरफ ध्यान नहीं देते। औद्योगिकीकरण और आबादी , प्रदूषण का बड़ा कारण है। सुविधाभोगी जीवन शैली भी पर्यावरण को क्षति पहुंचाती है। ये विडंबना ही है कि आजादी मिले 77 साल से ज्यादा बीत गए किंतु लोगों को शुद्ध पीने का पानी नसीब न होने से बोतल बन्द पानी का कारोबार फल रहा है । सवाल ये है कि क्या विकास के बदले आम जनता को जहरीली हवा और प्रदूषित जल ही नसीब होगा ? दिल्ली में देश और प्रदेश दोनों की सरकार के साथ ही सर्वोच्च न्यायालय है। देश में प्रदूषण नियंत्रण करने के लिए जिम्मेदार शीर्ष सरकारी एजेंसियों के मुख्यालय भी वहीं हैं किंतु जब वे सब मिलकर उस महानगर के पर्यावरण को ही नहीं सुधार पा रहे तब देश के बाकी हिस्सों में क्या होता होगा इसकी कल्पना आसानी से की जा सकती है।
-रवीन्द्र वाजपेयी
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