हाल ही में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डी. के. शिवकुमार द्वारा मुफ्त योजनाओं की समीक्षा किये जाने संबंधी बयान पर नसीहत दी थी कि वायदे वही करें जो पूरे किये जा सकें। उनकी टिप्पणी पर प्रधानमंत्री ने कांग्रेस पर हमला करते हुए कहा कि वह झूठे वायदे करती है। पलटवार कांग्रेस की तरफ से भी हुआ। चूँकि महाराष्ट्र और झारखंड में विधानसभा चुनाव का प्रचार जोरों पर है इसलिए सभी पार्टियों में वायदों की प्रतिस्पर्धा चल रही है। इनमें सबसे ज्यादा चर्चा है मुफ्त दी जाने वाली सुविधाओं की जिनमें प्रतिमाह महिलाओं और बेरोजगार युवाओं के बैंक खाते में नगद राशि जमा करने के अलावा, सस्ता रसोई गैस सिलेंडर और मुफ्त बिजली जैसे वायदे हैं। सबसे रोचक बात बात ये है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा समय - समय पर मुफ्त उपहारों की योजनाओं का विरोध किये जाने के बावजूद उनकी अपनी पार्टी भाजपा ही चुनाव वाले राज्यों में खैरात बाँटने में किसी से पीछे नहीं है। कांग्रेस को कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश के चुनाव में मुफ्तखोरी पर आधारित वायदों के कारण बहुमत मिल गया था इसलिए अब वह उन्हें गारंटी का नाम देकर हर चुनाव में दोहराने लगी है। हालांकि लोकसभा चुनाव में उसके खटाखट वाले वायदे पर जनता ने भरोसा नहीं किया। ऐसा ही हरियाणा में भी देखने मिला जहाँ सतह पर सत्ता विरोधी माहौल साफ नजर आने के बावजूद भाजपा तीसरी बार सरकार बनाने में सफल हो गई। लेकिन महाराष्ट्र और झारखंड में कांग्रेस अभी भी अपनी गारंटियों के बल पर वैतरणी पार करना चाह रही है। पार्टी नेतृत्व को न जाने ये बात क्यों समझ नहीं आ रही कि राजस्थान और छत्तीसगढ़ में उसकी सरकारें अनाप - शनाप मुफ्त योजनाएं और कार्यक्रम चलाने के बाद भी सत्ता से बाहर हो गई। इसी तरह भाजपा को भी आज तक ये बात हजम नहीं हो रही कि उ.प्र में अयोध्या, मथुरा और काशी जैसे मुद्दे होने के बाद भी उसकी लोकसभा सीटों में जबरदस्त कमी आ गई। इन उदाहरणों से स्पष्ट हो जाता है कि मुफ्त उपहार वाली रणनीति हर चुनाव में कारगर हो जाए ये जरूरी नहीं है। इसी तरह जो मतदाता मुफ्त योजनाओं, का भरपूर लाभ ले रहे हैं वे उसके प्रति कृतज्ञता स्वरूप सत्तारूढ़ पार्टी को एक बार सत्ता में लाएं ये भी जरूरी नहीं। पिछले लोकसभा चुनाव में मुस्लिम समुदाय भाजपा को हराने के लिए पूरी तरह गोलबंद हो गया। अनेक राज्यों में दलितों ने भी भाजपा के विरुद्ध मोर्चेबंदी की जबकि उक्त दोनों वर्ग मोदी सरकार द्वारा चलाई जा रही कल्याणकारी योजनाओं का जमकर लाभ उठा रहे हैं। इतना सब देखने के बाद भी न कांग्रेस को अक्ल आई और न ही भाजपा को। लगातार तीन बार दिल्ली की सातों लोकसभा सीटें हारने के बावजूद अरविंद केजरीवाल के दिमाग में इतनी छोटी सी बात नहीं आई कि हर चुनाव का अपना गणित होता है। दिल्ली से सटे हरियाणा में आम आदमी पार्टी विधानसभा चुनाव में मुफ्त बिजली , पानी जैसे उन्हीं वायदों के साथ मैदान में उतरी जिनके बल पर वह दिल्ली की सत्ता में बनी हुई है। लेकिन हरियाणवी मतदाताओं ने केजरीवाल जी के 90 फीसदी उम्मीदवारों की जमानत जप्त करवा दी। ये सब देखकर लगता है कि राजनीतिक दलों के पास मुद्दों का अकाल पड़ गया है। वैचारिक आधार तो वैसे भी नहीं बचा। टिकिट की लालच में दूसरी पार्टी छोड़कर आये दलबदलू को उपकृत करने में कोई भी दल पीछे नहीं है। इसके चलते उसके अपने पुराने कार्यकर्ता भले नाराज हो जाएं किंतु उसकी चिंता नहीं की जाती। महाराष्ट्र में अजीत पवार को साथ लेने से भाजपा के प्रतिबद्ध समर्थकों में निराशा है। दूसरी तरफ बालासाहेब ठाकरे के कारण शिवसेना के साथ जुड़े मतदाताओं का बड़ा वर्ग इस बात को नहीं पचा पा रहा कि उद्धव ठाकरे ने उन शरद पवार और कांग्रेस से हाथ मिला लिया जो मुस्लिम परस्ती के लिए बदनाम हैं। सैद्धांतिक पहिचान खत्म हो जाने के कारण ही राजनीतिक दल मुफ्तखोरी के वायदों के साथ चुनाव में उतरने लगे हैं। मतदाताओं की स्थिति उस उपभोक्ता जैसी हो गई है जो किसी भी चीज की गुणवत्ता की बजाय उसकी कम कीमत को महत्व देता है। दुःख और चिंता का विषय ये है कि न तो सत्ता और न ही विपक्ष में बैठे लोगों को इस बात की फिक्र है कि राजगद्दी हासिल करने के लिए वे जिस बेरहमी से खजाना लुटाने पर आमादा हैं वह देश को आर्थिक दिवालियेपन की ओर ले जाएगा।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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