Monday, 25 November 2024

भाजपा क्षेत्रीय दलों के वर्चस्व को तोड़ने की रणनीति अपना रही


राजनीति संभावनाओं का खेल है। लेकिन उसमें  संकेतों का भी बड़ा महत्व है। इसीलिए महाराष्ट्र और झारखंड  के परिणाम भविष्य का संकेत कहे जा सकते हैं। हालांकि एक - दो राज्यों के चुनाव से भावी राष्ट्रीय राजनीति की कल्पना करना जल्दबाजी लगती है क्योंकि विभिन्न राज्यों की राजनीति एक दूसरे से अलग  है। लेकिन  जिस तरह के हालात बन रहे हैं उनके आधार पर ये कहा जा सकता है कि भाजपा राष्ट्रीय राजनीति में  मुख्य भूमिका निभाने की पात्रता हासिल कर चुकी है। ऐसा इसलिए संभव हो सका क्योंकि उसने कांग्रेस से वह हैसियत छीन ली जो केवल हिमाचल, कर्नाटक और तेलंगाना में ही सत्तारूढ़ है। कुछ अन्य राज्यों में वह क्षेत्रीय दलों पर आश्रित हो गई है। बीते कुछ दशकों के भीतर अनेक राज्यों में क्षेत्रीय दलों का जो वर्चस्व बढ़ा उसने कांग्रेस को हाशिये पर धकेल दिया। शेष, जहाँ भी उसकी भाजपा से सीधी टक्कर है वहाँ उसके पाँव उखड़ते जा रहे हैं जिसके लिए वह स्वयं उत्तरदायी है। उसका समूचा ध्यान गाँधी परिवार के इर्द - गिर्द केंद्रित होकर रह गया है। लोकसभा चुनाव में उ.प्र और महाराष्ट्र ने भाजपा को स्पष्ट बहुमत से पीछे रहने बाध्य कर दिया था। उसके बाद से  ये अवधारणा स्थापित करने का प्रयास सुनियोजित ढंग से होने लगा कि  नरेंद्र मोदी का प्रभाव घटने लगा है। लेकिन महज 6 माह के भीतर ही भाजपा ने हरियाणा और महाराष्ट्र में शानदार प्रदर्शन करते हुए  साबित कर दिया कि उसका हौसला कायम है। यद्यपि जम्मू - कश्मीर और झारखंड के नतीजे उसके मुताबिक नहीं रहे किंतु दोनों में क्षेत्रीय दल ही सत्ता में आये। जम्मू - कश्मीर में भाजपा प्रमुख विरोधी पार्टी बनने में कामयाब रही जो बड़ी बात है। इसी तरह झारखंड में भी क्षेत्रीय पार्टी सरकार बचाये रखने में सफल रही। महाराष्ट्र में भाजपा ने जहाँ सफलता का कीर्तिमान बनाया वहीं लोकसभा चुनाव में राज्य में सबसे अधिक सीटें जीतने वाली कांग्रेस का प्रदर्शन अब तक का सबसे दयनीय है। एक समय था जब महाराष्ट्र उसका गढ़ हुआ करता था परंतु पहले  वह शरद पवार की राकांपा से गठजोड़ करने मजबूर हुई और फिर  उस शिवसेना को गले लगा लिया जो हिंदुत्व को लेकर भाजपा से भी ज्यादा मुखर रही। हालांकि  उसकी संगत में आने से उद्धव ठाकरे तो डूबे ही किंतु खुद उसके पास भी  मुँह छिपाने की जगह नहीं बची। इस बारे में भाजपा की रणनीति पूरी तरह कामयाब रही जिसने पहले शिवसेना और बाद में राकांपा को तोड़ दिया। पार्टी नेतृत्व को ये बात समझ में आ गई है कि कांग्रेस को हराना उतना कठिन नहीं है जितना क्षेत्रीय दलों को। दरअसल वे स्थानीय मुद्दों और भावनाओं का प्रतिनिधित्व राष्ट्रीय पार्टियों से बेहतर करते हैं। इसीलिये उसके निशाने पर अब क्षेत्रीय पार्टियां हैं। स्मरणीय है जम्मू कश्मीर में जब भाजपा ने पीडीपी के साथ सरकार बनाई तब उसके कट्टर समर्थकों में भी गुस्सा था किंतु कालांतर में स्पष्ट हो गया कि वह दूरगामी रणनीति का हिस्सा था। बिहार में भी नीतीश कुमार को लालू से दूर करने में भाजपा सफल हो गई। इस सबके पीछे उसकी कार्ययोजना यही है कि क्षेत्रीय दलों की शक्ति को छिन्न - भिन्न कर दिया जाए। महाराष्ट्र के मुकाबले के बाद अब दिल्ली, बिहार, प. बंगाल, तमिलनाडु  जैसे बड़े राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। इनमें या तो कांग्रेस विपक्ष में है या फिर क्षेत्रीय पार्टियों के आसरे। भाजपा नेतृत्व जिस योजना पर काम कर रहा है उसमें क्षेत्रीय दल के मुकाबले खुद को बतौर विकल्प पेश करना और फिर सत्ता हासिल करना है। महाराष्ट्र में उसने शरद पवार और उद्धव ठाकरे जैसे मजबूत स्तंभों को उन्हीं के सेनापतियों से हरवा दिया और खुद सबसे बड़ी और प्रभावशाली पार्टी बन बैठी। बिहार में भी उसके विधायक नीतीश कुमार से ज्यादा हैं। प. बंगाल में 10 सालों के भीतर भाजपा ने कांग्रेस और वामपंथियों को पूरी तरह अप्रासंगिक बनाते हुए तृणमूल कांग्रेस के विकल्प की स्थिति प्राप्त कर ली।  तमिलनाडु में वह अपनी पहिचान बनाने में कामयाब होती दिख रही है जबकि केरल में  तीसरी ताकत के रूप में कांग्रेस और वामपंथी मोर्चे की चिंता बढ़ा रही है। इसके विपरीत कांग्रेस के कर्ता - धर्ता ये समझ ही नहीं पाए कि उसका सत्यानाश करने में क्षेत्रीय दलों की ही भूमिका रही। इसके बाद भी वह  उ.प्र में अखिलेश यादव और बिहार में तेजस्वी की पिछलग्गू बनी हुई है। भाजपा ने तेलंगाना में बीआरएस को पीछे धकेलकर  भविष्य का रास्ता साफ कर लिया है। हालांकि पंजाब जैसा राज्य अभी भी उसकी पकड़ से बाहर है। लेकिन वहाँ अकाली दल के सिमटने के बाद वही आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बाद तीसरा विकल्प है। लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र और उ.प्र ने भाजपा को जोरदार झटका दिया था लेकिन पिछले हफ्ते आये परिणामों के बाद उन दोनों में उसने उस हार का बदला लेकर अपनी जड़ें मजबूत कर लीं। दूसरी तरफ कांग्रेस इस बात पर ही खुश है कि वायनाड में प्रियंका वाड्रा जीत गईं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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