हरियाणा के बाद महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में चारों खाने चित्त हो जाने के बाद कांग्रेस पूरी तरह हताश है। लोकसभा चुनाव के बाद उसका जो उत्साहवर्धन हुआ था वह 6 माह के भीतर ही फुस्स होने लगा। न संविधान पर खतरे का नारा काम आया, न ही जातीय जनगणना। मतदाताओं को लुभाने वाली गारंटियां भी बेअसर रहीं। हरियाणा में जाटों और महाराष्ट्र में मराठा समुदाय की भाजपा से नाराजगी के बूते चुनाव जीतने की उम्मीद भी धोख़ा दे गई। हालांकि जम्मू - कश्मीर में विजयी रही नेशनल काँफ्रेंस और झारखंड में जीते झामुमो के साथ गठबंधन में कांग्रेस भी शामिल थी किंतु श्रेय क्रमशः उमर अब्दुल्ला और हेमंत सोरेन के हिस्से आया। जो राजनीतिक विश्लेषक 4 जून के बाद राहुल गाँधी को सुपर स्टार की तरह पेश करने लगे थे वही अचानक उनकी नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठाने लगे। लेकिन कांग्रेस की मजबूरी ये है कि सफलता का श्रेय उसे गाँधी परिवार को देना ही पड़ता है जबकि पराजय के लिए बलि के बकरे खोजे जाते हैं। और ऐसा ही महाराष्ट्र के परिणाम के बाद देखने मिल रहा है। गत दिवस कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने ईवीएम ( इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन ) पर हार का ठीकरा फोड़ते हुए उसके विरुद्ध भारत जोड़ो यात्रा की तर्ज पर राष्ट्रव्यापी अभियान चलाने की घोषणा के साथ ही मतपत्रों से चुनाव करवाए जाने की मांग दोहराई। लेकिन गत दिवस ही सर्वोच्च न्यायालय ने एक जनहित याचिका रद्द करते हुए ईवीएम का विरोध करने वालों को जमकर लताड़ा। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि जहाँ जीत मिलती है वहाँ ईवीएम में कोई दोष नहीं निकालता किंतु हारने के बाद उसमें हेराफेरी की आशंका जताई जाती है। स्मरणीय है लोकसभा चुनाव में उ.प्र और महाराष्ट्र में विपक्ष को जबरदस्त सफलता मिली जिसे मुद्दों की जीत बताकर ढोल पीटे गए । इसी तरह जम्मू - कश्मीर के नतीजों को धारा 370 हटाये जाने के विरुद्ध जनादेश कहकर उसका स्वागत किया गया। झारखंड में भी झामुमो की सफलता का कारण हेमंत सोरेन को जेल भेजने से आदिवासी समुदाय में उपजी नाराजगी के अलावा उनकी सरकार द्वारा संचालित जन कल्याणकारी योजनाओं को बताया गया। ऐसे में हरियाणा और महाराष्ट्र में विपक्ष की पराजय के लिए ईवीएम पर संदेह किया जाना सच्चाई से मुँह मोड़ने जैसा है। चुनाव में निष्पक्षता और पारदर्शिता लोकतंत्र की सफलता के लिए जरूरी है। चुनाव आयोग से यही अपेक्षा की जाती है कि वह सत्ताधारी दल के नियंत्रण से मुक्त रहकर चुनाव प्रक्रिया को प्रामाणिक बनाये रखे। इसीलिए विभिन्न पार्टियों द्वारा उठाई गई शंकाओं के बाद आयोग ने उन्हें बुलाकर वोटिंग मशीनों में हेराफेरी साबित करने का अवसर दिया किंतु विपक्ष ने उसमें रुचि नहीं ली जिससे ये स्पष्ट हो गया कि उसके आरोपों में कोई दम नहीं है। उसके बाद हुए अनेक चुनावों में विपक्ष को उल्लेखनीय सफलता मिली जिस पर उसने जश्न भी मनाया। ऐसे में केवल हारने पर वोटिंग मशीन पर ठीकरा फोड़ना खीझ नहीं तो और क्या है ? किसी इलेक्ट्रानिक उपकरण में गड़बड़ी नहीं हो सकती ये दावा पूरी तरह सच नहीं है किंतु हजारों ईवीएम में एक साथ छेड़छाड़ संभव नहीं लगती। रही बात दुनिया के अनेक देशों द्वारा उनका उपयोग बंद कर दोबारा मतपत्रों से चुनाव करवाने की तो उनकी आबादी और भौगोलिक आकार का ध्यान भी रखना होगा। यदि ईवीएम में राष्ट्रीय स्तर पर हेराफेरी संभव होती तो प. बंगाल, तमिलनाडु, केरल और पंजाब का राजनीतिक परिदृश्य कुछ और होता। बेहतर हो विपक्ष इस मामले में बचकाना रवैया त्यागे। खरगे जी ईवीएम के विरोध में भारत जोड़ो यात्रा जैसा आयोजन करें ये उनका अधिकार है। लेकिन इस मुद्दे पर उन्हें जनसमर्थन की उम्मीद नहीं करनी चाहिए क्योंकि चुनाव हारने पर ईवीएम पर आरोप लगाना और जीतने पर अपने नेता और नीतियों को श्रेय देने की बात गले नहीं उतरती। हालिया चुनाव परिणामों के विश्लेषण में ज्यादातर लोगों का मानना है कि हरियाणा और महाराष्ट्र में भाजपा का चुनाव प्रबंधन काफी बेहतर रहा। दरअसल उसने लोकसभा चुनाव में लगे झटके के बाद अपनी मैदानी तैयारियों पर ध्यान दिया। दूसरी तरफ कांग्रेस 99 सीटें मिलने से ही खुशफहमी का शिकार हो गई। लगातार दो राज्यों में मिली हार के बाद उसे अपने संगठन पर ध्यान देने के साथ ही एक परिवार के स्तुति गान की बजाय नये ऊर्जावान नेतृत्व को प्रोत्साहित करना चाहिए। जब तक ऐसा नहीं किया जाता तब तक उसके पुनरुद्धार की कोई संभावना नहीं हैं। हरियाणा और महाराष्ट्र में बुरी तरह मात खाने के बाद अब तो इंडिया गठबंधन के सहयोगी दलों के बीच भी उसका दबदबा कम हो गया। इसलिए खरगे जी को चाहिये वे ईवीएम का विरोध करने के बजाय अपनी कमियों को दूर करने का प्रयास करें क्योंकि बतौर पार्टी अध्यक्ष चुनावी विफलताओं के लिए वे भी जिम्मेदार हैं।
-रवीन्द्र वाजपेयी
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