जम्मू - कश्मीर विधानसभा चुनाव में सभी क्षेत्रीय दलों ने धारा 370 की वापसी और पूर्ण राज्य का का मुद्दा उठाकर घाटी के मतदाताओं को गोलबंद करने का दांव चला था। इसका सर्वाधिक लाभ मिला नेशनल काँफ्रेंस को । यद्यपि उसकी साझेदार कांग्रेस ने हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड के चुनाव में नुकसान के भय से पूर्ण राज्य का समर्थन करने के बाद भी 370 पर मौन साधे रखा। चुनाव के बाद नेशनल काँफ़्रेंस के उमर अब्दुल्ला मुख्यमंत्री बन गए किंतु कांग्रेस सरकार में शामिल नहीं हुई। तब ये माना गया कि वह 370 को लेकर किसी भी विवाद से बचना चाह रही है। वहीं मुख्यमंत्री बनते ही उमर ने पूर्ण राज्य की मांग में तो देर नहीं लगाई किंतु 370 की वापसी को ये कहते हुए ठंडे बस्ते में डाल दिया कि वे केंद्र से समन्वय बनाकर चलना चाहते हैं। उन्होंने ये भी कहा कि फिलहाल 370 की वापसी संभव नहीं लिहाजा वे सत्ता परिवर्तन तक प्रतीक्षा करेंगे। इस पर पीडीपी ने उन पर हमला बोलते हुए घाटी के मतदाताओं को धोख़ा देने का आरोप लगाया। हालांकि मुख्यमंत्री ने उस पर ध्यान नहीं दिया और तो और विधानसभा में पीडीपी द्वारा 370 की वापसी संबंधी प्रस्ताव लाने की बात कहने पर बरसते हुए कहा कि वह मेरी सरकार के लिए खतरा पैदा करना चाह रही है। उनका आशय केंद्र सरकार की संभावित नाराजगी को लेकर था। उससे लगा कि वे वाकई 370 पर केंद्र सरकार से भिड़ना नहीं चाहते। लेकिन अपने दादा शेख अब्दुल्ला और पिता फारुख के पद चिन्हों पर चलते हुए उन्होंने भी दोगलापन दिखाने में संकोच नहीं किया। कहाँ तो वे 370 पर पीडीपी को आड़े हाथ ले रहे थे और कहाँ पलटी मारते हुए अपने ही उपमुख्यमंत्री सुरिंदर चौधरी से 370 की वापसी का प्रस्ताव पेश करवा दिया जिसमें उल्लिखित है कि यह विधानसभा विशेष दर्जे और संवैधानिक गारंटी के महत्व की पुष्टि करती है।विशेष राज्य के दर्जे को एकतरफा तरीके से हटाए जाने पर चिंता के साथ प्रस्ताव में कहा गया है कि विधानसभा इस बात पर जोर देती है कि बहाली की किसी भी प्रक्रिया में राष्ट्रीय एकता और जम्मू-कश्मीर के लोगों की वैध आकांक्षाओं की रक्षा होनी चाहिए। प्रस्ताव पेश होते ही भाजपा विधायकों ने प्रस्ताव की प्रतियाँ फाड़ते हुए हंगामा शुरू कर दिया। उनका आरोप था कि वह सदन की कार्यसूची में नहीं था किंतु अध्यक्ष ने उसे ध्वनि मत से पारित घोषित कर दिया। भाजपा अध्यक्ष पर उक्त कारवाई को निरस्त करने का दबाव बना रही है किंतु वे राजी नहीं हैं। इस प्रकार उमर की वह बात गलत निकली कि वे 370 की वापसी पर केंद्र से टकराव नहीं लेंगे । यदि पीडीपी या अन्य क्षेत्रीय विधायक द्वारा उक्त प्रस्ताव पेश किया जाता तब बात अलग थी। नेशनल काँफ्रेंस का भी कोई विधायक वैसा करता तब उसकी निजी राय कहकर भी मुख्यमंत्री पल्ला झाड़ सकते थे परंतु उपमुख्यमंत्री द्वारा प्रस्ताव पेश करना इस बात का प्रमाण है कि उसे उनका समर्थन था। लेकिन इस विवाद का सबसे दुखद पहलू ये रहा कि जो कांग्रेस पूरे चुनाव में धारा 370 पर बोलने से कतराती रही और अपने घोषणापत्र में भी इस मुद्दे को शामिल करने से परहेज किया , उसने भी 370 की वापसी के प्रस्ताव को समर्थन देकर अपने पाँव पर कुल्हाड़ी मार ली। जहाँ तक बात उमर और उनकी पार्टी के अलावा घाटी के अन्य दलों की है तो उनका देश विरोधी रवैया किसी से छिपा नहीं है। विशेष तौर पर अब्दुल्ला परिवार का दोगलापन ही कश्मीर समस्या को उलझाने का सबसे बड़ा दोषी है। उक्त प्रस्ताव के जरिये उमर ने एक बार फिर साबित कर दिया कि सांप का बच्चा ज़हरीला ही होता है। लेकिन कांग्रेस के इस षडयंत्र में भागीदार हो जाने से लग गया कि शेख अब्दुल्ला के जमाने से धोख़ा खाते आने के बाद भी इस पार्टी के कर्ताधर्ता गाँधी परिवार को अक्ल नहीं आई। उसे ये समझना चाहिए कि धारा 370 से केवल अब्दुल्ला परिवार को ही फायदा मिला। राष्ट्रीय पार्टी होने के बाद भी कांग्रेस आज भी इसी परिवार की मोहताज है। हालिया चुनाव में भी उसे घाटी में महज 1 सीट मिलना काफी कुछ कह गया। जम्मू अंचल में भी उसका प्रदर्शन बेहद निरशाजनक रहा। धारा 370 की वापसी का प्रस्ताव अब्दुल्ला परिवार के राजनीतिक अस्तित्व के लिए तो जरूरी हो सकता है लेकिन कांग्रेस की कौन सी नस इस परिवार ने दबा रखी है ये रहस्यमय है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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