Thursday, 14 November 2024

झोपड़ बस्तियाँ विकास के दावों पर सवालिया निशान हैं


देश की आर्थिक राजधानी मुंबई  अनेक बातों के लिए चर्चा में रहती है । अरब सागर के किनारे बसे मुंबई का फिल्म उद्योग अभिनय करने के इच्छुक युवक - युवतियों को यहाँ खींच लाता है। पूरे देश से आकर बसे लोगों ने इस महानगर को लघु भारत का रूप दे दिया है। एक समय था जब शिवसेना जैसी राजनीतिक पार्टी ने पहले दक्षिण भारतीय और बाद में उत्तर भारतीयों के विरुद्ध बेहद आक्रामक रवैया दिखाया। यहां तक कि नौकरी के लिए परीक्षा और साक्षात्कार के लिए आने वाले अन्य राज्यों के युवाओं पर हमले भी हुए। हालांकि बाद में वोट बैंक के दबाववश वह मुहिम ठण्डी पड़ती गई। इसीलिए  आज की  मुंबई महाराष्ट्र की राजधानी होते हुए भी केवल मराठियों की नहीं रही। उद्योग -  व्यवसाय के सिलसिले में पूरे देश के उद्यमी इस महानगर में आकर अपना भाग्य चमकाते हैं। देश और दुनिया के हजारों  धन कुबेर यहाँ बसे हुए हैं। लेकिन दूसरी तरफ इस नगर में लाखों लोग ऐसे भी हैं जिनके पास रहने का स्थान न होने से वे फुटपाथ पर ही गुजारा करने मजबूर हैं। इसी तरह  मुंबई की तमाम शान - शौकत के साथ यहाँ एशिया की सबसे बड़ी और विश्व की तीसरे नम्बर की झुग्गी बस्ती धारावी भी है जिसमें 60 हजार परिवारों के 10 लाख लोग बेहद दयनीय हालातों में रहते हैं । धारावी अपने आप में एक शहर है जिसमें लोग रहते ही नहीं बल्कि यहाँ करोड़ों का कारोबार भी होता है। सैकड़ों छोटे - छोटे कल -  कारखाने भी यहाँ से संचालित होते हैं। इस झोपड़ बस्ती में अपराधों को भी संरक्षण मिलता है। धारावी में माफिया राज भी धड़ल्ले से चलता है। कुल मिलाकर धारावी इस महानगर के माथे पर कलंक की तरह है जिसे मिटाने के लिए लम्बे समय से योजनाएं बनाई जाती रहीं किंतु नतीजा शून्य ही रहा। राज्य और केंद्र में सरकारें बदलती रहीं किंतु उसका दुर्भाग्य दूर नहीं हो सका तो उसका बड़ा कारण राजनेताओं में ईमानदारी और इच्छाशक्ति का अभाव ही रहा। कुछ बड़े उद्योगपतियों ने भी धारावी  के उद्धार की पहल कि परंतु वह भी राजनीतिक खींचातानी में उलझकर रह गई। डा. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में मुंबई को चीन के शंघाई शहर जैसा व्यवस्थित बनाने के ख्वाब भी दिखाये गये किंतु वे साकार नहीं हो सके। महाराष्ट्र विधानसभा के मौजूदा चुनाव में धारावी का विकास बड़ा मुद्दा बना हुआ है। इसके पुनरोद्धार के लिए अडानी उद्योगसमूह को ठेका मिला है। धारावी में स्थायी रूप से बसे लोगों को फ्लैट बनाकर देने का प्रावधान किया गया है। हालांकि अडानी को काम मिलने का गैर भाजपा पार्टियां विरोध भी कर  रही हैं। ये भी सुनने में आ रहा है कि मुंबई का भू माफिया भी धारावी को विकसित नहीं होने देना चाहता जिसके पीछे ज्ञात - अज्ञात अनेक कारण हैं। दरअसल इस बस्ती में कुछ माफिया सरगनाओं के कब्जे में बड़ी संख्या में घर हैं जिनका वे किराया वसूलते हैं। उनको डर है कि धारावी से झोपड़ पट्टियां हटने से उनकी आय का स्रोत बंद हो जाएगा। विरोध का एक कारण धारावी का अपराधियों की कर्म भूमि होना भी हैं। इसकी सघनता इतनी ज्यादा है कि पुलिस के लिए यहाँ चल रही अपराधिक गतिविधियों को रोक पाना और उनसे जुड़े लोगों को पकड़ना बेहद कठिन है। ये भी कहा जाता है की धारावी मुंबई पुलिस की अवैध कमाई का बड़ा जरिया है। यही वजह है कि राज्य और केंद्र की सरकारों द्वारा समय - समय पर धारावी को विकसित करने की जो योजनाएं बनाई गईं वे कागजों से आगे नहीं बढ़ सकीं। ऐसे में यदि वर्तमान महायुति सरकार सत्ता में लौटी तब धारावी के विकास की संभावना जीवित रहेगी किंतु  महा विकास अगाड़ी सत्ता में आई तो अडानी से खुन्नस के चलते रोड़े अटकाए जाने की आशंका प्रबल हो जाएगी। सही बात ये है कि  धारावी जैसी विशाल झोपड़ बस्ती मुंबई के अलावा अन्य किसी महानगर में भले न हो किंतु छोटे  आकार में ही सही उनकी मौजूदगी वहाँ है। ये बात निःसंकोच कही जा सकती है कि ये  झोपड़ बस्तियाँ विकास के समूचे दावों की पोल खोल देती हैं। साथ ही राजनेताओं के निकम्मेपन का जीता - जागता प्रमाण भी हैं जो सत्ता में आते ही अपने रहने के लिए तो शानदार घर बनवा लेते हैं किंतु गरीबों की बदहाली दूर करने में उनको कोई रुचि नहीं है। नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री आवास योजना लागू कर साधनहीन जनता की आवास समस्या दूर करने की जो पहल की उसके अच्छे परिणाम निकल रहे हैं। लेकिन उनके निर्माण में गुणवत्ता का जबरदस्त अभाव है। बेहतर हो धारावी के विकास जैसी योजना पूरे देश के लिए बने और उस पर तेजी से काम हो । वरना सबका साथ, सबका विश्वास का नारा भी गरीबी हटाओ की तरह झांसेबाजी में बदलकर रह जाएगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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