देश का दिल कहे जाने वाली राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में वायु प्रदूषण खतरे के सारे मापदंडों को तोड़कर गंभीर होता जा रहा है। जो काम प्रदूषण नियंत्रण मंडल को करना चाहिए वह सर्वोच्च न्यायालय को करना पड़ रहा है। लेकिन वह भी डाँट - फटकार के आगे कुछ भी करने में असमर्थ है। केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच क्षेत्राधिकार का झगड़ा सर्वविदित है। लिहाजा दोनों तरफ से आरोप - प्रत्यारोप का चिर - परिचित सिलसिला जारी है। सबसे ज्यादा ठीकरा फोड़ा जाता है पंजाब और हरियाणा के किसानों द्वारा खेतों में जलाई जाने वाली पराली के धुएं पर। इसके लिए जुर्माने का प्रावधान किये जाने के बाद भी पराली जलाये जाने में कमी नहीं आई। इसमें भी दो मत नहीं हैं कि किसान समुदाय की नाराजगी से बचने के लिए कोई भी सरकार उन पर कड़ी कारवाई करने से डरती है। इस मामले में ये पेच भी है कि जहाँ केंद्र और हरियाणा में भाजपा की सरकार है वहीं पंजाब और दिल्ली में आम आदमी पार्टी सत्ता में है। ऐसे में पराली के मामले में दोनों पार्टियां बराबरी से जिम्मेदार मानी जायेंगी क्योंकि उनके द्वारा शासित राज्य की सरकार यदि सख्त हो तो कोई वजह नहीं पराली जलाने पर लगी रोक को लागू न किया जा सके। हालांकि इसके लिये किसान संगठनों को भी भरोसे में लेना होगा जो जरा - जरा सी बात पर ट्रैक्टर खड़े कर रास्ते जाम कर देते हैं। राजनीतिक पार्टियों का रुख भी चूँकि क्षणिक स्वार्थों से निर्देशित होता है इसलिए वे दूरगामी हितों को नजरंदाज कर देती हैं। दिल्ली में एक साल चले किसान आंदोलन के दौरान ये बात स्पष्ट हो गई । उस दौरान तमाम विपक्षी नेताओं के अलावा न जाने कहाँ - कहाँ के संगठनों ने किसानों के धरने में घुसपैठ करते हुए उसे पटरी से उतार दिया। इसी तरह पराली की समस्या के अलावा दिल्ली में वायु प्रदूषण के ख़तरनाक स्तर के भी ऊपर चले जाने के लिए भी राजनीति को जिम्मेदार मान लेना गलत नहीं है। उल्लेखनीय है कि पराली जलाये जाने की समस्या फसल कटने के बाद अर्थात वर्ष में दो या अधिकतम तीन बार ही उत्पन्न होती है जबकि दिल्ली में बरसात वाले दिन छोड़ दें तो पूरे साल ही हवा में ज़हर घुला होता है। इसके कारण अज्ञात हों ऐसा भी नहीं नहीं है। वाहनों की बेतहाशा संख्या और औद्योगिक इकाइयां भी वायु प्रदूषण की वजह है। राजधानी की शान कही जाने वाली यमुना की जो दुर्दशा है उसे दूर करने के लिए किये गए सरकारी वायदे जिस तरह धूल खा रहे हैं वह इस बात का प्रमाण है कि सरकार नामक व्यवस्था यमुना से अधिक सड़ी हुई है। दिल्ली में राष्ट्रीय राजधानी और सर्वोच्च न्यायालय होने से उसकी चर्चा देश भर में हो जाती है। लेकिन देश के बाकी महानगरों में भी वायु प्रदूषण की स्थिति संतोषजनक नहीं कही जा सकती। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा प्रारंभ राष्ट्रीय स्वच्छता मिशन के अंतर्गत जब शहरों के बीच स्वच्छता प्रतियोगिता रखी गई तब उसका मजाक भी उड़ाया गया। हालांकि उसके सकारात्मक परिणाम भी निकले। अनेक शहरों में स्वच्छता को लेकर प्रशंसनीय जागरूकता देखने मिली और उन्होंने साल दर साल अपनी रैंकिंग में सुधार किया। म.प्र का इंदौर नगर लगातार देश का सबसे स्वच्छ शहर बना हुआ है। असलियत ये है कि दिल्ली को प्रदूषण रहित बनाने के लिए ऐसा कुछ भी नहीं किया गया जिससे वहाँ के लोगों में भी पर्यावरण सुधारने के प्रति इंदौर वासियों जैसी ललक पैदा होती। केजरीवाल सरकार द्वारा ऑड - ईवन फार्मूले का प्रयोग कर सड़कों पर वाहन कम करने की जो मुहिम चलाई वह भी फुस्स होकर रह गई। दरअसल दिल्ली केंद्र और राज्य सरकार के बीच रस्साकशी की सजा भोग रही है। भाजपा की तरफ से आम आदमी पार्टी की सरकार पर दिल्ली को गैस चेंबर बनाये जाने का आरोप मढ़ा जा रहा है। वहीं आम आदमी पार्टी केंद्र सरकार को कटघरे में खड़ा कर रही है। सर्वोच्च न्यायालय की भी अपनी सीमा है। इस सबके बीच फंसे दिल्ली वासियों के फेफड़ों में ज़हर का बेरोकटोक प्रवेश जारी रहेगा । दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानी होने का कलंक दिल्ली के माथे पर लगा रहना विकास की तमाम उपलब्धियों पर संदेह पैदा करता है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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