Wednesday, 13 November 2024

सैकड़ों राजाओं की जगह पैदा हो गए हजारों नेता


महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे इस बात से भन्नाए हुए हैं कि चुनाव आयोग ने उनके बैग की तलाशी ले ली। उन्होंने इसे अपनी तौहीन मानते हुए कहा कि पहली बार उनके साथ ऐसा हुआ । साथ ही आयोग को चुनौती दी कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के बैग की जांच करने की हिम्मत भी दिखाए। जवाब में आयोग ने बताया कि वह श्री शाह के साथ ही भाजपा अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा के बैग की तलाशी भी कर चुका है। ये जानकारी भी आई कि ऐसी ही जाँच केंद्रीय मंत्री नितिन गड़करी और महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस की भी की जा चुकी है। आचार संहिता लगने के बाद चुनाव आयोग के निर्देश पर पुलिस राह चलते वाहनों को रोककर जाँच करती है कि कहीं उनमें नगद रुपये या शराब तो नहीं ले जाई जा रही। आम जनता और व्यापारी इससे परेशान भी होते हैं । लेकिन  साधारण से राजनीतिक नेता तक को  ये बर्दाश्त नहीं होता कि उसके साथ सामान्य नागरिक जैसा व्यवहार हो। चुनाव के समय  शासन में बैठे मंत्रियों तक को विशिष्ट सुविधाओं से वंचित होना पड़ता है। सरकारी वाहन और विश्राम गृह की व्यवस्था भी स्थगित रहती है।  चूंकि काले धन का उपयोग चुनाव में धड़ल्ले से होता है लिहाजा उसे रोकने के लिए नेताओं और आम जनता के वाहनों और सामान की तलाशी ली जाती है। इस दौरान बड़ी मात्रा में नगदी बरामद भी होती रही है। हालांकि इसके लिए कितने लोग दंडित हुए ये पता नहीं चलता। इसीलिए इस कारवाई को रस्म अदायगी माना जाता है। आयकर और ईडी भी चुनाव के समय छापेमारी  करते हैं। उसका उद्देश्य भी काले धन की पतासाजी करना ही  है किंतु विपक्ष का आरोप होता है कि सरकार इन संस्थाओं के जरिये उसके समर्थकों को प्रताड़ित करती है। वहीं सरकार इसे सामान्य प्रक्रिया  बताकर बचाव करती है।लेकिन इस सबके बीच सवाल उठता है कि श्री ठाकरे को उनके बैग की जाँच पर इतना बुरा क्यों लगा ? उनका ये कहना कि जीवन में पहली बार ऐसा हुआ इस बात का परिचायक है कि वे अपने को कानून से ऊपर मानते हैं। पहले कभी ऐसा नहीं हुआ इसलिए इस बार होने पर  अपमान महसूस होना ही वह सामंती मानसिकता है जिससे अधिकांश राजनीतिक नेता ग्रसित हैं। इसका प्रगटीकरण केवल चुनावों के दौरान ही होता हो ऐसा नहीं है। आये दिन कहीं न कहीं नेतागण अपनी शान में गुस्ताखी का रोना रोते हुए नजर आते हैं। टोल नाके में उनसे टोल मांगे जाने पर तोड़ - फोड़ और मारपीट सामान्य बात है। यातायात नियमों को तोड़ना उनके लिए प्रतिष्ठा सूचक होता है। यदि किसी  पुलिस वाले ने उनका चालान करने का दुस्साहस किया तो नेताजी उसकी वर्दी उतरवाने की धमकी देकर रौब दिखाने से बाज नहीं आते। सत्ता में बैठे महानुभावों की अकड़ देखकर दूसरे भी उसकी नकल करने में पीछे नहीं रहते। इस सबका परिणाम ही है कि लोकतंत्र  के बाद भी एक बड़ा वर्ग अपने को राज परिवार का सदस्य मानकर अहंकार में डूबा रहता है।  वाहन की  नंबर प्लेट पर नंबर की बजाय अपने पद का नाम लिखकर  श्रेष्ठता प्रदर्शित करना आम बात है। उद्धव इस प्रकार की अकड़ दिखाने वाले अकेले नेता नहीं हैं। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो राजनीतिक बिरादरी के ज्यादातर लोग नव सामंतवाद के जीवंत प्रतीक हैं। अभी हाल में केंद्रीय मंत्री वीरेंद्र खटीक जबलपुर आये थे। उन दिनों दीपावली की खरीदी की वजह से बाजारों में काफी भीड़ होने से चार पहिया तो क्या दो पहिया वाहन ले जाना तक कठिन था। मंत्री जी ने बजाय अपना रुतबा दिखाने के पार्टी कार्यकर्ताओं के स्कूटर / मोटर साइकिलों पर लोगों के घर जाने का निर्णय लिया और बिना तामझाम के कब आये कब चले गए किसी को पता नहीं चला। श्री खटीक अपने निर्वाचन क्षेत्र में भी इसी तरह लोगों के बीच आते - जाते हैं। सांसद रहते हुए स्टेशन से ऑटो में आते हुए उन्हें देखा जाना सामान्य बात थी। ऐसे नेताओं की तारीफ उनके संगी - साथी ही नहीं बल्कि विरोधी भी करते हैं किंतु जब अनुसरण की बात उठती है तो कन्नी काट लेते हैं। राहुल गाँधी और शिवराज सिंह चौहान के रेस्टारेंट में भोजन करने के फोटो समाचार बन जाते हैं , जबकि इसमें अनोखा क्या है ? इंदिरा गाँधी ने  जब 500 से अधिक राजा - महाराजाओं के प्रीवीपर्स बंद किये तो उसे समाजवाद की दिशा में बड़ा कदम माना गया था किंतु आज नेताओं की शक्ल में जहाँ देखो वहाँ नव सामंत नजर आते हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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