हालांकि आजकल कौन सा नेता अपनी पार्टी छोड़कर दूसरी में चली जाए, कहना मुश्किल है क्योंकि सिद्धांत और विचारधारा का तो कोई महत्व रहा नहीं। लेकिन 2014 की मोदी लहर के बाद दिल्ली विधानसभा चुनाव में धूमकेतु की तरह चमकी आम आदमी पार्टी को राष्ट्रीय राजनीति में ताजी हवा का झोंका माना जाने लगा क्योंकि उसमें अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसौदिया को छोड़ दें तो बाकी दूसरा चेहरा नहीं था जिसकी जनता के बीच कुछ पकड़ हो। नई नवेली पार्टी ने अति साधारण किस्म के लोगों को उम्मीदवार बनाकर जिस धमाकेदार अंदाज में दिल्ली का चुनाव जीता उसकी पूरे विश्व में चर्चा हुई। कांग्रेस का सफाया हो गया वहीं भाजपा भी 3 विधायकों तक सिमट गई। यही करिश्मा 2020 में भी दोहराया गया। और फिर दिल्ली नगर निगम भी आम आदमी पार्टी के कब्जे में चली गई। इन सबके कारण श्री केजरीवाल को प्रधानमंत्री का दावेदार माना जाने लगा। पंजाब में भारी बहुमत से सरकार बनाने के बाद तो उनकी महत्वाकांक्षाएं आसमान छूने लगीं । पार्टी ने रिकार्ड समय में राष्ट्रीय दल होने का गौरव भी हासिल कर लिया। हालांकि अन्य राज्यों में उसकी जमानत जप्ती का सिलसिला जारी रहा। जिसका ताजा उदाहरण हरियाणा का चुनाव है। कुछ राज्य में जरूर उसके विधायक जीते किंतु कांग्रेस का विकल्प बनकर भाजपा को चुनौती देने की जो उम्मीद श्री केजरीवाल ने पाल रखी थी वह तब फुस्स होकर रह गई जब भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरने के बाद पार्टी कांग्रेस की अगुआई में बने इंडिया गठबंधन में शामिल हो गई। जिन भ्रष्ट नेताओं की सूची जारी कर श्री केजरीवाल अपने को ईमानदारी का पुतला बताते नहीं थकते थे उन्हीं से गले मिलकर उन्होंने ये साबित कर दिया कि ताजी हवा होने का दावा कर रही आम आदमी पार्टी भी दिल्ली के प्रदूषण का शिकार हो गई। बीते दो सालों में उसकी छवि लगातार दागदार होती गई। दिल्ली के मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री सहित कुछ और नेता भ्रष्टाचार के आरोप में जेल चले गए। पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस से गठबंधन करने के बाद भी दिल्ली में उसे कुछ हासिल न हुआ। ऐसा लगता है राष्ट्रीय नेता बनने के फेर में श्री केजरीवाल अपने गढ़ में ही कमजोर होने लगे। हाल ही में दिल्ली के महापौर चुनाव में पार्टी के 10 विधायकों ने भाजपा प्रत्याशी का समर्थन किया। गत दिवस प्रदेश सरकार के वरिष्ट मंत्री कैलाश गहलोत वायदे पूरे नहीं करने के साथ ही मुख्यमंत्री आवास पर किये बेतहाशा खर्च के लिए श्री केजरीवाल पर तीखे आरोप लगाने के बाद आज भाजपा में शामिल हो गए। हालांकि वे मुख्यमंत्री न बनाये जाने से नाराज थे किंतु उन जैसे नेता का सरकार और पार्टी छोड़ना इस बात का संकेत है कि श्री केजरीवाल का दबदबा पहले जैसा नहीं रहा। इसका कारण उनकी साफ - सुथरी छवि पर दाग लगना है। दिल्ली सरकार जिन जनकल्याणकारी नीतियों के चलते प्रसिद्ध हुई थी वे भी पहले जैसी प्रभावशाली नहीं रहीं। सबसे बड़ा धक्का लगा शराब घोटाले से मिली बदनामी से। वरना अपने गृहराज्य हरियाणा में श्री केजरीवाल की इतनी फजीहत न हुई होती। पार्टी छोड़ते समय श्री गहलोत ने जो आरोप लगाए उन्हें मुख्यमंत्री पद न मिलने से उत्पन्न खीझ भी कहा जा सकता है किंतु उनकी ये बात में पूरी तरह सही है कि श्री केजरीवाल ने केंद्र सरकार से लड़ने में काफी समय बर्बाद किया। हालांकि दूसरी पार्टी से नेताओं का आम आदमी पार्टी में आना भी जारी है। विशेष रूप से कांग्रेस से ज्यादा लोग आ रहे हैं। लेकिन स्वाति मालीवाल के बाद कैलाश गहलोत के बाहर निकलने से श्री केजरीवाल की वजनदारी घटी क्योंकि ये दोनों उनके बेहद करीबी रहे हैं। हालांकि कुछ नेताओं के इधर - उधर होने से किसी पार्टी के भविष्य पर सवाल उठाना जल्दबाजी होगी किंतु ये तो मानना पड़ेगा कि आम आदमी पार्टी की कमीज भी बेदाग नहीं रही। जिस नई राजनीति से देश को परिचित करवाने का श्री केजरीवाल श्रेय लेते थे वह दिल्ली की यमुना जैसी होकर रह गई है। अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की कोख से जन्मी आम आदमी पार्टी भी देश की अन्य राजनीतिक पार्टियों की तरह ही सत्ता की अंधी दौड़ में शामिल नजर आने लगी है। इसीलिए उसे न भ्रष्टाचार से परहेज रहा और न ही भ्रष्ट नेताओं के साथ गलबहियाँ करने में।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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