Monday, 11 November 2024

राजनीतिक दलों की डिस्काउंट सेल बनकर रह गये चुनाव


महाराष्ट्र और झारखंड विधानसभा चुनाव के लिए दोनों पक्षों ने अपने घोषणापत्र जारी कर दिये। इनकी जो मुख्य बातें समाचार माध्यमों के जरिये प्रचारित हुईं उनमें महिलाओं और युवाओं को हर माह निश्चित धनराशि के अलावा मुफ्त स्वास्थ्य बीमा , सस्ती या मुफ्त बिजली तथा आधी कीमत पर रसोई गैस सिलेंडर शामिल हैं। किसानों के कर्ज माफी का वायदा भी घोषणापत्र का हिस्सा है। कोई पार्टी इसे वचन पत्र कह रही है तो किसी ने उसे गारंटी का नाम देकर अपनी विश्वसनीयता साबित करने का प्रयास किया है। सत्ता में आते ही लाखों सरकारी नौकरियों का आश्वासन देकर बेरोजगारों को लुभाने का दांव भी चला गया है।  ये चुनावी वायदे भारतीय राजनीति की पहिचान बन चुके हैं। इसलिए इन पर किसी को आश्चर्य नहीं होता।  सर्वोच्च न्यायालय इस पर रोक लगाने में असमर्थता व्यक्त करते हुए गेंद चुनाव आयोग के पाले में सरका चुका है जबकि आयोग को इस बारे में ध्यान देने की फुरसत ही नहीं है। यही वजह है कि हर चुनाव में वायदों की रकम बढती जा रही है। मुफ्त शिक्षा,  चिकित्सा और कानून व्यवस्था किसी भी लोक कल्याणकारी शासन व्यवस्था की सर्वोच्च प्राथमिकता होती है। इसके साथ ही बिजली, पानी, सड़क जैसे कार्य भी सरकार के कर्तव्यों में हैं। ये बात सच है कि हर किसी को नौकरी देना किसी भी सरकार के लिये असंभव है किन्तु रोजगार के अवसर उत्पन्न हों इसके लिये अनुकूल नीतियाँ और वातावरण बनाने की जिम्मेदारी तो हुक्मरानों की होती है। राजनीतिक दल सत्ता हासिल करने के लिये तरह - तरह के वायदे मतदाताओं से करते हैं। ये चलन केवल भारत में ही हो ऐसा नहीं है। हाल ही में संपन्न अमेरिका के  चुनाव में भी ये देखने मिला। और जब सत्ता बदलती है तब उसका बड़ा कारण सरकार द्वारा मतदाताओं से चुनाव के समय किये गए वायदे पूरे न किये जाना ही होता है। हालांकि भारत में अब जाति और धार्मिक  ध्रुवीकरण भी चुनावों को काफी हद तक प्रभावित करते हैं जिसका उदाहरण पिछले लोकसभा चुनाव में  उ.प्र जैसे राज्य में देखने मिला। लेकिन ये भी सही है कि नगद राशि जैसे वायदे चुनावी बाजी पलटाने में कारगर साबित हुए हैं। कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की गारंटियाँ उसे सत्ता दिलवाने में कामयाब रहीं वहीं म.प्र में भाजपा ने लाड़ली  बहना  योजना लागू कर सत्ता विरोधी रुझान को बेअसर कर दिखाया। उसके बाद से हुए हर चुनाव में मुफ्त में दी जाने वाली सुविधाओं की होड़ सी लग गई है। एक दल जितने का वायदा करता है दूसरा उससे बढ़कर देने का वायदा उछाल देता है। महाराष्ट्र की शिंदे सरकार ने म.प्र की लाड़ली बहना जैसी योजना कुछ महीने पहले शुरू कर महिलाओं को अपने पाले में आकर्षित करने का जो दांव चला उससे प्रतिद्वंदी महा विकास अग़ाड़ी की बढ़त पर असर पड़ने लगा। आरक्षण न मिलने से नाराज  जो मराठा मतदाता सरकार के विरोध में बताये जा रहे थे अब उनमें महिलाओं का झुकाव सरकार के पक्ष में होने के संकेत मिलने लगे। इसीलिये विपक्ष भी महिलाओं को उक्त योजना से अधिक देने का वायदा कर बैठा। झारखंड में भी ज्यादा से ज्यादा मुफ्त बांटने की प्रतिद्वंदिता है। ये सिलसिला कहाँ जाकर रुकेगा ये  कोई नहीं बता सकता क्योंकि किसी भी राजनीतिक  दल को अपने चंदे से तो वायदे पूरे करने नहीं पड़ते। सर्वोच्च न्यायालय ने ये टिप्पणी तो की वायदे करने वालों से ये भी पूछा जाना चाहिए कि उनको पूरा करने के लिए आर्थिक संसाधन कैसे जुटायेंगे किंतु उसकी बात बुद्धि विलास में उलझकर रह गई। वास्तविकता ये है कि भाजपा शासित  हो या अन्य किसी दल द्वारा शासित राज्य, सभी मुफ्त योजनाओं को जारी रखने के लिये हर माह रिजर्व बैंक से कर्ज लेते जा रहे हैं जिसकी अदायगी भी अंततः जनता पर करों का बोझ बढ़ाकर ही की जाएगी। हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक की सरकारों के सामने तो जबरदस्त आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। केंद्र सरकार ने भी जो मुफ्त योजनाएं चला रखी हैं उनके कारण ही वैश्विक बाजारों में कच्चे तेल के दाम कम होने पर भी भारत में पेट्रोल - डीजल की कीमतें कम नहीं की जा रहीं। समय आ गया है जब मुफ्त योजनाओं का लालच देकर मतदाताओं को लुभाने के इस तरीके पर गंभीरता से चिंतन होना चाहिए क्योंकि मौजूदा स्थिति में उसको  लालच देकर खरीदने जैसा जो खेल चल रहा है उसने चुनाव को बाजार बनाकर रख दिया है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

No comments:

Post a Comment